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काठ का लट्टू और पूँजी की डोर?

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शशिकांत गुप्ते

यकायक एक खेल का स्मरण हुआ। एक भवरा होता है। यह काठ का होता है,इसे लट्टू भी कहतें हैं।इस लट्टू के नीचें एक नुकीली कील लगी होती है। इस लट्टू पर मोटी डोर लपेट कर इसे जमीन पर घुमाया जाता है।लट्टू पर डोर जितनी कस कर मजबूती से लपेटी जाती है,लट्टू उतनी तेज गति से और देर तक घूमता है।बहुत से खिलाड़ी लट्टू को जमीन पर गिरने ही नहीं देतें है,डोर से उछाल कर सीधे हाथ की हथिले पर ले लेतें हैं।लट्टू हथिले पर घूमता है।
वर्तमान में व्यक्ति,पूँजी,और सत्ता केंद्रित राजनीति व्यवस्था को लट्टू की माफिक घुमा रही है।
पूँजी की डोर,व्यवस्था पर लपेट कर बहुमत की मजबूती से कसकर, व्यवस्था को जमीन पर नही सीधे चंद धनबलियों के हाथों में घुमाया जा रहा है।
पूँजी, व्यक्ति और सत्ता केंद्रित राजनीति के चलते बहुत से बाहुबलियों को व्यवस्था को उनके स्वयं के मर्जी माफिक घुमाने की छूट होती है।
अपने देश भारत की माटी में लोकतंत्र प्राकृतिक रूप से रचाबसा है।कोई व्यवस्था रूपी लट्टू को कितनी ही बड़ी पूंजी से लपेट कर घुमाने की कौशिश करें, वह नाकाम ही रहेगा।
काठ का लट्टू जमीन पर घूमते हुए ही अच्छा लगता है। बहुत सी बार लट्टू को जमीन पर घुमाने के बजाए यदि सीधे हाथों में घुमाने के प्रयास करते समय लट्टू में ठुकी नुकीली कील हाथों में गड सकती है, और जख्म पैदा करती है।
पूँजी से लपेटे हुई व्यवस्था के मद में बनाएं गए बिल हाल ही में सत्ता को वापस लेना पड़े हैं।
बहुत से कथित बुद्धिजीवियों द्वारा वापस लिए गए बिलों को कृषकों के हित का बताने की पुरजोर शाब्दिक कौशिश की जा रही है।
किसी व्यक्ति,व्यवस्था,धर्म और किसी मान्यता का भगत होना अच्छी बात है, लेकिन किसी भी भगत को पूंजी,सत्ता और व्यक्ति की स्तुति कर चेतन नहीं होना चाहिए? यह आचरण तो व्यवस्था रूपी लट्टू को पूंजी की डोर से लपेटकर घुमाने के जनविरोधी नीति का समर्थन होता है।
बहुत से कथित बुद्धिजीवी जनांदोलन में शरीक तादाद को भीड़ की संज्ञा देकर तानाशाही का अप्रत्यक्ष समर्थन करतें हैं।
यह लोग भी पूंजी,व्यक्ति,और सत्ता केंद्रित राजनीति के पक्षधर ही होतें हैं।
व्यवस्था को लट्टू जैसा खिलौना समझकर व्यवस्था के साथ मनमर्जी से खेलना,उसपर पूंजी की डोर को कसकर लपेटने की कोशिश करना अलोकतांत्रिक सोच का ही प्रमाण है।
प्रत्येक खेल सिर्फ मनोरंजन के लिए ही नहीं होता जरूरी नहीं है।बहुत खेल मानव के ज्ञानवर्धन के लिए भी खेलें जातें हैं।
पूर्व में एक दूसरें से पहेलियां पूछी जाती है।यह खेल मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्धक भी होता था।पहेलियों के माध्यम से सामान्यज्ञान के प्रश्न पूछे जातें थे?इस खेल के कारण सामान्यज्ञान में वृद्धि होती थी।
वर्तमान में सामान्यज्ञान के प्रश्नों के खेल को पूंजीवाद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सामान्यज्ञान के प्रश्नों की कीमत करोड़ों में लगाई जा रही है।सामान्यज्ञान को भौतिक और पूँजीवाद के साथ जोड़ना देश की निर्धन जनता का मज़ाक उड़ाने जैसा प्रतीत होता है।
व्यवस्था को काठ का लट्टू समझकर उसपर पूंजी की डोर कितनी भी कसकर लपेटने की कौशिश करो सफलता नहीं मिलेगी।
भारत के लोकतंत्र कोई कमजोर नहीं कर सकता है। जो प्रकृति के विरोध में जाएगा वह मुँह की खाएगा।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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