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शोषक वर्ग की मीडिया का शब्द जाल

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राजेन्द्र प्रसाद

शब्द या चित्रों के माध्यम से जो गीत, प्रवचन, कविता, कहानी, समाचार, फिल्म, मीडिया द्वारा आप तक पहुँचाए जाते रहे हैं, जिसे देखकर सुनकर या समझकर आप का मानव शरीर प्रभावित होता है। उन सारी विधाओं को शोषक वर्ग की मीडिया ने हथियार बना लिया है। सूचनाओं या विभिन्न तथ्यों के अध्ययन से मनुष्य का अपना विचार या मन बनता है। 

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि शरीर को संचालित करने वाली ऊर्जा भोजन से उत्पन्न होती है। भोजन, कपड़ा, मकान आदि का उत्पादन और विनिमय करने से एक सामाजिक संरचना का निर्माण होता है। इसी क्रम में विनिमय की समस्या को हल करने के लिए निजी सम्पत्ति आती है जिससे दो वर्ग बनते हैं- शोषक और शोषित। शोषक और शोषित के बीच लगातार वर्ग संघर्ष चल रहा है। इस लड़ाई में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। अतः वर्ग विभाजित समाज में यह जो मन है, मनुष्य का अपना नहीं है, वह भी किसी वर्ग का है। शोषक या शोषित।

इस तथ्य को समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि हमारे मन का दो भाग है- एक चेतन मन और दूसरा अवचेतन मन। इनमें अवचेतन मन का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत होता है। ज्यादातर मामलों में मानव शरीर को यही अवचेतन मन ही संचालित करता है। जब हम साइकिल चला रहे होते हैं, तो हमारा चेतन मन काम करता है, उस वक्त बहुत डर लगा रहता है। किन्तु धीरे-धीरे साइकिल चलाने का ज्ञान हमारे अवचेतन मन में पहुँच जाता है, तब हमारा अवचेतन मन बिन्दास होकर साइकिल चलाता रहता है और हमारा चेतन मन इधर-उधर भागता रहता है।

शोषक वर्ग हमें जिस तरह का बनाना चाहता है उसी तरह की सूचना एवं वैसा ही विचार अपनी मीडिया के जरिये हमारे अवचेतन मन में उतारता रहता है। इसके लिए शोषक वर्ग दूसरे मनुष्य को सोचने-समझने व अन्य मानसिक गतिविधियों को नियंत्रित करने हेतु शब्द जाल की रचना करता है अर्थात हमारे आपके मन की रचना करता है। जाहिर है, शोषक वर्ग अपने हितों के अनुकूल ही आपका अवचेतन मन बनाना चाहेगा।  इसके विरुद्ध क्रान्तिकारी शक्तियाँ भी लगी हुई हैं, वे भी एक बेहतर कल के लिए, एक बेहतर मानव समाज के लिए मनुष्य के अवचेतन मन का निर्माण कर रही हैं। जहाँ शोषक वर्ग गाय, गोबर, गंगा, गीता, मंदिर, मस्जिद, श्मशान, कब्रिस्तान… का नाम लेकर आपके अवचेतन मन में अंधभक्ति घुसा रहा है। वहीं क्रान्तिकारी शक्तियाँ लगातार रोजी-रोटी, शिक्षा, सुरक्षा, चिकित्सा, कृषि, रोजगार… का सवाल उठाकर आपके अवचेतन मन में क्रान्ति का बीज डालकर आपको भगत सिंह की कतार में खड़ा करना चाहती हैं। आप अंधभक्त बनोगे या भगत सिंह? यह आपके अवचेतन मन पर पड़े प्रभाव से तय होता है।

रोजी-रोटी का सवाल तो विपक्षी मीडिया भी उठा रही है, मगर वह मौजूदा विकृत पूँजीवादी व्यवस्था को इसका जिम्मेदार नहीं बताती बल्कि इसके लिए वह सारा दोष सत्ताधारी पार्टी को देकर आपको प्रेरित करती है कि इस बार आप विपक्षी पार्टी को वोट देकर एक शरीफ आदमी की तरह पाँच साल तक घर में बैठे इन्तजार करते रहें। भाजपा लाओ-काँग्रेस हटाओ, फिर पाँच साल बाद काँग्रेस लाओ-भाजपा हटाओ।… अनन्तकाल तक यही करते रहें। शोषक वर्ग आप से यही तो चाहता है।

अगर आप नशाखोरी, जुआखोरी, अश्लीलता, व्यभिचार, करने का मन बना चुके हैं तो यह भी मत समझिए कि आप अपने मन का कर रहे हैं, शोषक वर्ग ही तो आपसे ऐसा चाहता है। अगर आप शरीफ बनने के नाम पर सिर्फ अपना ही पेट भरने में लगे हैं तो यह गंदी पशु प्रवृत्ति आप की अपनी नहीं है। अगर आप दूसरे गाल पर भी शोषक वर्ग का थप्पड़ खाने को तैयार हैं तो यह गाँधीगीरी भी आपकी अपनी नहीं है। शोषक वर्ग ही तो आप से ऐसा चाहता है।

अतः आप का मन, जिसे बड़े घमण्ड से अपना मान बैठे हैं, वह आपका अपना नहीं है। वह आपके दुश्मन यानी शोषक वर्ग का है या शोषित-पीड़ित वर्ग का है। आप किस वर्ग का बोझ ढो रहे हैं? आदमी का या आदमखोरों का?

‘‘तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो। आदमी के पक्ष में हो तुम, या कि आदमखोर हो।।’’*

*यह लेख मासिक पत्रिका नया अभियान के जनवरी अंक से लिया गया है

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