डॉ. विकास मानव
अस्तित्व की अनूठी, अलौकिक और दिव्यतम सर्जना “प्रेम और संभोग” को आज इतना विकृत कर दिया गया है कि 90% अपराध इसी के कारण हो रहे हैं।
विषय-प्रवेश से पूर्व एक बात, पहली बात स्पष्ट कर लेनी जरूरी है। यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि हम पैदा हो गये है, इसलिए हमें पता है : क्या है काम, क्या है संभोग।
कुछ पता नहीं है। नहीं पता होने के कारण ही जीवन पूरे समय काम और सेक्स में उलझा रहता है, व्यतीत होता है, मरता और मारता है।
सेक्स के लिए पशुओं का बंधा हुआ समय है। उनकी ऋतु है। उनके मौसम हैं। आदमी का कोई बंधा हुआ समय नहीं है। क्यों?
पशु शायद मनुष्य से ज्यादा संभोग की गहराई में उतरने में समर्थ है और मनुष्य उतना भी समर्थ नहीं रह गया है। क्या कभी किसी पशु-पक्षी ने एनल,ओरल सेक्स किया? क्या कोई मानवेतर मादा एकसाथ अनेक से सेक्स करवाई? हॉट स्त्री एक साथ अनेक नामर्दों को लाइन में लगा लेती है. चार राउंड के लिए बारह-बारह नामर्द (प्रति राउंड हेतु तीन) यूज कर लेती है : एक का लोथड़ा योनि में, दूसरे का गुदा में, तीसरे का मुंह में. वास्तविक मर्द मिलता नहीं, वर्ना एक ही ज्यादा सावित हो. और पुरुष? उसका वश चले, छेद अनुमति दें तो वह नाक-कान -आंख में भी घुसेड़ दे. इंसानी नर मादा तो पशु क्या, हैवान-सैतान से भी बदतर हैं. इतनी नीचता तो वे भी नहीं करते.
जिन लोगों ने जीवन के इन तलों पर बहुत खोज की है और गहराइयों में गये है और जिन लोगों ने जीवन के बहुत से अनुभव संग्रहीत किये है, उनको मेरे द्वारा प्रयुक्त किया जा रहा यह सूत्र उपलब्ध हुआ है :
“अगर योनि-लिंग का मंथन ‘विधिवत’ 05 मिनट चले तो अतृप्त इंसान तुरंत न सही, थोड़ी देर में फिर संभोग के लिए लालायित हो जायेगा। अगर 10 मिनट चले तो अतृप्ति अगले दिन विवश करेगी। अगर 30 मिनट चले तो तीन दिन, 45 मिनट चले तो 07 दिन और 60 मिनट चले तो 15 दिन तृप्ति बनी रहेगी. लेकिन अगर संभोग तीन घंटे तक रूक सके तो परम-तृप्ति! यानी इंसान जीवन भर के लिए मुक्त हो जायेगा। जीवन में सेक्स कल्पना भी नहीं उठेगी।”
जहाँ तक मेरी बात है, मैं 16 से 60 साल तक के जरूरतमंदों को एक घंटे तक ऐक्टिव रहने योग्य बनाता हूँ. मेडिटेशन से दो घंटे तक अपने वीर्य को डिस्चार्ज होने से रोक सकता हूँ, मतलब इतना सम्भोग कर सकता हूँ. तीन घंटे की क्षमता विकसित करना अभी मेरे लिए भी संभव नहीं हुआ है.
लोग जीवन भर संभोग के बाद भी ‘स्व’ को उपलब्ध नहीं होते। उलटे मर जाते हैं मन-मस्तिष्क, तन-बदन से रोगी होकर। क्या है ये? बूढ़ा हो जाता है इंसान मरने के करीब पहुंच जाता है और संभोग की कामना से मुक्त नहीं होता।
प्रेम की अर्थवत्ता, यौन ऊर्जा, पौरुष की महत्ता, स्पर्श की कला और संभोग के विज्ञान को इंसान ने समझा नहीं है।
आप कहेंगे कि एक क्षण से दो घंटे तक संभोग की दशा कैसे ठहर सकती है? ध्यान साधना से. सम्भोग साधना से. श्वास पर नियंत्रण जरूरी है. इसका मार्ग है- ध्यान।
संभोग करते क्षणों में क्षणों श्वास जितनी तेज होगी। संभोग का काल उतना ही छोटा होगा।
श्वास जितनी शांत और शिथिल होगी। संभोग का काल उतना ही लंबा हो जायेगा। अगर श्वास को बिलकुल शिथिल करने का थोड़ा अभ्यास किया जाये, तो संभोग के क्षणों को कितना ही लंबा किया जा सकता है।
संभोग के क्षण जितने लंबे होंगे, उतने ही संभोग के भीतर से सत्य का : निरहंकार भाव, इगोलेसनेस और टाइमलेसनेस का अनुभव शुरू हो जायेगा।
श्वास अत्यंत शिथिल होनी चाहिए। श्वास के शिथिल होते ही संभोग की गहराई अर्थ और उदघाटन शुरू हो जायेंगे।
दूसरी बात : संभोग के क्षण में ध्यान अपनी दोनों आंखों के बीच होना चाहिए, जहां योग आज्ञाचक्र बताता है। वहां अगर ध्यान केंद्रित होने लगे हो तो थोड़े दिनों में संभोग की सीमा- समय तीन घंटे तक भी बढ़ाया जा सकता है। मैं बढ़ा सकता था, नहीं बढ़ाया. दो घंटे पर रुका. इसलिए कि इससे अधिक इस धरती की स्त्री के लिए स्वीकार करना असंभव है. दूसरे ग्रह की धरती पर जाकर झंडा गाड़ने का मेरा इरादा नहीं है. यहां तो एक घंटे का स्वीकार भी असंभव है. कोई ही संभव कर लेती हैं.
आप कहेंगे, आजकल तो पूरी हॉटेस्ट हो रही हैं फीमेल्स. असल में यह दिखाया जाने वाला छलावाभरा झूठासच है, वास्तविक नहीं. यह महज दिखावा है, पाखंड है. अमूमन स्वयं को हॉट और सेक्सी दिखाने की नौटंकी की जाती है. हैं ज्यादातर ल्यूकोरिया, एनीमिया, ठंडेपन, यौनिक सड़न, मुर्देपन की शिकार ही. सामान्यत: आधे घंटे से अधिक अफ्रीकन लेडी भी नहीं ले पाती.
एक सफल संभोग भी व्यक्ति को सदा के लिए आनंद में प्रतिष्ठित कर देगा—न केवल एक जन्म के लिए, बल्कि अगले जन्म के लिए भी। अगर पिछले जन्म में किसी को गहरे संभोग की अनुभूति हुई हो तो नए जन्म के साथ ही वह अपरिमित सेक्स शक्ति युक्त पैदा होगा या होगी।
कोई अगर सोचता है कि बिना गहरे अनुभव के वह आनंदित हो सकता है तो सिर्फ पागल हो जायेगा। जो लोग अपाहिज सेक्स की ही कोशिश करते रहते है, वह विक्षिप्त होते हैं और कहीं भी नहीं पहुंचते, आज की ही तरह.
आनंद, तृप्ति अनुभव की निष्पति है। वह किसी गहरे अनुभव का फल है। वह अनुभव संभोग का ही अनुभव है। अगर वह अनुभव एक बार भी हो जाए तो अनंत जीवन की यात्रा के लिए ऊर्जा प्राप्त हो जाती है और मोक्ष के लिए भी.
उस गहराई के लिए जरूरी है कि श्वास शिथिल हो. इतनी शिथिल हो कि जैसे चलती ही नहीं।
ध्यान, सारी अटैंशन आज्ञा चक्र के पास हो। दोनों आंखों के बीच के बिन्दु पर हो। जितना ध्यान मस्तिष्क के पास होगा, उतनी ही संभोग की गहराई अपने आप बढ़ जायेगी। जितनी श्वास शिथिल होगी, उतनी लम्बाई बढ़ जायेगी। और आपको पहली दफा अनुभव होगा कि संभोग का आकर्षण नहीं है मनुष्य के मन में। मनुष्य के मन में परमानंद का, परम-तृप्ति का का आकर्षण है।
एक बार उसकी झलक मिल जाए, एक बार बिजली चमक जाये और हमें दिखाई पड़ जाये अंधेरे में कि रास्ता क्या है फिर हम रास्ते पर आगे निकल सकते है।
एक व्यक्ति एक गंदे घर में बैठा है। दीवालें अंधेरी है ओर धुएँ से पूती हुई है। घर बदबू से भरा हुआ है। लेकिन खिड़की खोल सकता है। उस गंदे घर की खिड़की में खड़े होकर वह देख सकता है दूर आकाश को तारों को सूरज को, उड़ते हुए पक्षियों को। और तब उसे उस घर के बहार निकलने में कठिनाई नहीं रह जायेगी।
जिस दिन इंसान को संभोग के भीतर तृप्ति की पहली, थोड़ी सह भी अनुभूति होती है उसी दिन सेक्स का गंदा मकान सेक्स की दीवालें अंधेरे से भरी हुई व्यर्थ हो जाती है आदमी बाहर निकल जाता है।
लेकिन यह जानना जरूरी है कि साधारणतया हम उस मकान के भीतर पैदा होते है। जिसकी दीवालें बंद है, अंधेरे से पुती हैं। जहां बदबू है जहां दुर्गंध है और इस मकान के भीतर ही पहली दफ़ा मकान के बाहर का अनुभव करना जरूरी है, तभी हम बहार जा सकते हैं। इस मकान को छोड़ सकते है। जिस आदमी ने खिड़की नहीं खोली ! उसी मकान के कोने में आँख बंद करके बैठ गया है कि मैं इस गंदे मकान को नहीं देखूँगा, वह चाहे देखे और चाहे न देखे।
वह गंदे मकान के भीतर ही है और भीतर ही रहेगा।
आँख बंद किये बैठे है,आप आँख खोले हुए बैठे है, इतना ही फर्क है। जो आप आँख खोलकर कर रहे है, वह आँख बंद कर के भीतर कर रहे हैं। जो आप शरीर से कर रहे हैं, वह ही मन से कर रहे हैं। कोई फर्क नहीं है।
इसलिए संभोग के प्रति दुर्भाव छोड़ दे। समझने की चेष्टा, प्रयोग करने की चेष्टा करें और संभोग को एक पवित्रता की स्थिति दें : पूजा-साधना के भाव से।
तीसरी बात : एक भाव दशा चाहिए संभोग के पास जाते समय। वैसा भाव-दशा जैसे कोई मंदिर के पास जा रहा है। क्योंकि संभोग के क्षण में हम परमात्मा के निकटतम होते हैं। इसीलिए तो संभोग में परमात्मा सृजन का काम करता है। नये जीवन को जन्म देता है। हम क्रिएटर के निकटतम होते हैं।
संभोग की अनुभूति में हम सृष्टा के निकटतम होते हैं. इसीलिए तो हम मार्ग बन जाते है। एक नया जीवन हमसे उतरता है। गतिमान हो जाता है। हम जन्मदाता बन जाते है।
क्यों? क्योंकि सृष्टा के निकटतम है वह स्थिति। अगर हम पवित्रता से प्रार्थना से सेक्स के पास जायें तो हम परमात्मा की झलक को अनुभव कर सकते है। हम तो सेक्स के पास घृणा एक दुर्भाव, हवस, भोगने की वासना, एक कंडेमनेशन के साथ जाते हैं। इसलिए दीवाल खड़ी हो जाती है। और परमात्मा का यहां कोई अनुभव नहीं हो पाता है। सेक्स के पास ऐसे जाएं, जैसे की मंदिर में जा रहे है। पत्नी को ऐसा समझें, जैसे की वह प्रभु है। पति को ऐसा समझें कि जैसे कि वह परमात्मा है। गंदगी में क्रोध में कठोरता में द्वेष में, ईर्ष्या में, जलन में चिन्ता के क्षणों में कभी भी सेक्स के पास न जायें।
होता उलटा है। जितना आदमी चिन्तित होता है। जितना परेशान होता है। जितना क्रोध से भरा होता है। जितना घबराया होता है, जितना एंग्विश में होता है। उतना ही ज्यादा वह सेक्स के पास जाता है। आनंदित आदमी सेक्स के पास नहीं जाता। देखी आदमी सेक्स की तरफ जाता है। क्योंकि दुख को भुलाने के लिए इसको एक मौका दिखाई पड़ता है।
स्मरण रखें : जब आप दुःख में जायेंगे, चिंता में जायेंगे, उदास हारे हुए जायेगे, क्रोध में लड़े हुए जायेंगे। तब आप कभी भी सेक्स की उस गहरी अनुभूति को उपलब्ध नहीं कर पायेंगे।
जिसका की प्राणों में प्यास है। तृप्ति की झलक वहां नहीं मिलेगी। लेकिन यहां उलटा होता है। जब आनंद में हों, जब प्रेम में हों, जब प्रफुल्लित हों और जब प्राण ‘प्रेयर फुल’ हों। जब ऐसा मालुम पड़े कि आज ह्रदय शांति से और आनंद से कृतज्ञता से भरा हुआ है, तभी क्षण है—तभी क्षण है संभोग के निकट जाने का। और वैसा व्यक्ति संभोग से समाधि को उपलब्ध होता है। एक बार भी परम-तृप्ति की एक किरण मिल जाये, तो कुत्सित संभोग, दुराचार से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। परमानंद में गतिमान हो जाता है।
स्त्री और पुरूष का मिलन एक बहुत गहरा अर्थ रखता है। स्त्री और पुरूष के मिलन में पहली बार अहंकार टूटता है और हम किसी से मिलते है। मां के पेट से बच्चा निकलता है और दिन रात उसके प्राणों में एक ही बात लगी रहती है जैसे की हमने किसी वृक्ष को उखाड़ लिया जमीन से।
उस पूरे वृक्ष के प्राण तड़पते है कि जमीन से कैसे जुड़ जाये। क्योंकि जमीन से जुड़ा हुआ होकर ही उसे प्राण मिलता था। रस मिलता था जीवन मिलता था। व्हाइटालिटी मिलती थी। जमीन से उखड गया तो उसकी सारी जड़ें चिल्लायेगी कि मुझे जमीन में वापस भेज दो। उसका सारा प्राण चिल्लायेगा कि मुझे जमीन में वापस भेज दो।
वह उखड गया टूट गया। अपरूटेड हो गया।
आदमी जैसे ही मां के पेट से बाहर निकलता है, अपरूटेड हो जाता है। वह सारे जीवन और जगत से एक अर्थ में टूट गया। अलग हो गया। अब उसकी सारी पुकार और सारे प्राण की आकांशा जगत और जीवन और अस्तित्व से, एग्ज़िसटैंस से वापस जुड़ जाने की है। उसी पुकार का नाम प्रेम और प्यास है।
प्रेम का और अर्थ क्या है? हर आदमी चाह रहा है कि मैं प्रेम पाऊँ और प्रेम करूं। प्रेम का मतलब क्या है? प्रेम का मतलब है कि मैं टूट गया हूं, आइसोलेट हो गया हूं। अलग हो गया हूं। मैं वापस जुड़ जाऊँ जीवन से।
लेकिन इस जुड़ने का गहरे से गहरा अनुभव मनुष्य को सेक्स के अनुभव में होता है। स्त्री और पुरूष को होता है। वह पहला अनुभव है जुड़ जाने का। और जो व्यक्ति इस जुड़ जाने के अनुभव को—प्रेम की प्यास, जुड़ने की आकांशा के अर्थ में समझेगा,वह आदमी एक दूसरे अनुभव को भी शीध्र उपलब्ध हो सकता है।
योगी जुड़ता है, साधु भी जुड़ता है। संत भी जुड़ता है, समाधिस्थ व्यक्ति भी जुड़ता है। संभोगी भी जुड़ता है। संभोग करने में दो व्यक्ति जुड़ते है। एक व्यक्ति दूसरे से जुड़ता है और एक हो जाता है। समाधि में एक व्यक्ति समष्टि से जुड़ता है और एक हो जाता है। संभोग दो व्यक्तियों के बीच मिलन है। समाधि एक व्यक्ति और अनंत के बीच मिलन है।
स्वभावत: दो व्यक्ति का मिलन क्षण भर को हो सकता है। एक व्यक्ति और अनंत का मिलन अनंत के लिए हो सकता है। दोनों व्यक्ति सीमित है। उनका मिलन असीम नहीं हो सकता। यही पीड़ा है, यहीं कष्ट है, सारे दांपत्य का, सारे प्रेम का कि जिससे हम जुड़ना चाहते हैं उससे भी सदा के लिए नहीं जुड़ पाते। क्षण भर को जुड़ते हैं और फिर फासले हो जात हैं।
फासले पीड़ा देते हैं। फासले कष्ट देते हैं। निरंतर दो प्रेमी इसी पीड़ा में परेशान रहते हैं कि फासला क्यों है। हर चीज फिर धीरे-धीरे ऐसी मालूम पड़ने लगती है कि दूसरा फासला बना रहा है। इसीलिए दूसरे पर क्रोध पैदा होना शुरू हो जाता है। अद्वैत यानी अर्धनारीश्वर का स्टेज कौन कहे, पति-परमेश्वर नहीं पतन का, शोषण का, सत्यानाश का आधार सावित होता है.
पति की पतितता, शीघ्र पतन के कारण पत्नी परमेश्वरी नहीं, विवाद-विध्वंश की आघार सावित होती है या तन-मन से रोगी और अपाहिज। तो अब अगर क्षमता- पात्रता का विकास करना है, यौन चिकित्सा चाहिए, स्त्री को दुराचारमुक्त चरम संतुष्टि लेनी है, दिव्यतम संतान को जन्म देना है : निःशुल्क सेवा सुलभ है, आपका स्वागत है.

