अग्नि आलोक

विश्व कठपुतली दिवस*…..काठ की कठपुतलियां हाड़ ,मांस से बने इंसान को इंसानियत सीखाती हैं…..

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मनोज कुमार सिंह

    आदिम काल से लेकर आज तक मनुष्य अपने फुर्सत के समय में किसी न किसी तरह के मनोरंजन के साधनों को अपनाता रहा है। कठपुतली नाट्य कला मनुष्य द्वारा अपनाए जाने वाले साधनों में एक स्वस्थ, संदेशप्रद, शालीन, सभ्य, नैतिकता से ओतप्रोत और मानवीय मूल्यों का बोध कराने वाले मनोरंजन के साधनों के रूप में सदियों से जानी जाती रही हैं। परन्तु आधुनिक दौर में तकनीकी , प्रौद्योगिकी, मशीनीकरण ने हस्तकला आधारित मनोरंजन के साधनों और औजारों को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया । तेजी से पांव पसारती उपभोक्तावादी संस्कृति टीवी, फिल्म,बेबसीरिज, तरह-तरह के धारावाहिको , कानफोड़ू डीजे कल्चर के चक्कर और घनचक्कर में लोगों ने कठपुतली नाट्य कला को भूला दिया। मोबाइल और लैपटॉप पर होने वाली चैटिंग और विविध प्रकार गेमो ने तो कठपुतली नाट्य कला को लगभग हाशिए पर धकेल दिया। इसीलिए नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों का बोध कराने वाले मनोरंजन के इस स्वसथ साधन और माध्यम को जन-जन में जीवंत करने के लिए हर वर्ष 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। संयोग से विश्व कठपुतली दिवस उस दिन मनाया जाता है जब पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध पर दिन और रात बराबर होते हैं। यूरोप के पुनर्जागरण काल के अंतरिक्ष वैज्ञानिक कोपरनिकस ने बताया था कि-पृथ्वी सूर्य का परिक्रमा 364-1/4 दिन में कर लेती हैं । भूगोलवेत्ताओं के अनुसार पृथ्वी की इसी परिक्रमा के नियम के अनुसार  21 मार्च को दिन और रात बराबर होते हैं । संयोग से प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को ही विश्व कठपुतली दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।

          कठपुतली नाट्य कला के सिद्धहस्त कलाकार परदे के पीछे से सुतली, धागे या रस्सी के सहारे मंच पर प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी कठपुतलियों पर जब अपनी जादुई उंगलियों को फेरते हैं तो कठपुतलियाॅ जीते-जागते इंसानों की तरह बोल उठती हैं। मंच पर कठपुतलियों का मनमोहक नृत्य और अभिनय दर्शको का मन बरबस मोह लेता है। किसी कथा, कथा नक और कहानी कहने का सहज सरल और आकर्षक माध्यम है कठपुतली नाट्य कला। नाट्यकला और रंगमंच के इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि- कठपुतली नाट्य कला स्वस्थ मनोरंजन के सरल सहज सशक्त और आकर्षक माध्यम के रूप में अत्यंत प्राचीन काल से विश्व के अधिकांश हिस्सों मे व्याप्त रही है। कालक्रमेण कठपुतली नाट्य कला स्वस्थ मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान-विज्ञान का समुचित बोध कराने, शिक्षा ,सूचना और विचारों के सम्प्रेषण का माध्यम तथा इससे जुड़े कलाकारों के आजीविका का साधन बन गई। हमारे जनजीवन और लोक मनोरंजन से लगभग मृतप्राय हो रही है।कठपुतली नाट्य कला कै माध्यम से शिक्षण कार्य को रोचक बनाया जा सकता है। कुप्रथाओं, कुरीतियों और अन्य सामाजिक समस्याओं को मिटाने के लिए कठपुतली विधा बेहतरीन माध्यम हो सकती है।

             कठपुतली नाट्य कला के विकास, सम्बर्द्धन और सशक्तिकरण को ध्यान में रखकर कठपुतली दिवस मनाने का विचार सर्वप्रथम ईरान के कठपुतली नाट्य मर्मज्ञ और प्रस्तोता जावेद जोलपाघरी ने प्रस्तुत किया। वर्ष 2000 में माण्डेबुर्ग में 18वीं Union Internationale de la Marionnetee ( UNIMA) सम्मेलन के दौरान यह प्रस्ताव विचार हेतु रखा गया। दो वर्ष बाद इस प्रस्ताव को जून 2002 के जून महीने में अटलांटा में काउंसिल द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। सर्वप्रथम फ्रांस में वर्ष 2003 मे विश्व कठपुतली दिवस मनाया गया तबसे कठपुतली दिवस मनाने का चलन-चलन सम्पूर्ण विश्व में फैलने लगा।  

  अपनी अद्वितीय सम्प्रेषण दक्षता और ग्रहणशीलता के कारण कठपुतली नाट्य कला प्राथमिक स्तर तथा उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों के लिये शिक्षण-प्रशिक्षण का सशक्त और लोकप्रिय माध्यम हो सकती हैं। पौराणिक और ऐतिहासिक विभूतियों के जीवन चरित्र पर आधारित कठपुतली नाट्य कला के प्रदर्शन से चरित्र निर्माण में सहायता मिल सकती हैं। मंनोरंजन के नित नवीन विकसित होते माध्यमों के कारण कठपुतली नाट्य कला लगभग विलुप्ति के कगार पर है। इसके साथ ही साथ इसके माध्यम से आजीविका चलाने वाले लोगों के समक्ष भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। नृत्य कला, चित्रकला , मूर्तिकला और संगीत कला को समिश्रित किए कठपुतली नाट्यकला भारतीय समाज में अत्यंत प्राचीन काल से चलन-कलन में रही है।

     सामान्यतः पुतलों का प्रयोग हमारे देश के किसान अपने खून पसीने की कमाई फसल की रक्षा के लिए करते हैं। अपनी चुनी हुई सरकार, चुने हुए जनप्रतिनिधियों के खिलाफ़ अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने के लिए जनता द्वारा पुतला दहन का कार्यक्रम आमतौर पर देखा जा सकता है। हर वर्ष दशहरा के अवसर पर रावण का पुतला दहन करने का रिवाज सदियों पुराना है। परन्तु पुतला के माध्यम नाट्यकला कौशल का उल्लेख ईसापूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी कृत अष्टाध्यायी में नटसूत्र में मिलता है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती जी का मन बहलाकर इस नाट्यकला की शुरुआत किया था। सिंहासन बत्तीसी में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख मिलता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि- राजतंत्रीय परम्पराओं में हर कला का विकास राजमहलों की अनुकम्पा पर निर्भर था। भारत वर्द्धन वंश के शासकों ने कठपुतली नाट्यकला को संरक्षण और प्रश्रय दिया। वर्द्धन वंश के शासकों के शासन काल में इस कला का फैलाव भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यान्मार, जावा श्रीलंका इत्यादि में हुआ।
 पारम्परिक भारतीय कठपुतली नाट्यकला में पौराणिक कथाओं, मिथकों और कहानियों जैसे अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, लैला मजनूँ, शीरी फरहाद तथा भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडो के महापुरुषों राजा हरिश्चंद्र, भक्त पूरन मल, श्रवण कुमार, भर्तृहरि, सती सावित्री इत्यादि के चरित्र को आधार बनाकर मंचन किया जाता था। आज इसका समसामयिक प्रयोग प्रौढ शिक्षा, परिवार नियोजन, विज्ञापन इत्यादि में किया जाता है। उत्तर भारत में राजस्थान में कठपुतली नाट्यकला आज भी लोकप्रिय है। आज विश्व कठपुतली दिवस पर इस कला को लुप्त होने से बचाने के लिए संकल्प लेना चाहिए। समाचार चैनल एन डी टी वी पर कठपुतली नाट्यकला पर आधारित ” गुस्ताखी माफ हो ” खूब चर्चित रहा।

लोक जागरण के सशक्त माध्यम कठपुतली नाट्यकला को फिर से व्यापक, विस्तारित और लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है। महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की माटी के सपूत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित उत्कृष्ट रंगकर्मी श्री मिथिलेश दुबे अपनी संस्था क्रिएटिव पपेट थिएटर के माध्यम से ” *मोहन से महात्मा ” कठपुतली नाट्य कला का देश के विभिन्न हिस्सों में मंचन करते आ रहे हैं। मिथिलेश दूबे जी विगत आठ वर्षो से कठपुतली नाट्य कला पर गम्भीरता से कार्य कर रहे हैं। मिथिलेश दूबे जी स्वाधीनता आंदोलन के नायकों के व्यक्तित्व पर आधारित कथानक तैयार कर कठपुतली नाट्य कला का मंचन देश के विभिन्न शहरों में करते आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रोढ शिक्षा, परिवार नियोजन, नारी सशक्तिकरण,पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित विषयों पर कथानक तैयार कर मंचन का कार्य करते हैं। जिन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर देश के अधिकांश बुद्धिजीवी बहस करते हैं इन समस्याओं को कठपुतली नाट्य कला के माध्यम से हम जनमानस को सहजता से समझा सकते हैं। 

इस तरह कठपुतली नाट्य कला के माध्यम से देश की विविध समस्याओं के प्रति जनमानस को जागरूक कर सकते हैं। इसके साथ कठपुतली नाट्य कला के माध्यम से स्वस्थ मनोरंजन के साथ साथ अपने समाज के नैतिक मूल्यों, आदर्शो और मर्यादाओ को समाज स्थापित, विस्तारित , व्यापक और मजबूत कर सकते हैं। इस नाट्यकला के माध्यम से भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों, कुप्रथाओं और असंगत रूढियों को दूर किया जा सकता है।

     वैसे तो कठपुतली नाट्य कला का फैलाव प्रशांत महासागर के पूर्वी छोर से पश्चिमी छोर तक पाया जाता हैं परन्तु आधुनिक दौर में भारत में यह कला बेहद संकट के दौर से गुजर रही हैं। कठपुतली नाट्य कला को विगत वर्षों में स्कील इंडिया कार्यक्रम से जोड़ा गया है। जिसके माध्यम से कलाप्रेमी युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराया जा सके। कठपुतली नाट्य कला को संरक्षित करने के लिए जन जन में जागरूकता लाई जाए तथा स्वस्थ सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश निर्मित किया जा सके।

मनोज कुमार सिंह
जिला अध्यक्ष – जन संस्कृति मंच मऊ
लेखक / साहित्यकार / उप सम्पादक- कर्मश्री मासिक पत्रिका
आवास ….घोसी जनपद मऊ ( यूपी)
मोबाईल ….8707738754

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