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**विश्व आदिवासी दिवस: भारत में आदिवासियों की स्थिति, सरकारी नीतियां और उनके अस्तित्व का संघर्ष**

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*लेखक : हरिशंकर पाराशर

हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस (विश्व के स्वदेशी लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस) मनाया जाता है, जो आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक विरासत, उनके योगदान और अधिकारों की सुरक्षा के लिए समर्पित है। भारत में लगभग 10 करोड़ की आबादी के साथ 700 से अधिक आदिवासी जनजातियां मौजूद हैं, जो देश की सांस्कृतिक और जैव-विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये समुदाय प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव रखते हैं और जल, जंगल, जमीन के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं। फिर भी, आधुनिक विकास और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के बीच इनका अस्तित्व खतरे में है। इस विश्व आदिवासी दिवस पर, हम सरकारी नीतियों, उनके लाभ और आदिवासियों के समक्ष मौजूदा चुनौतियों का विश्लेषण करते हैं।

 *सरकारी नीतियां और आदिवासियों को लाभ*

भारत सरकार ने आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए कई नीतियां और योजनाएं लागू की हैं। इनमें से कुछ प्रमुख योजनाएं इस प्रकार हैं:

1. **प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान (PM-JANMAN)**: वर्ष 2023 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) को मुख्यधारा में लाना है। इसके तहत सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थायी आजीविका के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। यह योजना 75 PVTG समुदायों को लक्षित करती है, जो अत्यंत पिछड़े और अलग-थलग क्षेत्रों में रहते हैं।

2. **अनुसूचित जनजाति के लिए कल्याणकारी योजनाएं**: सरकार ने आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के माध्यम से आदिवासियों को स्वास्थ्य, गैस कनेक्शन, बैंकिंग और कृषि सहायता प्रदान की है। ये योजनाएं ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाने में मदद कर रही हैं।

3. **वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006)**: यह कानून आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार प्रदान करता है, जिससे उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती है। हालांकि, इसके कार्यान्वयन में कई राज्यों में देरी और चुनौतियां देखी गई हैं।

4. **शिक्षा और कौशल विकास**: आदिवासी क्षेत्रों में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) और कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इन स्कूलों का उद्देश्य आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है ताकि वे मुख्यधारा में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

इन नीतियों के परिणामस्वरूप, कई आदिवासी समुदायों को बुनियादी सुविधाएं, जैसे बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं, उपलब्ध हुई हैं। उदाहरण के लिए, PM-JANMAN के तहत कई PVTG गांवों में पहली बार बिजली और पक्की सड़कें पहुंची हैं। हालांकि, इन योजनाओं का लाभ सभी समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है, और नौकरशाही बाधाएं, भ्रष्टाचार और जागरूकता की कमी इसके प्रभाव को सीमित करती हैं।

*आदिवासियों के समक्ष चुनौतियां और अस्तित्व का संघर्ष*

भारत में आदिवासी समुदाय कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जो उनके अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान को खतरे में डाल रही हैं:

1. **विस्थापन और भूमिहीनता**: विकास परियोजनाएं, जैसे बांध, खनन और औद्योगिक गतिविधियां, आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से विस्थापित कर रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों में 47% आदिवासी हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भूमिहीनता की दर राष्ट्रीय औसत (8.2%) से कहीं अधिक है, जो आदिवासी पहचान और आजीविका के लिए खतरा है।

2. **शिक्षा और स्वास्थ्य में कमी**: आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी एक बड़ी समस्या है। ‘आदिवासी आजीविका की स्थिति’ रिपोर्ट के अनुसार, मध्य भारत में कई आदिवासी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, और जो जाते हैं, उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी कुपोषण और बीमारियों को बढ़ावा देता है।

3. **सांस्कृतिक और भाषाई संकट**: विश्व भर में 7,000 आदिवासी भाषाओं में से 40% विलुप्त होने की कगार पर हैं, और भारत भी इससे अछूता नहीं है। आदिवासी युवा आर्थिक उन्नति के लिए मुख्यधारा की भाषाओं को अपना रहे हैं, जिससे उनकी सांस्कृतिक विरासत खतरे में है।

4. **आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार**: आदिवासी समुदाय अक्सर मुख्यधारा से कटे रहते हैं, जिसके कारण उन्हें रोजगार, बाजार और सामाजिक समावेशन में बाधाएं आती हैं। स्वैच्छिक अलगाव में रहने वाले समुदाय, जैसे अंडमान के सेंटिनलीज और जारवा, बाहरी संपर्क से होने वाली बीमारियों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।

 *वर्तमान में संघर्षरत आदिवासी समुदाय*

भारत में लगभग 461 से 700 आदिवासी जनजातियां हैं, जिनमें से 75 को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ये समुदाय, जैसे ओडिशा की बोंडा, छत्तीसगढ़ की बैगा, और अंडमान की सेंटिनलीज जनजातियां, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनके सामने निम्नलिखित समस्याएं प्रमुख हैं:

– **प्रकृति से दूरी**: जंगलों की कटाई और खनन गतिविधियों के कारण इनके प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच सीमित हो रही है।

– **विस्थापन का दर्द**: मध्य प्रदेश में 46 और झारखंड में 32 जनजातियां हैं, जो विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन का सामना कर रही हैं।

– **सामाजिक उपेक्षा**: कई समुदायों को अभी भी सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी प्रगति बाधित होती है।

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विश्व आदिवासी दिवस न केवल आदिवासियों के योगदान को याद करने का अवसर है, बल्कि उनकी चुनौतियों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने का भी मौका है। सरकार को चाहिए कि:

– **FRA का प्रभावी कार्यान्वयन**: वन अधिकार अधिनियम को और मजबूत कर आदिवासियों को उनकी जमीन का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

– **शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश**: आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों और अस्पतालों की संख्या बढ़ाई जाए, साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर दिया जाए।

– **सांस्कृतिक संरक्षण**: आदिवासी भाषाओं और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए जाएं।

– **जागरूकता और समावेशन**: आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि वे सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ उठा सकें।

विश्व आदिवासी दिवस हमें याद दिलाता है कि आदिवासी समुदाय भारत की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। सरकारी नीतियों ने उनके जीवन में कुछ सुधार लाए हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विस्थापन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों पर केंद्रित प्रयासों से ही आदिवासियों का सशक्तिकरण संभव है। इस दिवस पर, हम सब मिलकर इन समुदायों के अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का संकल्प लें, ताकि एक अधिक समावेशी और टिकाऊ भविष्य का निर्माण हो सके।

**लेखक**: हरिशंकर पाराशर  

**प्रकाशन हेतु प्रेषित**: यह लेख विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासियों की स्थिति, सरकारी नीतियों और उनके समक्ष चुनौतियों को रेखांकित करता है। इसे अखबार के आदिवासी विशेषांक में प्रकाशन के लिए प्रेषित किया जाता है।

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