राजनीति में कोई सगा नहीं होता और न कोई स्थाई दुश्मन। भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र बहुत हद तक चुनावों तक सीमित है, वहां सारी नीतियां चुनावी समीकरण के आधार पर ही बनाई जाती हैं। इसी हकीकत के बीच केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी के समाने यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या वह धरने पर बैठे पहलवानों को नजरअंदाज करके जाटों को नाराज कर रही है? और अगर जाट नाराज हुए तो चुनावों पर क्या असर पड़ेगा? जाट समुदाय खासकर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान के कुछ इलाकों और थोड़े-बहुत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दबदबा रखते है। बीजेपी ने जाट दबदबे वाले प्रदेश हरियाणा में अपने लिए गैर-जाट वोटरों का बड़ा वर्ग तैयार कर लिया है। यह वर्ग जाटों को मात देने के लिए बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा हो रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए यही जाट समुदाय चुनावों में रक्षक की भूमिका निभाता है। दरअसल, यूपी में यादव मतदाता चुनावों की दृष्टि से एक बहुत बड़ा फैक्टर हैं जो पारंपरिक तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ डटे हैं। ऐसे में प्रदेश के जाट दबदबा वाले क्षेत्रों में बीजेपी बेहतर करने की स्थिति में रहती है, बशर्ते इस समुदाय को पार्टी से कोई शिकायत नहीं हो।

पहलवानों के धरने से सांसत में बीजेपी
अब जब हरियाणा के जाट समुदाय से आने वाले पहलवानों का एक जत्था धरने पर है और भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर गंभीर आरोप लगाकर उन पर कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, तो बीजेपी सांसत में फंस गई है। बृजभूषण बीजेपी के सांसद और राजपूत हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए फैसला करना आसान नहीं है। इसका बड़ा कारण यह है कि यूपी में जाटों का समर्थन हासिल करके यादवों के सपा की तरफ ध्रुवीकरण से होने वाले नुकसान को कम करने में बीजेपी को सफलता मिली। पार्टी को अहसास है कि यूपी में जाट नाराज हुए तो उसे इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी है।
यूपी में बीजेपी को झटका देने लगे जाट
पिछले साल हुए यूपी विधानसभा चुनावों में जाट मतदाता आधारित पार्टी राष्ट्रील लोक दल (RLD) में जान लौट आई क्योंकि जाटों ने बीजेपी की तरफ से मुंह फेर लिया। तब आरएलडी को आठ विधानसभा सीटों पर सफलता मिली। फिर हाल ही में नगर पंचायत और नगर पालिका चेयरमैन के चुनाव हुए। जिन जिलों में जाटों का दबदबा था, वहां आरएलडी और उसके गठबंधन दल समाजवादी पार्टी (SP) ने अपना प्रदर्शन सुधार लिया।
दूसरी तरफ बीजेपी का इन इलाकों में प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश चौधरी भी जाट समुदाय से हैं। उनका क्षेत्र मुरादाबाद हो या पार्टी सांसद संजीव बालियान का मुजफ्फरनगर या फिर सांसद सत्यपाल सिंह का क्षेत्र बागपत, बीजेपी की उम्मीदें हर जगह टूटीं। बीजेपी को इन तीन जिलों की कुल 56 नगरपालिका चैयरमैन सीटों में सिर्फ 20 जबकि कुल 124 नगर पंचायत चेयरमैन सीटों में सिर्फ 34 पर जीत मिली।
चार राज्यों की 40 लोकसभा सीटों पर जाटों का प्रभाव
अगले वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए जब विरोधी दलों में एकजुटता की कवायद जोर पकड़ रही है और जब बीजेपी अपना पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ने का सपना देख रही है, तो यूपी के इस नमूने से अच्छा संकेत नहीं मिल रहा है। लोकसभा सीटों के नजरिए से देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की दर्जनभर संसदीय सीटों पर दबदबा है। अगर हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को भी जोड़ दें तो जाट करीब-करीब 40 लोकसभा सीटों पर जीत-हार तय करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
यूं बीजेपी के साथ आए जाट
2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से पहले जाटों का झुकाव बीजेपी की तरफ नहीं था। लेकिन दंगे के अगले साल 2014 में लोकसभा चुनाव हुए और जाटों ने अपने नेता अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी से मुंह मोड़ लिया। जाटों के बीजेपी की तरफ रुख करने के कारण 2017 में हुए यूपी विधानसभा चुनावों में बीजेपी के 15 में से 14 कैंडिडेट जीत गए। हालांकि, अगले पांच सालों में ही स्थितियां बदल गईं। 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में बीजेपी के पास सबसे अधिक 10 जाट विधायक तो हैं, लेकिन आरएलडी और सपा ने क्रमशः चार और तीन विधायकों के साथ पहले से बेहतर कर लिया।
राजनीति पर जाटों का पुराना दबदबा
उत्तर भारत की राजनीति पर जाटों का ऐतिहासिक रूप से दबदबा रहा है। 1950 और 60 के दशकों में चौधरी देवी लाल और रणबीर सिंह हुड्डा (हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के पिता) प्रमुख जाट नेता हुआ करते थे। तब पंजाब और हरियाणा का बंटवारा नहीं हुआ था। दोनों एक ही प्रदेश था- पंजाब। उधर, राजस्थान में नाथूराम मिर्धा और यूपी में चौधरी चरण सिंह (अजित सिंह के पिता) जाटों के सर्वमान्य नेता हुआ करते थे। 1966 में हरियाणा बनने के बाद 25 प्रतिशत से ज्यादा जाट नए राज्य में आ गए। तब बंशी लाल जैसे जाट नेता का उभार हुआ।
देवी लाल से बंशी लाल और अब परिवारों तक की जाट राजनीति
चौधरी चरण सिंह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनकी पूछ सिर्फ जाटों में नहीं बल्कि अन्य जातियों और यहां तक कि मुसलमानों में भी थी। वो 1979-80 में करीब-करीब छह महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री भी बने। चरण सिंह की मई 1987 में निधन हो गया और उनके बाद कोई भी जाट यूपी का सीएम नहीं बन सका। चरण सिंह के बाद जाटों के लिए सबसे अच्छी स्थिति तब बनी जब 1989 में नैशनल फ्रंट की केंद्र में सरकार बनी और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। उन्हें जाट समुदाय का पूरा समर्थन हासिल था। तब देवी लाल जाटों के बड़े नेता थे और उन्हें उप-प्रधानमंत्री बनाया गया। उसी वीपी सिंह कैबिनेट में अजित सिंह भी थे। मौजूदा उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी तब वीपी सिंह के साथ हुआ करते थे। बाद में वीपी सिंह और देवी लाल के बीच मतभेद शुरू हो गए और देवी लाल को वीपी सिंह मंत्रिमंडल से निकाल दिया गया।
मंडल कमीशन ने बिगाड़ा जाटों का समीकरण
जब वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का फैसला लिया तो जाट समुदाय को केंद्र सरकार की ओबीसी लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। जाटों ने आरक्षण का विरोध किया तो उसकी पिछड़े वर्ग (OBC) से अनबन बढ़ गई। इस कारण जाटों का सामाजिक समीकरण बिगड़ा और ओबीसी की अन्य जातियों के साथ मिलकर वो जो दबदबा बनाते थे, वो अब संभव नहीं रहा। ध्यान रहे, यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में जाटों को ओबीसी का दर्जा मिला है, लेकिन केंद्रीय आरक्षण सूची से वो आज भी बाहर हैं। राजस्थान के दो जिले भरतपुर और धौलपुर अपवाद हैं जहां वो केंद्रीय ओबीसी सूची में भी हैं।
राम मंदिर आंदोलन से हाशिए पर गई जाट पॉलिटिक्स
हरियाणा की बात करें तो भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (INLD) के रूप में देवी लाल की विरासत चलती रही, लेकिन बाद में पार्टी परिवार के ही दो गुटों में बंट गई। आईएनएलडी का विधानसभा चुनावों में काफी खराब प्रदर्शन रहा है। वहीं, परिवार की नई पार्टी- जननायक जनता पार्टी (JJP) ने हरियाणा में बीजेपी के साथ चुनाव बाद गठबंधन करके सत्ता में हिस्सेदारी ले ली। उधर, उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन के बाद राजनीति ने नई करवट ली और जाट राजनीतिक रूप से हासिए पर चले गए।
क्या जाट और बीजेपी रिस्क लेने के मूड में हैं?
1990 के दशक के बाद से यूपी में जाटों ने पहले मुलायम सिंह यादव की सपा और अब बीजेपी के जरिए सत्ताधारी दलों के साथ सांठगांठ बिठाते रहे और फिर हाशिए से केंद्र की तरफ बढ़ने लगे। अब स्थितियां फिर से बदलती दिखने लगी हैं। सवाल है कि क्या हरियाणा में तो दो बार से गैर-जाट सीएम बन ही रहा है, क्या यूपी में भी जाट अपनी राजनीतिक हैसियत घटाएंगे? सवाल यह भी है कि क्या बीजेपी जाटों के खुद से दूर जाने का खामियाजा भुगतने की स्थिति में है?