क्या बेटे को रोजगार है, कृषि उपज को दाम?
मेहनतकश जो ढूंढ रहा है, मिला उसे कुछ काम?
टीवी चैनल पर तकरीरें ,खुशहाली की होती!
बदहाली का ये आलम ,आधी आबादी रोती!
कैसे बीत रहे हैं, दिन और कैसी गुजरी रात।
लिखो कवि सच सच दिल की बात।
चंद धनिक मालिक बन बैठे, रेल ,तेल,संसाधन के
निजीकरण की गति तीव्र , ये फल लोकतंत्र आराधन के?
रोजगार सब ठप्प पड़े हैं,किसको व्यथा सुनाएं
भय के मारे मौन हुए हैं, क्या अपनी पीठ धुनाएँ।
भूखी रह जाती है मैया, और कभी हमारे तात।
लिखो कवि सच सच दिल की बात।
भाईचारा भंग हुआ है, निर्बल बहुत ही तंग हुआ है।
कुदरत ने बख्शे है हमको, मजहब का भी रंग हुआ है।।
पुरखे थे करुणा के सागर, अब अपनों में जंग हुआ है।
सद्भावों के झरने सूखे, क्यों इंसां का दिल संग हुआ है?
धनपशुओं की झोली भरी है, खाली अपने गात।
लिखो कवि सच सच दिल की बात।
लिखो कवि सच सच दिल की बात।।
-हनुमान सहाय

