पुष्पा गुप्ता
भूस्थैतिक कृत्रिम उपग्रह के अंग्रेजी नाम जिओस्टेशनरी सैटेलाइट हम सब ने अवश्य सुने होंगे. हमारे फोन का जीपीएस इन्ही कृत्रिम उपग्रहों की मदद से हमारी स्थिति, किसी जगह से हमारी दूरी और यदि हम तेज चल रहे हों तो हमारी रफ़्तार बताता है.
ये कृत्रिम उपग्रह भूमध्य रेखा के करीब 35,800 किलो मीटर ‘ऊपर’ पश्चिम से पूरब दिशा में इस रफ़्तार से चलते हैं कि उनकी गति (3.07 किलोमीटर प्रति सेकण्ड) पृथ्वी के घूमने से मेल खाती है यानी वे पृथ्वी की एक परिक्रमा उतनी ही देर में करते हैं जितनी देर में पृथ्वी अपनी धुरी पर एक चक्र घूम लेती है.
इसके चलते पृथ्वी से देखने पर लगेगा कि वे पृथ्वी की किसी एक जगह के ऊपर स्थिर हैं. वे जिस पथ पर रहते हैं (भूमध्य रेखा के करीब 35,800 किलो मीटर ‘ऊपर’) उस पथ का दूरसंचार और सामरिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व है. उस ग्रहपथ को जिओस्टेशनरी ऑर्बिट के लघुरूप के तौर पर ‘जिओ’ कहा जाता है.
*जिओ में उपग्रह :*
जिओ में अनेक देशों के उपग्रह हैं. आपको आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया के भी. भूस्थैतिक उपग्रहों की जरूरत टीवी प्रसारण में पड़ती है. कुछ देश दूसरे देशों के उपग्रहों से काम कर लेते हैं किन्तु अधिकांश चाहते हैं कि उनके अपने उपग्रह हों.
दूरसंचार उपग्रहों को अंतर्राष्ट्रीय निर्माता कंपनियों से खरीदा जा सकता है और उन्हें जिओ तक भेजने के लिए भी वाणिज्यिक कंपनियों (जैसे स्पेसएक्स) के राकेट भाड़े पर मिल जाते हैं.
पाकिस्तान ने अपना उपग्रह चीन के राकेट से भेजा है और बांग्लादेश ने स्पेसएक्स से. उपग्रह भेजने लायक राकेट बनाना एक सामरिक क्षमता है. सबसे सफल ऐसे रॉकेटों में एक सोवियत काल का प्रोटोन है जिसका उपयोग अभी भी रूस करता है.
प्रोटोन का विकास 1965 में एक आईसीबीएम (इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) के रूप में हुआ था जो 11500 किलोमीटर या उससे भी अधिक दूरी तक बम फेंक सकते हैं.
*जिओ मेँ भारत के उपग्रह :*
भारत के पांच उपग्रह जिओ में हैं. दो को यूरोप के एरिअन राकेट से भेजा गया है और तीन को इसरो द्वारा विकसित रॉकेटों से.
भारत के पाँच भूस्थैतिक उपग्रहों में एक (इन्सैट 3सी) बहुद्देशीय है, एक (कल्पना 1) मौसम सम्बंधित है, एक (एडुसैट) शिक्षा प्रसार के लिए और दो दूर संचार के लिए हैं, सभी उपग्रह भारत में विकसित किये गए हैं.
*चीन का नया शगूफा :*
अमेरिका के, जैसा सोचा जा सकता है, सैकड़ो उपग्रह जिओ में हैं. इनमे से अनेक सैनिक उपयोग की सूचनाएं एकत्रित करने के लिए. कल पुष्ट खबर मिली कि एक चीनी उपग्रह अमेरिका के दो सैनिक उपग्रहों की नजदीक से ‘टोह’ ले रहा है.
2018 के उत्तरार्ध में चीन ने एक उपग्रह टीजीएस 3 (पूरे नाम का उच्चारण कठिन है) जिओ में भेजा. इसे दूर संचार उपग्रह बताया गया था किन्तु वैसा कोई नहीं मानते.
इसकी वजह है कि जिओ में पंहुचने के कुछ महीने बाद यह ‘बहने’ लगा. बहने से तात्पर्य है जिओ में स्थित दूसरे उपग्रहों की अपेक्षा इसका पीछे या आगे होता जाना. ऐसा तब होता है जब कोई उपग्रह जिओ से कुछेक मील ऊपर या नीचे चला जाए.
उसकी गति वही रहती है – 3.07 किलोमीटर प्रति सेकण्ड किन्तु जिओ से ऊपर इस गति से चलने पर इसे जिओ के उपग्रहों की अपेक्षा पृथ्वी की परिक्रमा में अधिक समय लगेगा क्योंकि तब इसका पथ अधिक लंबा हो जाएगा. और तब जिओ के उपग्रह इससे आगे निकलते जाएंगे. यदि यह उसी पथ पर बना रहा तो जिओ के सभी उपग्रहों को यह अपने ‘नीचे’ अपने से आगे निकलता देखेगा.
इस चीनी उपग्रह ने यही किया. जिओ से कुछ ऊपर या नीचे जाकर (रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है) यह ‘बहने’ लगा किन्तु अमेरिका के सैनिक उपग्रहों के निकट आकर यह रुक गया! रिपोर्ट आयी है कि एक अमेरिकी सैनिक उपग्रह यूएसए 233 से बस 3.8 मील की दूरी पर यह देर तक रुका रहा! चीनी उपग्रह पर कोई ख़ास जानकारी नहीं है किन्तु अब इस पर अमरीकी, और दूसरे देशों की भी, कड़ी निगाह है.
यहाँ यह याद करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कुछ चीनी वैज्ञानिकों ने पिछले वर्ष एलन मस्क के स्टरलिंक्स उपग्रहों को नष्ट करने का प्रस्ताव रखा था.

