मुनेश त्यागी
पिछले काफी दिनों से एक जनगीत और लोकगीत को लेकर उत्तर प्रदेश में हल्ला मचा हुआ है। जैसे इस गीत से सरकार डर गई है, भयभीत हो गई है और मामला यहां तक बढ़ गया है कि इस लोक गीत को गाने वाली नेहा राठौर पर पुलिस ने द्रुतगति से कार्रवाई करते हुए नोटिस शुरू कर दिए हैं।
मामला यह है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने कानपुर में बुलडोजर द्वारा एक झोपड़ी को ढा दिया था जिसमें मां और बेटी की मौत हो गई थी। इस घटना को लेकर शासन प्रशासन के लोग नाच गा रहे थे और खुशी से उछल कूद कर नाच गा रहे थे। इस दिल दहला देने वाली घटना पर लोक गायिका नेहा राठौर ने एक लोकगीत बनाया और उसे गाकर पोस्ट कर दिया यह गीत वायरल हो गया और जनता की जबान पर चल गया। गीत के बोल थे,,,,
कानपुर में का बा?
भाई यूपी में का बा?
इसी गीत को लेकर उत्तर प्रदेश शासन-प्रशासन डर गया है, खौफजदा हो गया है और मामला यहां तक पहुंच गया है कि उसने इस गाने को समाज में विग्रह फैलाने वाला बताया है समाज में असंतोष पैदा करने वाला बताया है। वही नेहा राठौर ने कहा है कि उसने अपनी संवैधानिक और साहित्यिक जिम्मेदारी पूरी की है उसने संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से सरकार द्वारा किए गए जुल्मो सितम का विरोध किया है जो उसकी साहित्यिक जिम्मेदारी है। उसने यह गीत गाकर कोई अपराध नहीं किया है, कोई गुनाह नहीं किया है, किसी कानून को नहीं तोड़ा है उसने तो बस शासन द्वारा किए गए जालिमाना कृत्य पर आवाज उठाई है।
सरकार द्वारा की गई गैरजरूरी कानूनी कार्रवाई को देखकर कहा जा सकता है कि यह सरकार अब कवियों की आवाज से डरने लगी है। नेहा राठौर द्वारा गाए गए, लोकगीत में ऐसा कुछ भी नहीं है कि जिससे लगता हो कि वह अपनी कविता और गीत द्वारा समाज को भड़का रही है, विद्रोह का आह्वान कर रही है या समाज में अशांति पैदा कर रही है।
हां दूसरी ओर योगी सरकार को लगता है कि नेहा राठौर ने यह लोकगीत गाकर अच्छा नहीं किया है। उसने सरकार के कामों की खिल्ली उड़ाई है। इस सब को देखकर लगता है कि सरकार साहित्यकर्मियों की लोक गायक और गायिकाओं की आवाज, गीतों और कविताओं से डरने लगी है। कविता और लोकगीतों से खौफ खाने लगी है और अब वह लोककवियों को और लोकगायिकाओं को डराने पर उतर आई है और उसने तथाकथित रूप से कानून का सहारा लिया है जो किसी भी प्रकार से कानून सम्मत नहीं है। सरकार द्वारा लिए उठाए गए कदमों का मकसद सिर्फ और सिर्फ कवि की आवाज को, कविता को डराना है।
इससे पहले भी आपातकाल में और अंग्रेजों के समय में सरकारें लोकगीत, कविताओं और गीतों से डरती थी और खौफ खाती थीं। उन्होंने भी गीत लिखने वालों और गीत गाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों पर कानूनी कार्यवाहियां की थीं, उन्हें जेल भेजा था, उन्हें डराने धमकाने की कोशिश की थी। मगर उन्होंने कोई परवाह नहीं की थी। आज समय आ गया है कि देश प्रदेश के लोक साहित्यकारों को, जनवादी, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष साहित्यकारों को एकजुट होकर नेहा राठौर के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए और सरकार की साहित्यकार विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने वाली, गैरकानूनी और असंवैधानिक व मनमानी कार्यवाहियों के खिलाफ जोरदार मांग उठानी चाहिए।
उन्हें इस मामले को जनता के बीच में ले जाना चाहिए, क्योंकि जनता ही अपने लोक कलाकारों की हिफाजत कर सकती है, जनता ही उन्हें सरकारी हमलों से, सरकारी जोर जबरदस्ती से बचा सकती है। हिटलर के समय में भी यही हुआ था। तब भी हिटलर ने लोक साहित्यकारों को डराने धमकाने के लिए जेल में ठूंस दिया था, उनकी किताबें जला दी थी और उसने उस समय के कलाकारों के साहित्यकारों के सामने यह सवाल रखा था की क्या बे हिटलर का मुकाबला करने के लिए गीत गाएंगे? साहित्य की रचना करेंगे?
तो तब जर्मनी के लेखकों, कवियों और लोक कलाकारों सहित तमाम साहित्यकर्मियों ने एकजुट होकर हिटलर के सवाल का जवाब दिया था और मुतमईन होकर कहा था,,,,
क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जाएंगे?
हां जुल्मतों के दौर के ही गीत गाए जाएंगे।
आज पुनः सांप्रदायिक ताकतें और उनकी सरकारें जनता के सामने, कलाकारों के सामने, कवियों, गीतकारों और साहित्यकारों के सामने वही सवाल खड़े कर रही हैं, उन्हें डरा धमका रही हैं। तो ऐसे में अब समय आ गया है कि समाज के तमाम लोग और जनवादी, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष साहित्यकार मिलकर, एकजुट होकर खड़े हों और सरकार की जालिमाना और जनविरोधी हरकतों और का विरोध करें और अपने लोकगीतों, कविताओं और लेखों से जनता की हौंसला अफजाई करते रहे और सरकार को सही मार्ग दिखाते रहें।

