सिढार्थ रामू
मैं जानता हूं, फादर! आपकी मुहब्बत से भरी आंखें, एक खूबसूत भारत का स्वप्न देखती थीं। आप चाहते थे, इस देश में कोई भूखा न सोए, हर किसी के पेट की आग बुझी हो, कोई बच्चा भूख से बिलबिलाए न। कोई दुधमुहां बच्चा अपनी मां की सूखी छाती को न नोंचे, जिसमें दूध का एक बूंद भी नहीं है, क्योंकि वह भरपेट भोजन भी नहीं कर पाती, आप चाहते थे, कोई गर्भवती मां कुपोषण की इस कदर शिकार न हो कि उसकी हड्डियां-हड्डियां गिनी जा सकें और उसका बच्चा कमजोर एवं कुपोषित पैदा हो। आप हर बच्चे को स्वस्थ्य और पढते-लिखते देखना चाहते थे। आप अपार पीड़ा से भर उठते थे, जब कोई इलाज के बिना मरता था। आप सबके लिए अच्छा अस्पताल, अच्छे डाक्टर और अच्छी नर्स चाहते थे।
मैं जानता हूं, फादर आप नहीं चाहते थे कि आदिवासियों को उनके निवास स्थानों से कार्पोरेट घरानो के लिए उजाड़ा जाए, उन्हें उनके जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जाए। आप निर्दोष आदिवासियों को जेलों से मुक्त कराना चाहते। जब किसी आदिवासी महिला के साथ बलात्कार होता था, आप कांप उठते थे और उसे न्याय दिलान के लिए अपना जीन जान लगा देते थे। आप सुरक्षा बलों के हाथों निर्दोष आदिवासियों-दलितों गिरफ्तारी और हत्या के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ते थे। आप दलितों-आदिवासियों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देते थे, उन्हें कानून सहायता उपलब्ध कराते थे। उन्हें अपने अधिकारों के लिए संगठित होने को कहते थे। आपका हृदय ऐसा था कि दुनिया के किसी कोने में कोई अन्याय हो, तो आपको गहरी पीड़ी होती थी।
आप चाहते थे कि हर इंसान को उसकी गरिमा के साथ जीने का हक मिले, किसी के आत्मसम्मान को कोई भी कुचल न सके। इसके चलते आप हर उस इंसान के साथ थे, जो शोषण-उत्पीड़न का शिकार होता था और उस हर इंसान के खिलाफ थे, जो शोषण-उत्पीड़न करता था और किसी भी इंसान की गरिमा और आत्मसम्मान को रौंदता था।
आपने आदिवासियों-दलितों के पक्ष में खड़े होकर एक साथ इस देश की दो सबसे ताकतवर शक्तियों- पूंजीवाद ( अब कार्पोरेट) को चुनौती दी। इस तरह से आपने इनके प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी को चुनौती दी।
परिणाम भयानक निकलना ही था। आपको झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया और मेहनतकश के साथ खड़े होने के चलते आपको भीमा कोरेगांव का षड़यंत्रकारी और आदिवासियों के साथ खड़े होने के चलते आपको माओवादी ठहरा दिया गया।
फिर आपके साथ क्रूरता और निर्मता की सारी हदें पार कर दी गईं। आपको पानी पीने-चाय पीने में असमर्थ बना दिया गया, आप प्यासे तड़फते रहे। आप ठीक से लेट नहीं सकते थे, बैठ नहीं सकते थे, टायलेट नहीं जा सकते थे, फिर भी आपको ऐसी स्थिति में रखा गया ताकि आप तड़फ-तड़फ बेबस होकर जीएं या मरें। आपको समय पर इलाज नहीं उपलब्ध कराय गया। आपके साथ ऐसी क्रूरता की गई कि किसी भी संवेदनशील इंसान का हद्य कांप उठे। न केवल आपके शरीर को भयानक दर्द एवं पीड़ा भोगने के लिए विवश किया, इसके साथ ही आपकी गरिमा और आत्मसम्मान को भी रौंदा गया। इस देश की पुलिस ने, जांच एजेंसियों ने, न्यायपालिका ने, न्यायधीशों ने, सरकारी वकील ने और कार्पोरेट मीडिया ने, कुल मिलाकर मालिकों और उनके चाकरों के गिरोह ( अपराधियों के गिरोह) ने आखिर में आपकी हत्या कर दी।
अपराधी आप नहीं, यह देश है, जिसने आप जैसे महान इंसान को अपराधी घोषित कर हत्या कर दी।
फादर! आपके हत्या की हत्या के अपराध में किसी ने किसी तरह मैं भी शामिल हूं, क्योंकि ऐसा अपराधिक कृत्य वाला देश न बने, उसके लिए जो कुछ करना चाहिए था, मैंने पूरी ताकत के साथ नहीं किया।
फादर! मैं लज्जित हूं, शर्मसार हूं, मैं ऐसे देश का हिस्सा हूं, जहां आप जैसे इंसान की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई।
हो सकता है कि आपकी शहादत इस देश के सामूहिक विवेक और न्यायबोध को जागृत करे, इस बात पर लोगों सोचने के लिए विवश करे कि हम एक आपराधिक देश में रह रहें, जहां अन्याय का विरोध करने वालों को अपराधी ठहराया जाता है और वास्तव में जो अपराधी हैं, वे शासन-सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठें हैं।
*-सिढार्थ रामू*

