डॉ. विकास मानव
पेरिस में आयोजित मेरे ध्यान शिविर के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में एक पत्रकार ने मुझसे सीधा प्रश्न किया : “व्हाट्स सीक्रेट ऑफ योर अनलिमिटेड सेक्सुअल स्टैमिना एंड डिवाइन एनर्जी? आपकी असीम सेक्स-क्षमता और दिव्य ऊर्जा का रहस्य क्या है?”
मैंने कहा :
“ध्यान और तंत्र की साधनाओं से मिली सिद्धियों का समन्वय. तुम नहीं समझोगे. अगर मैं कहूँ की वर्षो कई सुदूर निर्जनों में रहकर साधनाएँ किया हूँ, तो भी नहीं मानोगे. इसलिए भी नहीं मानोगे कि ऐसा इस लाइन के सभी डपोरशंख लुटेरे भी कहते हैं. मेरे ”संबंधित लिटरेचर” पढोगे तो थोड़ा समझ आएगा, बस थोड़ा.
मानोगे तब, जब देखोगे. जब पाकर अनुभव करोगे. इसके लिए पात्रता नहीं है तुममें. तुम क्या देखना चाहोगे : प्रेत, चुड़ैल, देवी, देवता, अप्सरा या भगवान? मै प्रकट कर दूँगा, लेकिन तुमको नहीं दिखेगा. कृष्ण का विराट रूप महाभारत के मैदान में लाखों के बीच प्रकट हुआ. अर्जुन के अतिरिक्त किसी को कुछ दिखा क्या?
तुमको शास्त्रों के कहे अनुसार जन्मों तक या मेरी तरह वर्षो तक तप नहीं करना है. केवल पंद्रह दिन के लिए विथ लाइफ पार्टनर मेरे बनो. मेरा पथ अकेले का नहीं है. कोई अनुष्ठान समग्रत: पत्नी के बिना सफल नहीं होता. पत्नी नहीं है, तो प्रेमिका भी चलेगी. और हाँ, “मेरे बनो” इसका अर्थ यह है कि कोई सवाल नहीँ, कोई ‘नो’ नहीं. जो कहूँ, करो. जो करूं, करने दो. चाहो तो एग्रीमेंट करा लो. पंद्रह दिन-रात में जो तुम्हारे कामधाम का नुकसान होगा, भरपाई मै कर दूंगा.”
बनाने वाला आत्मा होकर इस शरीर को निरन्तर बना रहा है। यदि हम गन्दे आचरण, विचार और व्यवहार से इस शरीर का विनाश न करें तो ये स्वतः ही निरोग रहता है। शरीर को रोगी करते हैं राग, द्वेष घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, बदले की भावना, आसक्तियाँ, अतृप्तियाँ, भविष्य की चिन्तायें तथा गलत खान-पान एंव रहन-सहन।
यदि हम जीवन के प्रत्येक क्षण को ईश्वर से यानी आपने ‘स्व’ से जोड़ दें। कर्तव्यनिष्ठ होते हुये, फल की आकांक्षा अस्तित्व पर डालें, बाह्य-जगत को एक नाटकीय औपचारिकता मानते हुए आत्मस्थ भाव से जियें तो हम रोगी या कमजोर नहीं हो सकते है।
आपने लोगों को ताश अथवा शतरंज खेलते हुए देखा होगा। जब वे खेल की भावना से खेलते है तो हार और जीत दोनों का आनन्द लेते हैं। किसी खिलाड़ी को हार्ट-अटैक नही होता है। उसी खेल को जब वे लिप्तता और जुये की भावना से खेलते है तो, खेल में तनाव, भय, संदेह तथा नाना प्रकार के कुत्सित विचार सताते रहते हैं।
हारने की अवस्था में हार्ट अटैक भी हो सकता है। ठीक इसी प्रकार जब मैं भौतिक जीवन के स्तरों पर एक निष्काम कर्म योगी, भौतिक जीवन को नाटकीय औपचारिकता मात्र मानता हुआ, निरन्तर आत्मस्थ रहते हुये कर्तव्यनिष्ठ होता हूँ, तो मुझे प्रत्येक क्षण, असीम सुख की प्राप्ति होती है। हार और जीत दोनों ही में मैं परमानन्दित होता हूँ। जब भौतिक जीवन को ही सब कुछ मान कर लिप्तता तथा जुयें की भावना से खेलने लगता हूँ।
तो सारे रोग, व्याधियाँ तथा विपत्तियाँ मेरे जीवन को विषाक्त बनाने लगती हैं। यही योग और भोग माना गया है।
योग को सूक्ष्मता से पुनः एक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना चाहूँगा।
कल्पना करें, मेरे पास तीन मूर्तियाँ हैं एक पत्थर की है, दूसरी कपड़े की है और तीसरी चीनी अर्थात शक्कर की हैं। सबसे पहले मैं। पत्थर की मूर्ति को जल में डालता हूँ तथा पूछता हूँ :
“क्या योग हुआ?
नहीं!
यहाँ योग नहीं हुआ। पत्थर की मूर्ति जल में डूबी अवश्य ही, लेकिन योग अर्थात मिलन की अवस्था नहीं आई है। जब निकला तो पत्थर की मूर्ति पानी में डूबी अवश्य, परन्तु योग नहीं हुआ।
पुनः मैं कपड़े की गुड़िया के जल में डालता हूँ। वही प्रश्न दृहराता हूँ :
“क्या योग हो गया?”
नहीं!
योग नहीं हुआ। गुड़िया जल में व्याप्त हुई, जल भी गुडिया के रोम-रोम में व्याप्त हुआ परन्तु योग की अवस्था नहीं हुई. बाहर गुड़िया को निकाल कर धूप में रखा, जल भाप बनकर उड़ गया। गुडिया फिर कपड़े की गुड़िया थी। इस अवस्था में भी गुड़िया जल में मिल नहीं पाई। अतः न तो कोई योग हुआ और न ही कोई यौगिक बना।
अन्त में चीनी अर्थात शक्कर की गुड़िया को जल में डुबाता हूँ। कुछ समय के उपरान्त वही प्रश्न फिर दुहराता हूँ :
“क्या योग हो गया?
हां!
योग हो गया। पानी से चीनी का योग हुआ, यौगिक के रूप में शर्बत बन गया। जल ने भी अपना रूप खोया तथा चीनी की मूर्ति ने भी अपना रूप गंवाया। दोनों आपस में जुड़ गये तथा एक नया रूप बना, शर्बत जहाँ उपासक और उपास्य योग के द्वारा धुल-धुल मिल कर एक हो जायें, दोनो की अपने रूप खो दें तथा एक नया स्वरूप प्रकट हो, उस अवस्था का नाम योग है।
जीव और आत्मा मिलें, योग द्वारा अद्वैतता को प्राप्त करें, नया योग परमात्मा बने। जीव आत्मा दोनों ने रूप खोया और सब कुछ परमात्मामय हो गया।
अतीत का योग अब वर्तमान में ‘योगा’ बना तो उसने नया रूप, व्यायाम रूप धर लिया। मैं आपसे पूछना चाहूँगा, यदि मुर्गासन, कुकुटासन और मयूरासन ही योग है, तो आप सर्कस के जोकर को क्या कहेंगे?
योगेश्वर !
तब गाँव का नट जो रस्सी पर नाचता है, हवा में कलाबाजियाँ खाता है, वह तो साक्षात् नारायण ही हो जायेगा?
वस्तुतः ये एक नयी भ्रान्ति है, उसका योग से कोई सम्बन्ध नहीं है।
योग ऋग्वेद के अंग हैं। जबकि व्यायाम आयुर्वेद का अंग है। दोनो के वेद अलग-अलग हैं। व्यायाम, व्यायाम ही कहलाता है। दोनों के वेद अलग-अलग है। न तप न साधना। साधना मन को साधने का विषय है। जबकि व्यायाम शरीर को स्वस्थ रखने का विषय है।
योग शब्द से व्यायाम का अर्थ लिया जाना, स्वयं में एक बहुत बड़ी मूर्खता एव भ्रान्ति है । अतीत की महानतम उपलब्धियों का उपहास उड़ाना ही है।
व्यायाम का अपना महत्व है। शारीरिक निरोगता के लिए तथा स्वस्थ मन के लिए, व्यायाम बहुत जरूरी है। व्यायाम की महत्ता को घटाने का मेरा कोई तात्पर्य नहीं है। मैं यहाँ केवल इतना ही स्पष्ट करना चाहूँगा कि व्यायाम को योग के रूप में लिया जाना गलत है, जहां तक व्यायाम का प्रश्न है, उसका योग के रूप में वर्णन किसी भी प्राचीन ग्रंथ में नहीं देखने में आया है।
विशेषकर अस्वाभाविक व्यायाम का प्रचलन हमें कहीं पर भी अतीत के ग्रंथों में देखने को नहीं मिला है।
टांगों को तोड़ कर लम्बे समय तक आसन लगाने वालों के घुटने बेकार हो जाते हैं। श्रेष्ठ अवस्था में उन्हें गठिया तथा रक्त संचालन की कमी से उत्पन्न पैरों और घुटनों से निरन्तर दो-चार होना पड़ता है। कोई भी अस्वाभाविक व्यायाम निश्चित रूप से शरीर को तथा शरीर के अंगों को विकृत एवं रोगी बनाते है।
बहुत लम्बे काल तक शीर्षासन लगाने वाले लोगों को मस्तिष्क रोग तथा दिमाग में पानी रूक जाना जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं। लम्बे समय तक निरन्तर हठपूर्वक कुम्भक, रेचक, पूरक प्रणायाम करने वालों के फेफड़ों में पानी उतर आता है।
संक्षिप्त तथा अल्प व्यायाम के रूप में ही ये सुखद हो सकते हैं। दीर्घ काल तक, हठपूर्वक अधिक समय तक किये गये यही व्यायाम, भयंकर रोगों के कारण बन जाते है।
योग अधिष्ठाता के रूप में भगवान शंकर तथा भगवान श्री कृष्ण का ही वर्णन विशेष रूप से आता है। ये दोनों ही योगेश्वर माने गये हैं। महाशिव और भगवान श्री कृष्ण दोनों ने ही नृत्य को व्यायाम के रूप में अंगीकार किया है।
वस्तुतः नृत्य ही शरीर का सम्पूर्ण व्यायाम है, जो स्वाभाविक है तथा निरोगता को प्रदान करने वाला है। अस्वाभाविक व्यायाम को महाशिव एंव भगवान श्रीकृष्ण दोनों ने ही अस्वीकार किया है। श्रीकृष्ण ध्यानावस्था में योग निद्रा में लेटते थे। व्यायाम से हमारा तात्पर्य सहज स्वाभाविक व्यायाम से ही है। आधुनिक खेलों को भी स्वाभाविक व्यायाम में लिया जा सकता है। बैडमिन्टन, फुटबाल, वालीबाल, तैराकी, दौड़ना आदि.
ऐसा लगता है की वर्तमान युग में मन को साधने के स्थान पर आचरण और व्यवहार को पवित्र करने की जगह आधुनिक युग के लोग व्यायाम के द्वारा ईश्वर को गुलाम बनाने की कल्पना को सजा बैठे हैं। ये स्वयं में बहुत बड़ी भ्रांति है। व्यायाम मात्र व्यायाम है।
भौतिक जीवन में हम जो भी कार्य करते हैं, वे सभी श्रमसाध्य होते हैं। लिखना पढ़ना भी एक श्रमसाध्य व्यायाम होता है। श्रम सभी अवस्था में करते हैं। यदि कोई कर्म शरीर के द्वारा श्रमसाध्य नहीं है तो मन के द्वारा श्रमसाध्य है। श्रम के बिना कोई कर्म साध्य नहीं होता।
कोई भी श्रम, सुखद अथवा दुखद, दोनों ही हो सकता है। एक उदाहरण देकर स्पष्ट करता हूँ। जब लड़के आनन्द की भावना से क्रिकेट खेलते हैं, भारी श्रम करते हैं। चूंकि आनन्द की भावना से खेलते हैं, इसलिए भारी श्रम करके भी आनन्द को प्राप्त होते हैं। थकते नहीं हैं।
उन्हें परमानन्द, सुख, शांति तथा हर्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन ऐसे ही बड़े लोग जब दफ्तर में कम श्रम का कार्य करते है तो भी थक जाते हैं, हताश हो जाते है। उनका स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है। वे तो कम श्रम कर रहे थे, फिर उन्हें ये सब क्यों हुआ? भावना का भेद ही यहाँ स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है।
जब आनन्द की भावना से भारी श्रम कर रहे थे तो सुख, आनन्द और हर्ष की अनुभूतियाँ थी । जब नौकरी बजाने की भावना से कम श्रम कर रहे थे तो मानसिक विकृतियों, पीड़ा तथा रोग को प्राप्त हो रहे थे। महत्व श्रम से कहीं अधिक पुष्ट भावना का था।
अहात्मस्थ मन यदि घर में झाडू भी लगाता है तो वह यथाकथित व्यायाम और आसानों की सारी प्रक्रिया से ऊपर उठ जाता है। जबकि विषयी मन कहीं भी व्यायाम क्यों न करता हो, रोग ही पाता है।
इसलिए मैं अपने साधक और साधिकाओं को किसी भी प्रकार के आसनों अथवा मुद्राओं के लिए कुछ विशेष नहीं कहता हूं.
भोजन तथा व्यायाम प्रत्येक व्यक्ति का उसके शरीर तथा मन स्थितियों के अनुरूप होता है। उसका निर्णय प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं करना होता है। व्यायाम अथवा भोजन किसी भी व्यक्ति पर धोपा नहीं जा सकता। अपनी स्वाभाविक अवस्था के अनुरूप ही भोजन तथा शारीरिक व्यायाम को साधक को स्वयं निर्णय कर, ग्रहण करना चाहिए।
शरीर तथा मन की बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप ही भोजन तथा व्यायाम को घटाना अथवा बढ़ाना चाहिए।
तप, साधना, समाधि, ईश्वर रूपी अमृतमय खुमारी से जुड़कर जीने का नाम है। भक्ति एक अद्भुत नशा है, तथा सभी नशो की भांति ही भक्त, जिस भाव में होता है, उसे वही भाव उद्वेलित करता है, इसलिए अपने भाव को ईश्वरमय बनाना जरूरी है।
कामुक व्यक्ति जब साधना में आता है, तो उसकी काम-पिपासा प्रज्वलित हो उठती है। साधना उसके विनाश का कारण बन जाती है। जिसने क्रोध को नहीं जीता है, साधना उसकी क्रोध रूपी विकृतियों को भयंकरतम रूप प्रदान करती है।
ऐसे व्यक्ति में भयंकर क्रोध आ जाता है, तथा आवेश में भयंकर कर्म कर डालता है। किसी भी साधना से पहले अपने शरीर से इन गन्दे विचारों को मिटा देना जरूरी होता है। साधना एक तपस्वी और ऋषि में ब्रम्हज्ञान को प्रकट करती है।
वही साधना दशानन रावण में कामुकता और मिथ्याभिमान की जनक भी हो जाती है। साधक के लिए बहुत जरूरी है कि वह मन दशानन की दसों इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए, दसों इन्द्रियों को रथ कर अर्थात बान्धकर दशरथ बने। जो साधक अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं पाता, वह साधना की राह में और अधिक भटक जाता है।
व्यावहारिक रूप से सम्पूर्ण विषयों पर, इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना साधक के लिए परमाश्वयक होता है। ये नियन्त्रण व्यायाम के द्वारा नहीं लिया जाता है वरन “स्वप्रेरणा” (आटोंसजेशन) के द्वारा ही सम्भव है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण जब साधना के विषय में बात करते हैं तो मात्र इतना ही अर्जुन को समझाते है, “स्वस्थ, मनोरम, शुद्ध वातावरण में, ऊँचे स्थान पर, स्वस्थ आसन पर बैठते हुए, मेरूदण्ड को सीधा रखते हुए तथा ग्रीवा को भी सीधा रखते हुए, पलको को नासिका के अग्रभाग की ओर झुकाता हुआ, भृकुटि के मध्य में मेरा ध्यान करें।”
इसमें न तो कुकुटासन, मुर्गासन तथा न ही मयूरासन आदि की चर्चा है। इसके अतिरिक्त भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि, न तो अधिक खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न ही अधिक सोने वाले का योग सिद्ध होता है, तथा न ही अधिक जागने वाले का ही योग सिद्ध होता है।
सहज स्वरूप, स्वल्प भोजन, स्वल्प निद्रा तथा सहज स्वल्प मन ही योग के लिए उत्तम है। इसलिए इम किसी भी अस्वाभाविक कार्य ( हठयोग आदि) अथवा मनस्थितियों की ओर न बढ़ें। हमारे लिए जरूरी है कि हम सहज शरीर तथा मनः स्थितियों को प्राप्त होते हुए मन इन्द्रियों को तथा वासनाओं पर नियंत्रण करते हुए, साधना को अत्यधिक सहजता से ग्रहण करें ।
योग के विषय में मात्र इतना ही बताने के उपरान्त, सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को इन्द्रियों तथा विचारों को नियन्त्रित करने की बात सिखाते हैं।
सत्य भी है, जिसने मन नहीं साधा, जिसने विचारों को नियन्त्रित नहीं किया, जिसने इच्छाओं और अतृप्तियों को अपने जीवन में समाप्त नहीं किया, उसके लिए साधना का मार्ग भी नहीं खुलता है।

