डॉ. विकास मानव
सृष्टि की उम्र तब 14 साल थी और मेरी 25 साल. उसके पेरेंट्स से मेरा परिचय था. मेरा उसके घर में आना-जाना था. मैं उसको ट्यूशन भी पढ़ा दिया करता था. वह मुझे भी पढ़ने लगी.
इस किशोर लड़की को मुझसे बहुत गहरा प्रेम हो गया और बाद में कदाचित उससे कुछ मुझे भी।
हम बाहर घूम लिया करते थे. मेरे साथ उसके पेरेंट्स कही भी उसे जाने देते थे, दो तीन दिन के लिए भी.
वो मेरे साथ भागने तक को तैयार थी। सबको छोड़ने को तैयार थी |
उसके पिता को यह रिश्ता मंजूर नही था. होता भी कैसे. उम्र का इतना बड़ा फासला था. वह स्वर्ग से आई हुई परी लगती थी, मैं सुंदर भी नहीं था.
लड़की अपनी मां से कहती, “प्यार उम्र का, रूप- रंग का, कद- काठी- दौलत का मोहताज नहीं होता. यहां इमोशनल अटैचमेंट की गहराई अहम होती है. भावना- संवेदना और चेतना का स्तर अलबत्ता देखा जा सकता है. स्त्री के लिए इसके अलावा पुरुष का पौरुष अहम होता है. मुझे इनके पौरुष पर कोई शक़ हो ही नहीं सकता.
कोई नहीं सुना. उन्होंने लड़की की शादी किसी और से तय कर दी !
पेरेंट्स की नज़र में मैं बुरा नहीं था. लड़की भी बुरी नहीं थी. उन्होंने मुझे पहले की तरह घर आते रहने को कह दिया. लेकिन मैंने उनके यहां जाना बंद कर दिया.
मैं सृष्टि से मिलने अंतिम बार उसकी शादी के दिन गया. लड़की दुल्हन के जोड़े में कमरे में बैठी थी.
बहुत सुंदर लग रही थी. मैंने उससे कहा तुम सच मे परी हो.
उसने मेरे शर्ट का कालर खींचकर मुझसे कहा कि मर्द हो तो मुझे अभी के अभी यहां ले चलो. शादी करो.
मैं शांत था. फिर बोला :
सुनो ! मेरे लिए मेरे प्यार से ज्यादा जरूरी तुम्हारे बाप की इज्जत है | तुम्हारे लिए भी होनी चाहिए. इस बात का सदैव ध्यान रखना.
मैं तुम्हे प्यार करता हूँ, लेकिन उतना नहीं करता जितना तुम्हारे माता-पिता तुमसे अब तक किए और करते हैं| पेरेंट्स जितना प्यार कोई कर ही नहीं सकता. मेरे प्यार की देवी जी, कोई भी नहीं.
मेरी बात समझोगी, जब माँ बनोगी. जब संतान का पालन पोषण करोगी.
और हाँ ! अगर तुमने मुझसे सच मे प्यार किया है तो तुम कहीं नही भगोगी, कभी नहीं. यह विचार दिमाग़ से निकाल दोगी. शादी के रिश्ते को ऐसे निभाओगी जैसे मैं तुम्हारी जिंदगी में कभी था ही नहीं.
वर्षों बीत जाने के बाद भी उससे मेरी बात नहीं हुई | उसने मेरा नंबर भी डिलीट कर दिया. अभी दो सप्ताह पहले उसका फोन आया. किसी न्यूज़ पोर्टल से उसने मेरा नंबर लिया था.
अब वो बहुत खुश है. कहती भी है की हमने जो निर्णय लिया वो सबसे अच्छा था | शायद मैं कमज़ोर पड़ गयी थी, लेकिन तुमने मुझे सम्भाल लिया |
आज सब कुछ बेहतर है | बस मैं फिजिकली संतुष्ट नहीं हो पाती. इस पहलू पर भी सलाह दो, क्या करूं?
मैंने उससे कहा, सेक्ससुख से बड़ा कोई भी सुख नहीं होता, ख़ासकर स्त्री के लिए. खुद को अतृप्त रखना जीवन का अपमान है. जीवन का अपमान जीवनदाता भगवान का अपमान है. लेकिन मैं पराये मर्द को यूज करने यानी बदचलन बनने की सलाह नहीं दे सकता. यह रोगों का और उनसे सड़कर बेमौत मरने का रास्ता भी है.
वह बोली, तो क्या करूं रोज मरूं? हर पल मरूं? तुम क्यों नहीं ऑप्सन बनते. पति तो राधा के पास भी था. कृष्ण जैसे इंसान के कारण उनकी होकर भी वे बदचलन नहीं बनी. तुम मेरे लिए कृष्ण से भी महान हो.
मैं बोला, तुम अपने पति को लाओ. तुम्हारे काबिल बना दूंगा. हम दोनों जैसे मित्र हैं, वैसे मित्र ही रहें तो अच्छा है.
उसने पति से बात की तो उसको थप्पड़ पड़ गए. मर्दानगी पर सवाल नामर्द कभी बर्दास्त नहीं करता. बेचारी को हवसी, अति कामुक बता दिया गया.
दो दिन बाद उसने ज़हर खा लिया. लेकिन चुंकि उस समय वहाँ उसके पेरेंट्स गए हुए थे. उसे तुरंत ऐक्शन लेकर बचा लिया गया.
पति ने माफ़ी मांग ली. लेकिन नामर्द होना एक्सेप्ट नहीं किया. इसलिए इलाज़ की संभावना ही नहीं जन्मी.

