नई दिल्ली
‘मैं हिजाब को बिल्कुल गलत मानती हूं। इसके पीछे तमाम इस्लामिक स्कॉलर के रिसर्च हैं, जो बताते हैं कि हिजाब, बुर्के को इस्लाम का हिस्सा नहीं माना गया है। इसके साथ ही मैं अपने सेक्युलर देश में किसी CM या मंत्रियों के भगवा पहनने को भी सही नहीं मानती। एक मजहब का CM भगवा पहने तो विवाद न हो और दूसरे मजहब की लड़कियां हिजाब पहनकर स्कूल जाएं तो हंगामा हो जाए। यह ठीक नहीं है।’
तीन तलाक के लिए सबसे पहले और आक्रामक आवाज उठाने वाले संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की प्रमुख जकिया सोमन ने इस मसले पर भास्कर से खुलकर बात की।
जकिया सोमन कहती हैं, ‘सार्वजनिक जीवन में धर्म को लाना बिल्कुल ठीक नहीं। फिर चाहे वह हिजाब हो या किसी राज्य के सीएम या मंत्रियों का भगवा पहनना। यह देश धर्मनिरपेक्ष है।’ सीएम भगवा पहन सकता है तो क्या स्कूल में हिजाब पहनना भी ठीक है? इस सवाल पर वे कहती हैं, ‘मैं वही कह रही हूं। दोनों गलत हैं। आपने पूछा की इस्लाम में हिजाब है या नहीं? मैंने स्कॉलर्स के हवाले से आपको जवाब दिया है।
उन्होंने कहा कि मैं देश के माहौल के बारे में भी बात कर रही हूं। सोचने की जरूरत है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? भगवा कपड़े और हिजाब दोनों को एक तरह से डील करने की जरूरत है। जब खुलेआम एक धर्म का प्रचार होगा, देश के बड़े-बड़े नेता इसका प्रचार करेंगे तो फिर दूसरे मजहब के लोग भी ऐसा करेंगे।
हमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सीखना चाहिए
जकिया आगे कहती हैं, ‘एजुकेशन इंस्टीट्यूट का यह हक है कि वह अपना ड्रेस कोड बनाए। मुझे आपत्ति इस बात पर है कि बेवजह की सियासत हो रही है। अगर सार्वजनिक जीवन में इतना धर्म आएगा तो फिर कभी बच्चियां हिजाब पहनेंगी तो कभी बच्चे भगवा पहनकर आएंगे।’
हमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सबक लेना चाहिए। इन देशों के हालात देखने चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में धर्म को लाने का क्या नतीजा होता है। भारत किसी एक मजहब का नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष देश है।
इस्लाम का बुनियादी हिस्सा नहीं हिजाब
मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई का चेहरा बनीं जकिया सोमन कहती हैं, ‘ऐसे तमाम इस्लामिक स्कॉलर हैं जिनका शोध और अध्ययन हिजाब, बुर्के और परदे को इस्लाम का बुनियादी हिस्सा मानने से इनकार करता है।
जकिया अरब और फ्रांस की मशहूर स्कॉलर और दुनिया भर में चर्चा के केंद्र में रही किताब ‘बियांड द वील’ की लेखिका फातिमा मर्निसी (Fatema Marnissi) के शोध के हवाले से कहती हैं, ‘कुरान में हिजाब, बुर्का या परदे का नहीं बल्कि सितर (sitr) शब्द का इस्तेमाल हुआ है। यह शब्द 12-14 बार इस्तेमाल हुआ है।’
जिसमें केवल दो बार औरतों के लिए और बाकी पुरुषों के लिए इस्तेमाल हुआ है। इस शब्द का मतलब है- दीवार, परदा या ढकना। यानी पुरुष महिलाओं से परदा करें। इसका मतलब यह नहीं कि बुर्का या हिजाब डालें, बल्कि वे औरतों को न घूरें। नजरें बचाकर चलें। खराब नजरों से न देखें, लेकिन पैगंबर मोहम्मद के बाद लोगों ने इसका अर्थ ही पलट दिया। इसे औरतों को घर पर रखने और पाबंदी लगाने का जरिया बना लिया गया।
फातिमा के अलावा जकिया महिला अधिकारों के लिहाज से कुरान की आयतों पर शोध करने वाली अमेरिकन- अफ्रीकन स्कॉलर अमीना वदूद और जिबा मीर हुसैन के लिट्रेचर का भी जिक्र करती हैं। वे कहती हैं, ‘इन सब महिलाओं ने अपने शोध के आधार पर राय रखी। इनके शोध में कहीं भी महिलाओं के शोषण और उन्हें सिर से पैर तक ढकने का जिक्र नहीं है।

