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 *इतिहास, मिथक और अफवाह:इतिहासबोध विकसित करती एक महत्वपूर्ण पुस्तक*

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दुनिया का इतिहास यह बतलाया है कि जब भी कोई फासीवादी शासक सत्ता में आता है तो अपने शासन के वैधता सिद्ध करने के लिए इतिहास के तथ्यों को अपने हिसाब से मनमाने ढंग से तोड़ता-मरोड़ता है। हिटलर और मुसोलिनी ने फासीवाद और नाजीवाद का प्रचार करने के लिए इतिहास की गलत व्याख्या का सहारा लिया। जर्मनी में जर्मन नस्ल की शुद्धता की अवधारणा के नाम पर लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में भेजकर मौत के घाट उतार दिया गया।

-नीलम श्रीवास्तव

आज भारत में संघ परिवार के सत्ता में आने के बाद वह अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए इसी तरह की इतिहास की गलत व्याख्या का सहारा ले रहा है। इन्हीं सब विषयों को समेटती हुई एक्टिविस्ट और लेखक ‘स्वदेश कुमार सिन्हा’ की यह महत्वपूर्ण पुस्तक ‘इतिहास, मिथक और अफवाह’ है।

प्रस्तुत पुस्तक में लेखक अकादमिक इतिहास लेखन से हटकर बहुत सहज तरीके से इसी पर प्रकाश डालते हैं कि इतिहास कुछ विकृत व्याख्या और मिथकों को इतिहास बनाने का प्रयास किस तरह पूरे सामाजिक ढाँचे को अस्त-व्यस्त कर सकता है। पुस्तक की भूमिका में लेखक लिखते हैं, कि हमारे देश में इतिहास की दो धाराएँ‌ हमेशा मौजूद रही हैं। एक शासक वर्ग का इतिहास, दूसरा जनता का। दुर्भाग्यवश हमारे देश में इतिहास लेखन की कोई परम्परा नहीं रही है।

राजदरबारों में कुछ चारण किस्म के इतिहासकार थे, जिन्होंने राजाओं का महिमामंडन बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। भारत में आए कुछ विदेशी यात्रियों के दृष्टांत हैं, जिनसे कुछ ऐतिहासिक जानकारी मिलती है। पुराणों,लोककथाओं,आख्यानों तथा इतिवृत्तों में इतिहास के तथ्य ज़रूर मिलते हैं, लेकिन यह वास्तविक इतिहास नहीं होते। यही कारण है, हमारे देश में सुशिक्षित वर्ग भी इतिहास और मिथकों में अंतर नहीं कर पाते।

लोग ‘रामचरितमानस’ और ‘महाभारत’ जैसे महाकाव्यों में इतिहास खोजने लगते हैं। उपनिवेश काल के दौर में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन हुआ, जिसमें भारतीय अतीत को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। निश्चित रूप से उपनिवेशवाद के खिलाफ़ इस लेखन की महत्वपूर्ण भूमिका थी, परन्तु बाद में यही राष्ट्रवादी इतिहास लेखन फासीवादियों का भी औज़ार बना।

आज़ादी के बाद निश्चित रूप से मार्क्सवादी इतिहास लेखन एक प्रगतिशील धारा के रूप में विकसित हुआ‌ और इसके समानांतर ही संघ परिवार की पुनरुत्थानवादी इतिहास लेखन की धारा भी क्षीणकाय रूप में मौजूद थी, लेकिन 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इसे लगातार विकसित किया गया, जो आज एक विशालकाय वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गया है।

पिछले कुछ सालों से भारत के ऐतिहासिक भूगोल की पुनर्रचना का ज़ोर-शोर से प्रयास चला, इस अभियान के तहत वैदिक काल की सरस्वती नदी कुछ खोज, महाभारत काल का भूगोल और मध्यकालीन भारत में इमारतों के धार्मिक विध्वंस और निर्माण को लेकर पुरातत्व विभाग, शोधकर्ताओं भाषाविज्ञानियों और इतिहासकारों को नये तरीके से गोलबंद किया गया और बुनियादी तरीके से अभियान चलाया गया।‌ इस अभियान में नीतिगत निर्णय से लेकर राजनीतिक तौर-तरीकों भी अपनाए गए।

निश्चित रूप से भारतीय सभ्यता क़रीब 5 साल पुरानी है, परन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं है, कि सिन्धु घाटी सभ्यता हिन्दू या वैदिक सभ्यता थी।

तीन भागों में बँटी प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। पहले अध्याय में इस बात का उल्लेख है, कि किस प्रकार संघ परिवार आज मिथकों को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करके अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा कर रहा है।

इस भाग में 17 महत्वपूर्ण निबंध हैं, इसमें बाले मियाँ बनाम सुहेलदेव: इतिहास, मिथक और कल्पना का द्वंद्व’ नामक एक महत्वपूर्ण लेख है, जिसमें यह प्रस्तुत किया गया है कि किस तरह बाले मियाँ और सुहेलदेव के मिथक को एक ऐतिहासिक चरित्र के रूप में पेश करके बारे मियाँ को खलनायक और सुहेलदेव को नायक सिद्ध करके संघ परिवार पासी समाज की जातीय गोलबंदी कर रहा है।

इसके अलावा एक अन्य निबंध में इस बात पर प्रकाश डाला गया है, कि सरकार किस प्रकार एनसीआरटी की पुस्तकों में बदलाव करके अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा कर रही है? एक और निबंध ‘इतिहास बोध आरएसएस और पाकिस्तान का’ में लेखक ने यह बताया है, कि आज हम जो पाकिस्तान में हिंसा और कट्टरता देख रहे हैं, इसके पीछे वहाँ पर आज़ादी के बाद लिखा गया साम्प्रदायिक लेखन है।

यही चीज़ आज भारत में दोहराने की कोशिश की जा रही है, इसके अलावा इस भाग में ‘राष्ट्रवादी लेखन का फासीवादी विमर्श’, क्या भारत में पराभव का कारण मुस्लिम और मुग़ल शासन था’, ‘क्रिकेट का अंधराष्ट्रवाद बनाम जर्मन फासीवाद’, ‘समकालीन दलित राजनीति और विकल्प की त्रासदी’ जैसे महत्वपूर्ण लेख हैं।

इस भाग में तीन महत्वपूर्ण लेख ‘हिन्दुत्व की ज़मीन पर महाभारत की खोज’, ‘हित्ताइट भाषा प्लेटों की नयी खोज और भारत का इतिहास’ और ‘कनैला की कथा: इतिहास लेखन में कल्पनाशीलता,मिथक और यथार्थ’ हैं। इन लेखों को अंजनी कुमार ने लिखा है। वे शौकिया इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता भी हैं।

कनैला की कथा नामक लेख इतिहास,संस्कृति और साहित्य के गहरे जानकार राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक कनैला की कथा पर आधारित है। कनैला उत्तर प्रदेश के आजमगढ जिले में राहुल सांकृत्यायन का गाँव था। यह पुस्तक उसी गाँव की कहानी है,जो प्राचीन गुप्तकाल से लेकर आज़ादी के बाद तक फैली हुई है।‌ यह पुस्तक 1949 में लिखी गई थी।

उस समय तक सबाल्टर्न इतिहास का जन्म ही नहीं हुआ था, जिसमें किसी गाँव या शहर का इतिहास लिखा जाए। निस्संदेह यह इस पुस्तक का एक बहुत महत्वपूर्ण लेख है।

पुस्तक का दूसरा अध्याय इतिहास में व्यक्तित्व के मूल्यांकन पर आधारित है, जिसमें यह बताने का प्रयास है, कि स्वाधीनता आंदोलन के कुछ नायक क्यों आज संघ परिवार के नायक बन गए और कुछ खलनायक? वास्तव में इतिहास में व्यक्तियों से अधिक उन‌ शक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है,जो इतिहास को गति प्रदान करते हैं।

इसके अंतर्गत इस भाग में जवाहरलाल नेहरू, भगतसिंह, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर, अम्बेडकर, रोमिला थापर और चारू मजूमदार पर लेख है। इस भाग में इसका विश्लेषण किया गया है, कि आज अपनी धर्मनिरपेक्षता की नीतियों के कारण जवाहरलाल नेहरू संघ परिवार के लिए बड़े खलनायक बन गए हैं। उनके नाम को मिटाने की हर संभव कोशिश की जा रही है, इसके विपरीत नेताजी सुभाषचन्द्र को अपने हिन्दूवादी-संघवादी झुकाव के कारण संघ परिवार के नायक बन गए हैं।

भगतसिंह ने भारतीय पूँजीवाद के चरित्र को आज़ादी से पहले ही देख लिया था, वे साम्प्रदायिकता के भी घोर विरोधी थे, इसीलिए भारत और पाकिस्तान दोनों के शासक वर्ग भगतसिंह के विचारों से भयभीत रहते हैं। इसके अलावा इस भाग में ‘वामपंथी आंदोलन और अम्बेडकर का सवाल’, ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर: राष्ट्रवाद और इतिहास बोध’ ‘चारू मजूमदार: एक स्वप्नदर्शी क्रांतिकारी’ भी महत्वपूर्ण लेख हैं।

इस पुस्तक का तीसरा अध्याय जनांदोलनों पर केन्द्रित है। लेखक लिखता है, कि भारतीय मार्क्सवादी इतिहास लेखन तक में परिधि पर रह रहे लोगों: जिसमें आदिवासी किसान-मजदूर और दलित -पिछड़े सभी थे, उनकी भूमिकाओं को काफी हद तक नज़रअंदाज़ किया गया। इस दृष्टि से इस भाग में नक्सलवादी आंदोलन, चौरी-चौरा किसान विद्रोह, 1857 का सैनिक विद्रोह और दलित पैंथर आंदोलन का मूल्यांकन किया गया है।

पुस्तक के चौथे और महत्वपूर्ण अध्याय में प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार रोमिला थापर के ‍आज की परिस्थितियों पर एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार को संकलित किया गया है। जिसमें वे बताती हैं, कि “पिछले कुछ दशकों से इतिहास मुठभेड़ का क्षेत्र बना हुआ है। फैंटेसी को इतिहास के बतौर पेश करने की कोशिश की जा रही है।‌ यहाँ यह समस्या अधिक गहरी है। मैं एरिक हाॅब्सबाम को उद्धृत करती रहती हूँ। उन्होंने सही लिखा है, कि राष्ट्रवाद के लिए इतिहास का वही महत्व है,जो अफीमची के लिए अफीम का।”

इस पुस्तक में ढेरों उद्धरण और संदर्भ इसे बहुत महत्वपूर्ण बनाते हैं। मुझे लगता है, कि इतिहास, समाज विज्ञान के छात्रों सहित यह पुस्तक आज के दौर को जानने के लिए सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है। अपनी पुस्तक के बारे में लेखक लिखता है, कि अगर मेरी यह पुस्तक इतिहासजीविता के खिलाफ़ इतिहासबोध की चेतना विकसित करने में अंश मात्र भी सफल हो, तो यह मेरे श्रम की सार्थकता होगी

पुस्तक का नाम: इतिहास, मिथक और अफवाह

लेखक: स्वदेश कुमार सिन्हा

प्रकाशक: बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन, फगवाड़ा, पंजाब,144401

आई एस बी एन: 978-93-48161-35-2

मूल्य: 400 रूपये

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