विजय दलाल
*उत्तराखंड के एक चुनाव पर सीजेआई गवई के ताजा फैसले पर यूट्यूब पर कई पत्रकारों के वीडियो आए और ताजा एसआईआर के संबंध में समीक्षा की गई और इस नए फैसले की दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट से जनता के पक्ष में फैसला आने की उम्मीद जताई।*
*मैंने इस संबंध में पत्रकार अशोक वानखेडे जी की समीक्षा और विश्लेषण को बहुत ध्यान से सुना। वह पुरा इस बात पर केंद्रित था कि चुनाव आयोग चूंकि एक संवैधानिक संस्था है इसलिए चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद और दौरान न्यायालय उसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता इस तरह का 1952 में सुप्रीम कोर्ट का एक याचिका पर फैसला था।*
*इस ताजा फैसले ने उस स्थापित धारणा को तोड़ा है।* * *2019 के पहले तक मेरे जैसे लोगों को चुनाव और चुनावी प्रक्रिया संबंधी कानून और*न्यायपालिका के फैसलों की जानकारी लगभग नहीं के समान थी।*
*इस फैसले को नज़ीर के रूप में यदि सुप्रीम कोर्ट इस्तेमाल कर रहा है और ईवीएम और चुनाव आयोग संबंधित याचिकाओं पर चुनावी प्रक्रिया पर शुरू होने से पहले और बाद में तो रोका नहीं गया है।*
*1952 के इस फैसले जब देश में चुनावों की शुरुआत हुई थी। संसाधनों को टोटा था। बेलेट पेपर से चुनाव होने थे। उस समय के ऐसे फैसलों को आज के चुनावी प्रक्रिया संदर्भ में देखा जाना ही पूर्णरूपेण गलत है।*
*बेलेट पेपर के स्थान पर जैसे ही ईवीएम मशीन आयी सिस्टम से पारदर्शिता पुरी तरह से गायब हो गई।*
*चुनाव में बेईमानियां बेलेट पेपर के जमाने में भी होती थी। लेकिन उनका स्वरूप और तरीके अलग थे। और इतने सीमित होते थे उनसे कुल नतीजों पर केवल आंशिक या न के बराबर पड़ता था। दो ही तरीके के होते थे उम्मीदवार की गुंडागर्दी से बेलेट पेपर या तो लूट लिए जाते थे या आखिरी में मुहर लगा कर इकट्ठे पेंटी में डाल दिए जाते थे।*
*उम्मीदवार की गुंडागर्दी के द्वारा रिमोट गांवों में गरीब वर्ग को वोट ही नहीं डालने देना इत्यादि।*
*सारी तरह की गड़बड़ियां नजर आती थी अदालत में सबूत पेश किए जा सकते थे।*
*लेकिन ईवीएम मशीन जिसे कई स्तरों पर हैक करना संभव है। सामने दिखने वाली गड़बड़ियों के सबूत अदालत में पेश करना संभव ही नहीं है।*
*अब सिस्टम को मतदाता और निष्पक्ष चुनाव की दृष्टि से हर स्तर पर पार्दर्शी बनाना जरूरी है इस काम की जिम्मेदारी सरकार और चुनाव आयोग की है।*
*लेकिन ये दोनों ही जब इसका दुरूपयोग कर रहे हो और सिस्टम को पारदर्शी बनाने के स्थान पर हर दृष्टि से उसे और अपारदर्शी बना रहे हों तो सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी क्या बनती है?*
*2014 से पहले वीवीपीएटी पर्ची को चुनाव प्रक्रिया में शामिल करवा कर इस सिस्टम की अपारदर्शिता को सिद्धांत: माना था लेकिन 2014 के बाद चुनाव आयोग की हर हेराफेरी के कारनामों को बहुत ही लचर और अतार्किक ढंग से जायज ठहराया।*
*एसआईआर प्रक्रिया जो सवाल और बवाल दोनों से पहले कुछ पत्रकारों का अनुमान बिल्कुल ठीक ही प्रतीत होता है कि महाराष्ट्र में बड़े वोट की चोरी पकड़ने के बाद बिहार में वही प्रक्रिया उल्टी अपनाई गई है कि विरोधी वोटों के लीस्ट से नाम गायब करके बिहार चुनाव जीतना। पत्रकारों और स्रोतों द्वारा यह आंकड़ा 50 लाख के करीब बताया जा रहा था। उस लिस्ट को प्रमाणिक बनाने के लिए एसआरआई की प्रक्रिया अपनाई गई इतने कम समय में किसी भी हालत में संभव ही नहीं थी। किंतु उसे फर्जी तरीके से पुरा करना दिखाना था उस पहले से तैयार लीस्ट के आंकड़े तक पहुंचना था।*
*अगर सुप्रीम कोर्ट अब तक इस संबंध में लगी याचिका का हश्र जो यह बहाना बना कर कि एक संवैधानिक संस्था दूसरी*संवैधानिक संस्था के काम में हस्तक्षेप केसे करे तो इस बार भी कहानी और बिहार चुनाव के नतीजे तय है।*
विजय दलाल
Bihar SIR | EC Flags 71 Lakh Voters, 49 Lakh at Risk of Exclusion from Final List





