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*कहानी : शहादत* 

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    ~ पुष्पा गुप्ता

      पूर्व कथन :

यह न्‍गुगी वा थ्योंगो की कहानी का भाषिक रूपांतर है. न्गूगी वा थ्योंगो व्यवस्था विरोधी, जनपक्षधर लेखकों की उस गौरवशाली परम्परा की कड़ी हैं, जो हर कीमत चुकाकर भी बुर्जुआ सत्ता प्रतिष्ठानों और सामाजिक ढाँचे के अन्तर्निहित अन्यायी चरित्र को उजागर करते रहे, जिन्होंने आतंक के आगे कभी घुटने नहीं टेके और जनता का पक्ष कभी नहीं छोड़ा।      

     कला-साहित्य के क्षेत्र में आज सर्वव्याप्त अवसरवाद के माहौल में उनका जीवन और कृतित्व अनवरत प्रज्जवलित एक मशाल के समान है। उपनिवेशवाद और समकालीन साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक नीति और भाषानीति का तथा उत्तर-औपनिवेशिक समाजों के शासक बुर्जुआ वर्ग की राजनीति, अर्थनीति और संस्कृति का उनका विश्लेषण अपनी कुशाग्रता और मौलिकता की दृष्टि से अनन्य है।*

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         कुछ अज्ञात बदमाशों द्वारा मिस्टर और मिसेज गैरस्टोन की उनके घर में ही हत्या किये जाने की खबर ने सनसनी फैला दी थी- हर तरफ इस हत्या की ही चर्चा थी। अखबारों ने इस खबर को पहले ही पृष्ठ पर छापा था और रेडियो न्यूजरील में भी इसका विशेष तौर पर उल्लेख था। इसकी वजह शायद यह थी कि पूरे देश में जो हिंसा की लहर चल पड़ी थी, उसके शिकार होने वाले ये पहले यूरोपीय बाशिन्दे थे। इस हिंसा के पीछे राजनीतिक कारण बताया जाता था। आप चाहें जहाँ भी जाइए, बाजार हो या भारतीयों का इलाका या अफ्रीकियों की दुकान – हर जगह किसी न किसी रूप में इसकी चर्चा चल रही थी। जितने मुँह उतनी बातें-लोग तरह-तरह से पूरे वाकये को पेश कर रहे थे।

लेकिन इस हादसे के बारे में मिसेज हिल के यहाँ जितनी तफसील से बातचीत चल रही थी, वैसी शायद ही कहीं हुई हो। 

      मिसेज हिल का मकान एक सुनसान पहाड़ी पर था। उनके पति केन्या के बड़े पुराने बाशिन्द थे और अभी पिछले ही साल जब वे उगांडा की यात्रा पर थे, मलेरिया की चपेट में आकर स्वर्ग सिधार गये थे। उनका एक बेटा और एक बेटी थी और दोनों की शिक्षा ‘होम’ में यानी इंगलैंड में चल रही थी। मिसेज हिल यहाँ बहुत दिनों से रह रही थीं। उनके पास अपार जमीन थी और देश-भर में उनके बेशुमार चाय बागान थे। अपनी इस जायदाद की बदौलत लोगों में उनकी काफी इज्जत थी-यह और बात है कि कुछ लोग उन्हें पसन्द नहीं करते थे।

इसकी वजह थी यहाँ के मूल बाशिन्दों यानी कालों के प्रति मिसेज हिल का ‘उदारवादी’ रवैया। हत्या वाली घटना के दो दिन बाद जब मिसेज इस्माइल्स और मिसेज हार्डी इस पर चर्चा करने के लिए मिसेज हिल के घर पहुँचीं तो उनके चेहरों पर दुख के साथ-साथ एक विजय की झलक दिखाई दे रही थी-दुख इसलिए कि उनके सजातीय की हत्या हुई थी और विजय इसलिए कि ये लगातार कहती आयी थीं कि इन कालों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए जो इस घटना से साबित हो गया था। अब देखें मिसेज हिल कैसे कहती हैं कि अगर कालों से ठीक से पेश आया जाए तो इन्हें सभ्य बनाया जा सकता है।

मिसेज इस्माइल्स दुबली-पतली अधेड़ उम्र की महिला थीं और उनकी तीखी नाक तथा एक-दूसरे से भिंचे होंठों को देखकर किसी कट्टर धर्म प्रचारक की याद आ जाती थी। वैसे देखा जाए तो वह अपने विचारों में कट्टर थीं भी। अपने बारे में उन्हें यकीन था कि उन जैसे चन्द लोगों ने ही इस जंगली लोगों के देश में सभ्यता के नखलिस्तान बना रखे हैं और अपनी चाल-ढाल, बातचीत तथा आचार-व्यवहार से वह यहाँ के मूल बाशिन्दों को इस धारणा का अहसास कराती रहती थीं।

मिसेज हार्डी बोअर नस्ल की थीं और काफी पहले दक्षिण अफ्रीका से आकर यहाँ बसी थीं। किसी भी चीज के बारे में उनकी कोई अपनी राय नहीं होती थी-बेशक, हर उस राय से वह इत्तफ़ाक करती थीं, जो उनके पति और उनकी नस्ल के नजरिये से मेल खाती हो। अब आज ही की मिसाल लें-मिसेज इस्माइल्स की हर बात से वह इत्तफाक कर रही थीं। मिसेज हिल पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। वह अपनी राय पर बराबर अड़ी हुई थीं कि काले लोग बड़े वफादार होते हैं और जरूरत है तो बस यह कि उनसे ठीक से व्यवहार किया जाए। वह कहा करती थीं-“बस उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। उनके साथ प्यार से रहो तो वे भी प्यार से रहेंगे। अब मेरे ही ‘लड़कों’ को देखो, वे मुझे कितना प्यार करते हैं। मैं उनसे कुछ भी कह दूँ, वे इनकार नहीं करते।” यही उनका दर्शन था और इसे मानने वाले उदार और प्रगतिशील किस्म के कुछ गोरे भी थे। मिसेज हिल ने अपने ‘लड़कों’ के लिए उदारवादी किस्म के कुछ काम भी किये थे। उन्होंने इनके लिए न केवल ईंट-गारे के (ध्यान रखिए-ईंट-गारे के) क्वार्टर बनवाये थे, बल्कि इनके बच्चों के लिए एक स्कूल भी खोल रखा था। अब यह और बात है कि स्कूल में टीचर ही नहीं थे या बच्चे आधा दिन स्कूल में और आधा दिन चाय-बागानों में बेगार करके बिता देते थे। पर यहाँ बसे बाकी गोरों ने तो इतना भी करने का साहस नहीं दिखाया।

“जो भी हुआ वह अत्यन्त भयानक है-बेहद भयानक,” मिसेज इस्माइल्स अपना फैसला दिया। मिसेज हार्डी ने ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलायी। मिसेज हिल खामोश रहीं। ने “आखिर वे ऐसा करते क्यों हैं? हमने उन्हें सभ्य बनाया, उन्हें गुलामी से निजात दिलायी, उनके कबीलों में आये दिन होने वाली मारकाट खत्म करायी. . . हमारे आने से पहले उनकी जिन्दगी नरक थी-एकदम जंगली।” मिसेज इस्माइल्स एक-एक शब्द को चबा-चबाकर बोल रही थीं, फिर उन्होंने अफसोस में गर्दन हिलाते हुए फैसला दिया, “लेकिन मैंने बराबर कहा है कि ये कभी सभ्य नहीं हो सकते-कभी नहीं।” “हमें थोड़ा सब्र से काम लेना चाहिए, ” मिसेज हिल ने धीरे से कहा।

‘सब्र! सब्र! और कब तक हम सब दिखाते रहें? गैरस्टोन दम्पति से ज्यादा सहनशील और सब दिखाने वाला कौन रहा होगा। उनसे ज्यादा दयालु कौन था? और जरा सोचो, उन लोगों ने अपने आसपास कितनों को आबाद कर रखा था – जरूर उन्हीं सबों ने…”

“नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा।” मिसेज हिल ने कहा।

“फिर किसने किया? किसने किया?”

“उन सबको फाँसी दे देनी चाहिए।” मिसेज हार्डी ने सुझाव दिया। उनकी आवाज में दृढ़ता थी।

“और जरा सोचो तो, उन बेचारों को घर के नौकर ने आवाज देकर सोते से उठाया

“सच?”

“बिल्कुल। घर के नौकर ने दरवाजा खटखटाया और कहा कि वे जल्दी दरवाजा खोलें। बोला कि कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं. . .”

“हो सकता है कि कुछ लोग. ..”

“नहीं जी। यह तो एक साजिश थी। बहुत बड़ी चाल थी। जैसे ही दरवाजा खुला बदमाशों का गिरोह अन्दर घुस गया और उन पर टूट पड़ा। सब तो छपा है अखबारों में। “

मिसेज हिल अपराध-भाव से शून्य में देखती रहीं। उन्होंने अखबार भी ठीक से नहीं पढ़ा था।

चाय का वक्त हो गया था। मिसेज हिल उठीं और दरवाजे तक जाकर बड़े मुलायम स्वर में उन्होंने आवाज दी, “नजोरोग! नजोरोग!”

नजोरोग उनका नौकर था। वह काफी लम्बे कद का चौड़े कन्धों वाला जवान था। पिछले दस वर्षों से भी अधिक समय से वह हिल दम्पति के यहाँ नौकरी कर रहा था। वह अक्सर हरे रंग की पैंट पहनता था और कमर में एक लाल रंग का फेंटा बाँधे रहता था। आवाज सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा दरवाजे तक आया, “यस मेम साहब।”

“चाय।” मेम साहब ने आदेश दिया।

“यस मेम साहब,” और वह झटके में दूसरी मेमसाहबों पर निगाह फेंकता हुआ चाय लाने चला गया। नजोरोग के आने से बातचीत का सिलसिला टूट गया था, पर अब फिर शुरू हो गया।

“देखने में ये कितने भोले-भाले लगते हैं,” मिसेज हार्डी ने टिप्पणी की।

“बिल्कुल जी। एक मासूम फूल की तरह, जिनके अन्दर साँप छुपा रहता है।” मिसेज इस्माइल्स ने शेक्सपीयर की पंक्ति दुहराते हुए अपनाy साहित्य-ज्ञान उँडेल दिया। “पिछले दस साल से भी ज्यादा समय से हमारे साथ है। बहुत ही वफादार है। मुझे बहुत पसन्द करता है।” मिसेज हिल ने उसकी तरफदारी की।

“जो भी हो, मैं उसे नहीं पसन्द करती। मुझे उसकी शक्ल से भी नफरत है।”

“मैं भी नहीं पसन्द करती।”

चाय आ गयी थी। चाय की चुस्कियों के साथ इस हत्याकांड पर, सरकार की नीति पर और उन राजनीतिक पाखंडियों पर बातचीत होती रही, जो इस खूबसूरत देश को नरक बनाने पर आमादा थे। लेकिन मिसेज हिल अपने सिद्धान्तों पर अड़ी ही रहीं और उन्होंने बताया कि ये राजनीतिज्ञ जो ब्रिटेन में कुछ दिन रहकर अपने को बहुत पढ़ा-लिखा समझने लगे हैं, दरअसल यहाँ के मूल लोगों की भावनाओं को कतई समझते नहीं। आप इन्हें प्यार दीजिए और ये लड़के आपको प्यार देने लगेंगे।

बावजूद इसके, मिसेज इस्माइल्स और मिसेज हार्डी के जाने के बाद वह काफी देर तक सारी बातचीत और इस हत्याकांड पर सोचती रहीं। उन्हें बेचैनी महसूस होने लगी और पहली बार उन्होंने गौर किया कि वह आबादी से कितनी दूर रह रही हैं-इतनी दूर कि कोई हमला करे तो वह किसी की मदद भी नहीं पा सकतीं। यह सोचकर मन को तसल्ली हुई कि उनके पास पिस्तौल है।

रात के खाने के बाद नजोरोग की ड्यूटी खत्म हो गयी। अब वह अपने क्वार्टर में जाकर आराम करेगा। रोशनी से जगमगाते मकान से बाहर निकलकर अँधेरे की चादर चीरते हुए वह अपने क्वार्टर की ओर बढ़ा। उसका क्वार्टर पहाड़ी से थोड़ी नीचे की ढलान पर था। उसने मुँह से सीटी बजाकर रात की खामोशी और अकेलेपन से छुटकारा पाने की कोशिश की। उसे कामयाबी नहीं मिली। अचानक उसे एक उल्लू की चीख सुनाई पड़ी।

वह रुक गया और चारों ओर देखने लगा। नीचे घोर अन्धकार था। पीछे मेमसाहब का शानदार बंगला रोशनी में डूबा दिखाई दे रहा था। एक अजीब किस्म के गुस्से से दहकती उसकी आँखें बंगले पर टिकी रह गयीं। अचानक उसे लगा जैसे वह बूढ़ा हो रहा है।

‘ओफ, तुम…तुम…मैं इतने दिनों से तुम्हारे साथ हूँ और तुमने मेरी ये हालत कर दी, मेरे अपने ही देश में। बदले में मुझे तुमसे मिला ही क्या?’ नजोरोग की इच्छा हुई कि वह खूब जोर से इस बंगले से यह सब और न जाने क्या-क्या पूछे जो वर्षों से उसने अपने दिल में जमा कर रखा है। लेकिन इस बंगले से कोई जवाब तो मिलेगा नहीं। उसने अपनी बेवकूफी महसूस की और आगे बढ़ गया।

उल्लू की चीख फिर सुनाई पड़ी। दूसरी बार।

‘मेमसाहब के लिए चेतावनी’, नजोरोग ने सोचा। एक बार फिर उसकी आत्मा गुस्से में चीत्कार कर उठी, सभी गोरी चमड़ी वालों के खिलाफ, सभी विदेशियों के खिलाफ, जिन्होंने ईश्वर द्वारा प्राप्त भूमि से उस जैसे धरती पुत्रों को बेदखल कर दिया है। आखिर भगवान ने गेकोयो से यही तो वादा किया था कि सारी जमीन कबीले के पितामह को मिलेगी। फिर हुआ क्या? क्यों हमारी सारी जमीन छीन ली गयी?

उसने अपने पिता को याद किया, अक्सर गुस्से और नफरत के क्षणों में वह पिता को याद करता है। उनकी मृत्यु एक संघर्ष के दौरान हुई थी- यह संघर्ष था टूटे पूजा स्थलों को फिर से बनाने का। यही था कुख्यात नैरोबी हत्याकाण्ड जब पुलिस ने उन लोगों पर गोली चलाई थी, जो अपने अधिकारों के लिए शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस की गोली ने पिता की जान ले ली। तब से नजोरोग को अपनी रोजी-रोटी के लिए न जाने कितना भटकना पड़ा है। कभी गोरों के फार्म पर, कभी यहाँ नौकरी तो कभी वहाँ। इस सिलसिले में तरह-तरह के लोगों से साबका पड़ा- कोई बहुत दुष्ट था तो कोई बेहद भला, लेकिन रौब गाँठने में सब बड़े तेज थे और जिन्हें जितना उचित महसूस होता था, तनख्वाह देते थे। फिर एक दिन हिल्स परिवार के यहाँ नौकरी करने लगा। यहाँ आना भी एक अजीब इत्तफाक था। हिल्स परिवार के पास जो जमीन थी, उसका बहुत बड़ा हिस्सा वही था, जिसे दिखाकर उसके पिता बताया करते थे कि यह जमीन उसके परिवार की है। पिता की मृत्यु से पहले अकाल पड़ा था और नजोरोग को अपने घर वालों के साथ कुछ दिनों के लिए मुरांगा जाकर रहना पड़ा था। अकाल खत्म होने पर ही वे लौटे थे और इस बीच उसकी सारी जमीन पर हिल्स परिवार का कब्जा हो चुका था।

“उस अंजीर के पेड़ को देख रहे हो न! वह सारी जमीन तुम्हारी है। घबराना नहीं बेटे, गोरों के जाने के बाद हम फिर अपनी जमीन हासिल कर लेंगे।” उसके पिता अक्सर तसल्ली देते।

उन दिनों वह छोटा था। पिता की मृत्यु के बाद ये बातें दिमाग से ओझल हो ही गयी थीं। आज इस पेड़ के पास खड़े होने पर सहसा सब कुछ याद आ गया।

नजोरोग ने मिसेज हिल को कभी पसन्द नहीं किया। दरअसल वह मन ही मन यह सोचकर इठलाती रहती थी कि उसने मजदूरों के लिए बहुत कुछ किया है और इसी बात से नजोरोग चिढ़ता था। उसने मिसेज इस्माइल्स और मिसेज हार्डी जैसी निर्दयी औरतों के साथ भी काम किया था। लेकिन उसे हमेशा अपनी स्थिति का एहसास रहता। मिसेज हिल का उदारतावाद तो सचमुच दमघोंटू किस्म का था। नजोरोग को सभी गोरे बाशिन्दों से नफरत थी। इनके पाखंड और आत्मसन्तोष से तो इसे और भी ज्यादा चिढ़ थी। मिसेज हिल भी औरों की ही तरह थीं, लेकिन अपने मातृभाव के कारण वह खुद को दूसरों से बेहतर समझती थीं। दरअसल वह दूसरों से बदतर थीं, क्योंकि उनके पास होने पर आप जान ही नहीं पाते थे कि अपनी असली हैसियत क्या है।

अचानक नजोरोग चीख पड़ा, ‘मैं तुम सबसे नफरत करता हूँ।’ फिर उसे हल्का-सा सन्तोष हुआ। आज की रात, मिसेज हिल को मरना ही होगा- उसे अपनी उदार छवि और अपनी नस्ल वालों के पाप का खामियाजा भुगतना ही होगा। इससे कम-से-कम इस देश से एक गोरा तो कम होगा।

वह अपने कमरे में पहुँच गया। पड़ोसियों के कमरे बन्द हो चुके थे-कइयों के कमरे में तो बत्ती भी बुझ चुकी थी। या तो सब सो गये थे या दारू पीने के ठेके पर चले गये थे। उसने लालटेन जलायी और बिस्तर पर बैठ गया। उसका कमरा इतना छोटा था कि बिस्तर पर बैठकर कोई बाँह फैलाए और हर कोने को छू ले, तो भी उसे अपनी दो बीवियों के साथ इस कोठरी में-जी हाँ, इसी कोठरी में रहना पड़ता है। हकीकत तो यह है कि इसी हालत में उसने पाँच साल से भी अधिक समय गुजार दिया है, लगभग रेंगते हुए! लेकिन मिसेज हिल समझती हैं कि ईंट-गारे की इन कोठरियों को बनवाकर उन्होंने बहुत बड़ा अहसान कर दिया है।

मिसेज हिल पूछती रहती हैं-‘मजुन साना?’ (मजे में हो न?) – दरअसल यह इनका तकिया कलाम है। जब भी उनके यहाँ कोई मेहमान आता है, वह उन्हें खींचकर पहाड़ी के छोर तक ले जाती हैं और इशारे से उन कोठरियों को दिखाती हैं, जिन्हें उन्होंने मजदूरों के लिए बनवा रखा है।

एक बार फिर नजोरोग के चेहरे पर उदास मुस्कान निखर गयी। उसने सोचा कि अब इस बेचारी को अपनी नकली दयालुता और झूठे अहसानों की कीमत चुकानी ही पड़ेगी। उसे खुद भी पूरा-पूरा हिसाब करना था। पिता की मौत का हिसाब, और अपनी पुश्तैनी जमीन के छिनने का हिसाब। अच्छा ही हुआ जो उसने पिछले दिनों बीवी-बच्चों को कैम्प भेज दिया था। उनके रहने से थोड़ी दिक्कत हो सकती थी। काम पूरा होने के बाद अगर उसे फरार होना पड़ा तो अब कोई चिन्ता नहीं रहेगी। अब किसी भी समय सारे ‘झीई’ (माऊ-माऊ विद्रोह के समय छापामार दस्तों में सकिय लड़के) आ सकते हैं। वह उन्हें मिसेज हिल के घर तक पहुँचा आएगा। विश्वासघात, हाँ विश्वासघात ही। पर कितना जरूरी हो गया है।

उल्लू की चीख कानों में पड़ी, जो अबकी हर बार से तेज थी। यह तो अपशकुन है। मौत का सूचक है-मिसेज हिल की मौत का। उसकी आँखों के सामने मिसेज हिल का चेहरा घूम गया। दस साल से भी अधिक समय वह मेमसाहब और बवाना के साथ गुजार चुका है। मेमसाहब अपने मर्द को बहुत चाहती थीं, इसमें कोई शक नहीं। उसे याद है जब उगांड़ा में साहब के मरने की खबर आयी थी तो मेमसाहब पागल ही हो गयी थीं। दुख की उस घड़ी में मेमसाहब का साहबपन एकदम गायब हो गया था और नजोरोग ने ही उन्हें ढांढस बँधाया था। मेमसाहब के बच्चे। अपनी आँखों से उसने उन्हें बढ़ते देखा है। किसी भी बच्चे की तरह। खुद उसके बच्चों की तरह। वे अपने माँ-बाप को बहुत प्यार करते थे और मिसेज हिल भी उन्हें कितना दुलराती रहती थीं। वे अब इंगलैंड में हैं जहाँ उनके माँ-बाप कोई नहीं हैं, बेचारे!

और तब उसे लगा कि उससे यह काम नहीं होगा। ऐसा क्यों महसूस हुआ, नहीं पता, पर अचानक मिसेज हिल उसके मन-मस्तिष्क पर एक औरत के रूप में, एक पत्नी के रूप में, एक माँ के रूप में छा गयीं। ना, ना, वह किसी औरत की हत्या नहीं कर सकता। वह किसी माँ को नहीं मार सकता। अपने भीतर आये इस बदलाव से वह व्यग्र हो उठा। बार-बार कोशिश करने लगा कि वह मिसेज हिल को एक विदेशी बाशिन्दे के रूप में देखे-खालिस गोरी औरत के रूप में। अगर ऐसा हो सकता तो उसका काम आसान हो जाता, क्योंकि वह गोरे लोगों से सचमुच नफरत करता था। लाख चाहने पर भी दस वर्षों के सम्बन्ध को वह भुला नहीं पा रहा था। वह जानता था कि मिसेज हिल अगर बच गयीं तो भी कालों के प्रति उनका हमदर्दी वाला पाखंड तो बना ही रहेगा। वह क्यों नहीं मिसेल हिल को महज एक विदेशी के रूप में देख पा रहा है। वह प्रार्थना करने लगा-हे ईश्वर, दुनिया से जुल्म खत्म करो। अगर अन्याय और जुल्म खत्म हो जाए तो काले-गोरे का झगड़ा ही न रहे और उसके सामने कभी ऐसी दर्दनाक स्थिति ही न पैदा हो।

अब वह क्या करे? उसने उन ‘लड़कों’ (छापामारों) को खबर कर दी थी- वे अब आते ही होंगे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जहाँ तक गोरे बाशिन्दों की बात है, उसके मन में कोई दुविधा नहीं थी, पर दो बच्चों की माँ का वह कैसे सफाया कराये ?

बेचैन मन लिये वह बाहर निकल आया।

बाहर घना अँधेरा था। आकाश में तारे एकटक उसे देख रहे थे-ऐसा लगता था गोया उन्हें भी नजोरोग के फैसले का इन्तजार हो। वह तारों से आँखें नहीं मिला सका और आहिस्ता-आहिस्ता मिसेज हिल के बंगले की ओर चल पड़ा। मेमसाहब को बचाना ही होगा – उसने तय कर लिया था।

समय बर्बाद करने से कोई फायदा नहीं, पहले ही बहुत देर हो चुकी है। वे ‘लड़के’ आते ही होंगे। अब वह दौड़ रहा था। एक औरत की जान बचाने के लिए दौड़ रहा था। सड़क पर उसे कदमों की आहट सुनाई पड़ी और वह झाड़ी में छुप गया। उसने देखा, वे लड़के अपने अभियान पर निकल पड़े थे। उन्हें धोखा देते हुए उसे अजीब-सा लगा। उनके गुजर जाने के बाद वह और तेजी से दौड़ने लगा। अगर लड़कों को पता चल गया कि उसने धोखा दिया है तो वे उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। पर कोई बात नहीं। एक औरत को बचाने के लिए उसकी जान भी चली जाए तो कोई परवाह नहीं।

आखिरकार हाँफता-खाँसता और पसीने से तर-बतर वह मिसेज हिल के बंगले तक पहुँच ही गया और लगातार चीखते हुए उसने कुंडी खटखटायी- “मेमसाहब! मेमसाहब!”

मिसेज हिल अभी सोयी नहीं थीं। दोपहर की बातचीत के बाद से ही उन्हें अजीब-सी दहशत हो रही थी। नजोरोग के जाने के बाद एकदम सन्नाटा हो गया था और उन्होंने आलमारी से पिस्तौल निकाल कर अपने पास रख लिया था। अपनी तरफ से तैयार रहने में क्या हर्ज है। वह सोच रही थीं-काश! उनके पति आज जीवित होते तो यह अकेलापन नहीं महसूस होता।

गैरस्टोन दम्पति की हत्या से उन्हें भी दुख था और बार-बार अपने अकेले होने का एहसास दहशत पैदा कर रहा था। उन्हें नजोरोग का मासूम चेहरा याद आ रहा था। क्या उसके बीवी-बच्चे भी हैं? कितने बच्चे हैं? कितनी बीवियाँ हैं? उन्हें हैरानी हुई कि अब से पहले उन्होंने कभी यह क्यों नहीं सोचा। यह पहला मौका था, जब उनके जेहन में नजोरोग की तस्वीर एक बाल-बच्चे वाले आदमी के रूप में उभरी थी, वरना वह तो उसे एक नौकर के अलावा कुछ सोच ही नहीं पाती थीं। उन्हें अपनी इस लापरवाही और अमानवीयता पर मन ही मन दुख हुआ। इन्हीं ख्यालों में वह डूबी थीं कि उन्हें आवाज सुनाई दी – “मेमसाहब! मेमसाहब!”

अरे यह तो नजोरोग की आवाज है-उनके नौकर की। उनका शरीर पसीने से तर हो गया। अचानक उन्हें गैरस्टोन दम्पति के साथ हुआ हादसा पूरे विस्तार के साथ दिखाई देने लगा। अब उनका भी अन्त आ गया है। जिन्दगी के सफर का अन्तिम पड़ाव। आखिर नजोरोग हत्यारों को यहाँ तक पहुँचा ही गया। वह भय से काँपने लगीं।

अचानक उन्होंने अपने को संभाला और लगा जैसे शरीर की सारी ताकत एक जगह सिमट आयी है। बेशक, वह अकेली हैं और अभी वे दरवाजे को तोड़ भी देंगे। लेकिन नहीं, वह कायरों की तरह नहीं मरेंगी। उन्होंने पिस्तौल को कसकर पकड़ लिया, दरवाजा खोला और गोली चला दी। गोली चलाने के साथ ही वह चीख पड़ीं- ‘आओ, मुझे मार डालो’, और बेहोश होकर गिर पड़ीं। वह जान ही नहीं सकीं कि उन्होंने उस व्यक्ति को मार डाला है, जो उनकी जान बचाने आया था। पास में नजोरोग की लाश पड़ी थी।

अगले दिन अखबारों में पूरा विवरण छपा। एक अकेली औरत ने पचास बदमाशों का बहादुरी से मुकाबला किया और कमाल तो यह है कि एक को मार भी डाला। “हम लोग तो कहते ही थे कि वे सभी एक जैसे हैं।”

“सब बदमाश हैं।” मिसेज हार्डी ने कहा। मिसेज हिल खामोश रहीं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ। जितना ही वह इस बारे में सोचतीं, उलझन बढ़ती जाती। वह अभी भी शून्य में देख रही थीं। फिर उन्होंने एक ठंडी साँस छोड़ी और कहा, “मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही हूँ. . . शायद मैं नजोरोग को जान नहीं पायी।

“क्या? जान नहीं पायीं?”

“अजीब बात है,” मिसेज इस्माइल्स ने कहा, “इन सबों को कोड़े लगाने चाहिए।”

    लोग शायद यह कभी नहीं जान पाएँगे कि नजोरोग ने एक शहादत दी। मिसेज हिल के पश्चात्ताप को भी लोग शायद ही समझ सकें।

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