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शिक्षण संस्थाओं में एबीवीपी का समानांतर सत्ता स्थापित करने का प्रयास

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 हरनाम सिंह

#मंदसौर। सत्ता में आने वाला  प्रत्येक राजनीतिक दल चाहता है कि समस्त शासनाधीन उपक्रम उन नीतियों को क्रियान्वित करें जिनका उनके द्वारा चुनाव में मतदाताओं से वादा किया गया है। यहां तक तो ठीक है। लेकिन जब शासकीय कर्मचारियों को अपने और अपने दल के आधीन मान कर संविधान और नियमों के दायरे के बाहर जाकर काम करने के लिए विवश किया जाता है, तो समस्या पैदा होना स्वाभाविक है। भारतीय जनता पार्टी और उसके अनुशांगी संगठनों द्वारा आये दिनो दैनंदिन शासकीय गतिविधियों में हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है। कला, संस्कृति, शिक्षा के क्षेत्र में मंदसौर जिले के नागरिक इन संगठनों का वर्चस्व देख रहे हैं। सीतामऊ में सूफी गायन रुकवाने, मंदसौर शासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य श्री वर्मा का निलंबन इसी सोच का परिणाम है।

        #ऊपर का आदेश   

                 विगत दिनों शासकीय महाविद्यालय में नवनियुक्त प्राचार्य डॉक्टर जे एस दुबे द्वारा कॉलेज के समस्त विभागाध्यक्षों को उसे बैठक में शामिल होने का निर्देश दिया गया जिसकी अध्यक्षता विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री कर रहे थे। उनका यह आदेश अभूतपूर्व था। जब प्राचार्य के परिपत्र की निंदा होने लगी, एतराज जताया जाने लगा तो प्राचार्य श्री दुबे की का स्पष्टीकरण यह था कि *ऊपर से आदेश आते हैं।* यह ऊपर कौन है ? जो प्राचार्य को ऐसे आदेश जारी करने के लिए दबाव बना रहा है ? शासकीय आदेश होता तो प्राचार्य बता सकते थे कि किसने भेजा है, लेकिन विद्यार्थी परिषद की बैठक में शामिल होने का आदेश उन्हें किस ऊपरी ताकत ने दिया है। उसका नाम लेने से भी वे डरते हैं।श्री दुबे चाहते तो इनकार भी कर सकते थे। लेकिन उन्होंने उस ऊपरी ताकत के सामने आत्मसमर्पण करना बेहतर समझा। उनके सामने प्राचार्य श्री वर्मा के निलंबन का क्रूर उदाहरण था।

    #भय काम करता है

            सीतामऊ में सूफी गायन रुकवाने के लिए प्रदर्शनकारियों द्वारा कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के सामने जिस भाषा और धमकियों का उपयोग हुआ उस दौरान उच्च स्तर के इन सक्षम अधिकारियों का मौन सभी शासकीय अधिकारियों कर्मचारियों के लिए सबक और चेतावनी बनकर सामने आया। जिसे महाविद्यालय के वर्तमान प्राचार्य श्री दुबे ने अच्छी तरह से समझ लिया था।

               कतिपय समाचार पत्रों और नेताओं ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए प्राचार्य श्री दुबे पर कठोर कार्यवाही की मांग की। उनका कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठन लगातार संवैधानिक संस्थाओं का खुलकर मजाक उड़ा रहे हैं।वे अपनी समानांतर सत्ता चलाने के लिए शासकीय संस्थाओं पर कब्जा जमाने का प्रयास कर रहे हैं, जो निंदनीय है। इस मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

       याद रखा जाना चाहिए कि     निलंबित प्राचार्य राज कपूर वर्मा द्वारा यशोधर्मन थाने में दिए गए आवेदन में उनके साथ हुए दुर्व्यवहार के आरोपियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। श्री वर्मा को फोन पर धमकी देने वाले परिषद के नेता पर भी कार्यवाही नहीं हुई। प्राचार्य के समर्थन में कॉलेज के प्रोफेसरों ने पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन दिया उस पर भी कोई संज्ञान  नहीं लिया गया। कॉलेज में नियुक्त विद्यार्थी परिषद के नेता को बिना काम के वेतन देने के मामले में भी कोई जांच नहीं हुई। परीक्षा के समय कॉलेज के प्रशासनिक भवन पर ताला लगाकर प्रदर्शन, नारेबाजी करने सीसीटीवी कैमरों को नुकसान पहुंचाने वालों पर भी कार्यवाही नहीं हुई। पुलिस तंत्र किसके और कितने दबाव में काम कर रहा है ? समूचा प्रशासन तंत्र डर के साये में काम करने का निर्णय ले चुका है। सच-झूठ, न्याय -अन्याय, कर्तव्य पालन, संवैधानिक व्यवस्था सभी बेमानी बना दी गई है।

         #विवादित है एबीवीपी

              विद्यार्थी परिषद पर देश के विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में ही नहीं अन्य कई गतिविधियों में हिंसा, मारपीट को अंजाम देने के आरोप है। ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों पर वे आए दिनों हमले करते रहे हैं। 

#प्रोफेसरों को बनाया बंधक

             दो दिन पहले 25 फरवरी को इंदौर के होलकर साइंस कॉलेज में बिना अनुमति के होली मिलन समारोह के पोस्टर लगाए गए । कालेज  प्रबंधन द्वारा पोस्टर हटाने द का विरोध करते हुए विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने चैनल गेट बंद कर कॉलेज के 150 प्रोफेसरों को आधे घंटे तक बंधक बनाए रखा। जिस स्थान पर प्रोफेसर थे, वहां की बिजली भी बंद कर दी गई। जिसके चलते कइ वरिष्ठ  और महिला प्रोफेसर डर गए। प्राचार्य डॉक्टर अनामिका जैन ने कलेक्टर से मिलकर उन्हें घटना की जानकारी दी।

              घटनाक्रम पर दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक अमित मंडलोई ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि प्रोफेसर ही नहीं पूरी शिक्षा व्यवस्था ही जैसे बंधक बना ली गई है। बिना अनुमति के होली मिलन समारोह के पोस्टर लगाकर छात्र नेता क्या साबित करना चाहते हैं ? क्या वे कॉलेज की मर्यादा और अनुशासन से बड़े हो गए हैं ? इस पर समय रहते अंकुश लगाना ही होगा वरना शिक्षा के मंदिर घटिया राजनीति के अखाड़े बनकर रह जाएंगे। इस टिप्पणी को मंदसौर की घटनाओं के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

              मंदसौर, इंदौर शासकीय  महाविद्यालयों की इन घटनाओं ने  वर्षों पूर्व वर्ष 2006 में उज्जैन माधव कॉलेज के प्रोफेसर हरभजन सिंह सभरवाल और दो दूसरे प्रोफेसर की पिटाई की घटना की याद दिला दी। इस मारपीट का आरोप विद्यार्थी परिषद के नेताओं पर लगा था। घटनाक्रम में प्रोफेसर सभरवाल की मृत्यु हो गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभरवाल की हत्या को साधारण घटना बताया था। प्रकरण में राजनीतिक हस्तक्षेप इतना था कि सर्वोच्च न्यायालय को सभरवाल हत्याकांड का मुकदमा महाराष्ट्र के नागपुर में स्थानांतरित करना पड़ा था। प्रदेश पुलिस की लचर जांच से घटना के सभी आरोपी बरी हो गए।

              वर्ष 2008 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से ए के रामानुजम की किताब हटाने के आंदोलन के दौरान प्रोफेसरों की पिटाई का आरोप परिषद के कार्यकर्ताओं पर लगा था।

               वर्ष 2009 में हितेश चौहान जिसे विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता बताया गया था उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर अहमदाबाद में एक आमसभा में जूता फेंका था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया लेकिन श्री सिंह के कहने पर उसे रिहा कर दिया गया।

               खंडवा के भगवत राव मंडलोई कॉलेज में परिषद कार्यकर्ताओं पर दो प्रोफेसर पर हमला करने का आरोप लगा। बाद में एक प्रोफेसर की मृत्यु हो गई।

              गुना में एक स्वयं सेवी संगठन द्वारा शिक्षा बचाओ अभियान अंतर्गत हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा था। इस दौरान उन पर हमला किया गया उसका आरोप भी विद्यार्थी परिषद पर लगा था। ऐसे अनेक आरोप एबीपी पर लगते रहे हैं।

             विद्यार्थी परिषद का ध्येय वाक्य है “ज्ञान-शील- एकता”। परिषद अपना मकसद विद्यार्थियों को उचित मार्गदर्शन देकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण की ओर उन्हें अग्रसर करना बताती है। एबीवीपी को आत्म अवलोकन करना चाहिए कि क्या वह अपने ध्येय वाक्य पर कायम है।

Ramswaroop Mantri

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