डा. रजनीश श्रीवास्तव
9 अगस्त क़ो रक्षाबंधन का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बहनों ने अपने भाईयों के हाथों में राखी बांधी और भाईयों ने बहनों को जीवन भर उनकी रक्षा करने का वादा भी किया। लेकिन बहनों के होते हुए भी अनेक भाईयों की कलाई राखी के बिना सूनी रह गई। चाहते हुए भी राखी नहीं बांधने की क्या मजबूरी है… इंदौर में अपर कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए डा. रजनीश श्रीवास्तव बता रहे हैं कि जमीन और जायजाद इसका मुख्य कारण है। भाईयों और बहनों के बीच हो रहे विवाद की एक बड़ी वजह यह भी है। हो सकता है आप… डा. श्रीवास्तव के विचारों से सहमत न हों लेकिन न्यायालयों में चल रहे विवादों का एक बड़ा कारण तो यही है।

रक्षाबंधन का त्यौहार मात्र भाई बहन का त्यौहार ना होकर यह दो अलग परिवारों को सदैव के लिए मजबूती से बांधने का त्यौहार है। हमारे पूर्वजों ने यह त्यौहार इस बात को ध्यान में रखकर बनाया था कि बेटी के विवाह के बाद भी उसका नाता मायके से किस तरह से जोड़ा जाए कि बेटी के माता पिता के ना रहने पर भी बेटी को उसका घर हमेशा याद रहे और उसे वही स्नेह व सम्मान मायके में मिले जो माता पिता के जीवित रहने पर मिलता था। इसीलिए रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। भाई और बहन दोनों को इस पर्व का इंतजार रहता है कि दोनों परिवार इस दिन अनिवार्य रूप से एक साथ इकट्ठा होंगे और एक साथ मिल बैठ कर रक्षाबंधन का त्यौहार मनाएंगे। इसमें भाई-बहन, भाभी-ननद, जीजा-साले, मामा-मामी-भांजे, भांजी, बुआ, फूफा, भतीजा, भतीजी आदि एक साथ मिल बैठकर आंनद पूर्वक त्य्यौहार मनाया करते थे और आपस में अच्छी तरह घुलमिल कर एक दूसरे के सुख – दुख में भागीदारी सुनिश्चित किया करते थे।
मगर सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले और उससे बने एक कानून ने रक्षाबंधन के त्यौहार में बहुत से परिवारों में भाई – बहन के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला जिसमें यह अनिवार्य कर दिया गया है कि बेटी को पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्सा मिलेगा।
इस कानून के पहले जिनके बेटे और बेटियां दोनों होते थे, वह अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह से अपनी बेटियों को साल भर हर त्यौहार पर उपहार आदि देते रहते थे और दोनों परिवारों में बेटी के विवाह के बाद भी आपसी सौहार्द प्रेम बना रहता था। जिस माता-पिता की सिर्फ बेटियां होती थी, वह अपनी संपत्ति बेटियों के साथ-साथ अपने भाई या बहन के बच्चों को भी देते थे जो उनकी देखभाल करते थे और उनके चचेरी बहन के परिवार से भी वही सम्बन्ध रहते थे जैसे सगी बहन से।
मगर अब बेटी के हिस्से की अनिवार्यता से बहुत से घर में विवाद होने शुरू हो गए है। किसी परिवार की बेटी जब दूसरे घर में बहू बनती है तो वहां उसको उसके ससुराल की सम्पत्ति में उसके पति का हिस्सा मिलता ही है। अनेक मामलों मेँ बेटी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नहीं लेना चाहे तो उसका पति या पुत्र – पुत्रियां भी हिस्सा लेने के लिए न्यायालय में याचिका दायर कर देते हैं।
बेटियों के हिस्से का सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से पालन होने लगा है और अधिकांश परिवारों में बेटी का हिस्सा अलग होने से उनमें मनमुटाव और विवाद होने लगे हैं। संपत्ति के बंटवारे को लेकर भाई-बहन एक दूसरे का मुंह तक देखना पसंद नहीं कर रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल रहे हैं जिसमें दूसरी और तीसरी पीढ़ी के बच्चे भी विवाद कर नाना की संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए मामा और ममेरे भाई के विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर रहे हैं। आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व हिस्सा बंटवारा हो चुका था और बहन ने अपना अधिकार अर्थात पैतृक सम्पत्ति का त्याग भी कर दिया था। उस संपत्ति में भी आज बहन के बेटे मामा से विवाद कर सम्पत्ति में हिस्सा मांग रहे हैं। पहले जो परिवार आपस में प्रेम से रहते थे, आज उनमें अविश्वास की भावना भर गई और बात करना तो दूर, एक दूसरे का मुंह तक नहीं देखना चाहते हैं।
मेरे समक्ष एक बार एक भाई और बहन के बीच के विवाद का प्रकरण अपील में आया था। दोनों ही परिवार गरीब थे। मैंने उनको समझाइश देने का प्रयास भी किया। इत्तेफाक से उनके प्रकरण की सुनवाई के दौरान रक्षाबंधन का त्यौहार था तो हमने पेशी के दिन अपने पेशकार से उस प्रकरण के निराकरण के लिए राखी और मिठाई मंगवा कर रखी ताकि इन भाई बहनों को समझाइश देकर राजीनामा करा दिया जाए। किंतु पेशी के समय बहन ने भाई को राखी बांधने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि उसका बेटा (भांजा) मामा से राजीनामा के लिए तैयार ही नहीं हुआ और स्पष्ट कहा मुझे तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण अपनी जमीन का हिस्सा चाहिए। उस समय भाई और बहन दोनों की आँख नम हो गई थी मगर कुछ कह नहीं कर सके क्योंकि बहन को तो अपने बेटे के साथ ही रहना था इसलिए वह भी कुछ नहीं कर सकती थी। एक कानून ने परिवारों में कड़वाहट भर दी है जो अब कभी भी एक नहीं हो सकते।





