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कलम के राजकुमार थे, राजकुमार केसवानी

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भोपाल

राजकुमार केसवानी भोपाल गैस त्रासदी को दुनिया के सामने लाने वाले पहले पत्रकार थे।गैस कांड की रिपोर्टिंग ने उन्हें दुनियाभर में मशहूर किया। न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए भी उन्होंने गैस त्रासदी की इंवेस्टिगेटिव सिरीज की थी। वे भास्कर में लगातार कई दशकों से मशहूर कॉलम ‘आपस की बात’ लिख रहे थे। वे 2003 में दैनिक भास्कर इंदौर के रेसिडेंट एडिटर बने थे। 2004 से 2010 तक भास्कर की मैगजीन रसरंग के संपादक भी रहे। उनकी अंत्येष्टि शनिवार सुबह 10 बजे भदभदा विश्राम घाट में होगी। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने दी श्रद्धांजली

राजकुमार केसवानी के बिना हिन्दी पत्रकारिता में किस्सों का संसार खाली हो गया है। जैसे किसी बड़े उस्ताद की गायकी का रेंज कोई नहीं पकड़ सकता, उसी तरह केसवानी जी की पत्रकारिता का रेंज सौ पचास शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। भोपाल गैस कांड से पहले की चेतावनी और बाद की खोजी पत्रकारिता के किस्से सुनते हुए हमेशा लगा कि मैं हिन्दी के पहले अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार से मुख़ातिब हूं। उनका नाम कहां तक नहीं पहुंचा।

मध्यप्रदेश की राजनीति के सारे दिग्गज राजकुमार केसवानी की रिपोर्टिंग की चुभन को महसूस कर चुके होंगे। अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, कैलाश जोशी जैसे मुख्यमंत्रियों के अथाह किस्से मेज पर पलट कर बिखेर देते थे। लेकिन यह सब बताते हुए उनमें कभी दंभ नहीं दिखता था। एक तरह की मस्ती दिखती थी। जैसे ये तो करना ही था और करके छोड़ दिया और जब उस दुनिया से निकले तो फिर मुड़ कर नहीं देखा। दरअसल वे दुनिया में कई छोटे-छोटे मोहल्ले थे, जिनमें केसवानी कलम लेकर भटका करते थे। उन मोहल्लों की हर बात की जानकारी रखने वाला नुक्कड़ के बादशाह का नाम राजकुमार केसवानी है।

भोपाल पहली बार जब आना हुआ तो उनके घर जाना हुआ। उन्होंंने ही बुलाया होगा। खाना खिलाने के बाद अपनी बागवानी दिखाई। फिर ले गए उस कमरे में जहां रैक पर भोपाल गैस कांड के दस्तावेज, विधानसभा में हुई बहसों की कापी और अखबार रखे थे। इंटरनेट के दौर के पहले के पत्रकारों के लिए यह म्यूजियम की तरह लगेगा, लेकिन उस दौर में भी यह म्यूज़ियम जैसा ही था। फिर उनके संगीत का कमरा। हज़ारों आडियो कैसेट। हिन्दी सिनेमा के गीतों की किताबें। सबके बीच केसवानी जी का ठाठ। शास्त्रीय संगीत में गोते लगाते हुए अचानक से हिन्दी सिनेमा के गीतों की मोती चुन लाते थे।

अरबी संगीत के प्रभाव की चर्चा करने लगते और कैसेट निकाल कर बजा देते कि देखो यहां से उठाया है। हिन्दी सिनेमा संसार के कथाकार के रूप में जितने किस्से उनके पास थे, वो मुंबई की गलियों में भी नहीं मिलेंगे। केसवानी ही मुगल-ए-आजम के बनने की इतनी मुकम्मल कहानी लिख सकते हैं। उर्दू शायरी की दुनिया पर जितनी पकड़ थी, उतनी ही उनकी ज़ुबान से भोपाली टपकती थी। अपनी भोपाली को वो ऐस बचा कर रखते थे कि उसे हिन्दी उर्दू और अंग्रेजी की नजर न लग जाए। राजकुमार केसवानी किसी एक मुकाम पर नहीं रुके। उन्होंने अपने लिए कई मंजिलें तय कीं ताकि सफर का रोमांच बना रहे।

टीवी से इतना दूर रहते थे कि हिम्मत नहीं हुई कि उनसे पूछूं कि प्राइम टाइम के लिए आपके साथ बात करना चाहता हू्ंं। उन्होंने बातचीत ही नहीं की बल्कि शो के लिए जरूरी तस्वीरें और उनकी कापीराइट दिलाने का भी इंतजाम किया। आखिर बार जब फोन आया तो कहा कि मैंने कशकोल नाम से किताबें लिखी हैं। उर्दू के ना-खुदाओं की दास्तानें। भेज रहा हूं। पढ़ना।

मैं जानता हूं कि उन्होंने अपने जीवन में बहुतों को चाहा होगा, लेकिन मैं इससे ख़ुश था कि उन तमाम चाहे जाने वालों की सूची में मैं भी हूं। भोपाल के पत्रकारों का उस्ताद चला गया। उनके साथ वो नुक्कड़ उजड़ गया जहां पर चर्चाओं का ढेर लग जाते थे। भास्कर के पाठक राजकुमार केसवानी को पढ़ने के साथ जीते थे। लोग उनके लिखे की कतरन निकाल कर अपनी कॉपी में जमा करते थे। मैं भास्कर के पाठकों के दुख को समझता हूं। जानता हूं कि आज आप उदास हैं। आज मैं भी उदास हूं।
– अलविदा उस्ताद।

Ramswaroop Mantri

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