कपास के जन्म का इतिहास मानव सभ्यता के विकास से जुड़ा है। सिंधु घाटी की सभ्यता में मिले प्रमाणों से पता चलता है कि उस दौर में भी कपास की फसल उगाई जाती थी और उसके रेशे से सूत बनाया जाता था और सूत से कपड़े। मिस्र अब इजिप्ट की नील घाटी सभ्यता में कपास से सूत और कपड़ा बनाने की जानकारी प्राप्त होती है। जाहिर है कपास का इंसान द्वारा इस्तेमाल बहुत प्राचीन है। इसी तरह यदि मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल के बेड़िया कस्बे की तीखी मिर्च की मंडी देश में अपनी पहचान रखती हैं, तो निमाड़ का सफेद सोना जिसे कपास के रूप में जाना जाता है वह अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। निमाड़ के खरगोन और बड़वानी जिले देश में कपास उत्पादन में अग्रणी हैं।
कपास उत्पादन के लिए बालुई दोमट और काली मिट्टी के साथ गर्म जलवायु उपयुक्त रहती है, जो निमाड़ की मूल प्रकृति ही है। वहीं, कपास की फसल में पानी की जरूरत होती है, जिसकी पर्याप्त पूर्ति नर्मदा से हो जाती है।
इसलिए मनाया जाता है कपास दिवस
कपास के महत्व, उत्पादन बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने और कपास के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से वर्ष 2019 में अफ्रीका के चार देशों ने कपास दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। उसके बाद विश्व कॉटन दिवस मनाया जाने लगा। हर साल 7 अक्तूबर को विश्व कपास दिवस मनाया जाता है, ताकि कपास के फायदों, इसके वैश्विक महत्व और कपास उद्योग में लगे लाखों लोगों की आजीविका में इसकी भूमिका को उजागर किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021 में इस दिन को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी।
2002 से बोया जाने लगा बीटी कपास
मध्य प्रदेश में पहले किसानों द्वारा सामान्य कपास की फसल बोई जाती थी। वर्ष 2002-03 से बीटी कॉटन फसल बोना शुरू किया गया। बीटी कॉटन की उच्च कीट प्रतिरोधक क्षमता और अधिक उपज मुख्य विशेषता है। इस कारण यह किसानों में शीघ्र लोकप्रिय हुआ। 2024-25 में प्रदेश में 6.22 लाख हेक्टेयर कपास की फसल बोई गई थी। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में कपास की अलग-अलग प्रकार की किस्म की फसल बोई जाती है। देश में जैविक कपास उत्पादन में मध्य प्रदेश का योगदान 40 प्रतिशत है। प्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल में सर्वाधिक कपास का उत्पादन होता है। वर्ष 2024-25 में 5.60 लाख मैट्रिक टन कपास का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ।।
मंडी में बंपर आवक
बड़वानी मंडी में कपास की इस बार बंपर आवक हो रही है। मंडी में कपास बेचने के लिए किसानो की गाड़ियों की लाइन लगी है। कमजोर क्वालिटी का कपास 3500 रुपये क्विंटल और अच्छी क्वालिटी का कपास 6300 से 6500 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है।
कीटनाशक का इस्तेमाल
खरगोन के लोनारा के ऋतेश जैन का कहना है कि बीटी कॉटन को इसलिए अपनाया था कि इसमें कीटनाशक का उपयोग बहुत ही कम करना होगा, पर यह संभव नहीं हुआ। इस वर्ष लगातार वर्षा से कपास की फसल पर असर पड़ा है। हरदा जिले के रंजीत सिंह राजपूत का कहना है कि जब से कपास की यह नई किस्म आई है तब से हमने बोना बंद कर सोयाबीन के पैदावार की ओर ध्यान केंद्रित कर दिया है। बड़वानी जिले में पदस्थ बीज प्रमाणीकरण अधिकारी का कहना है कि निमाड़ अंचल में कपास के कारण सर्वाधिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।
धार में पीएम मित्र पार्क से बदलेगी तस्वीर
प्रदेश में कपास उत्पादन और खासतौर से मालवा-निमाड़ में इसके अधिक उत्पादन को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धार जिले की भैंसोला के करीब 2177 एकड़ भूमि पर पीएम मित्र टेक्सटाइल पार्क योजना विकसित करने की योजना बनाई है। इस पार्क में कपास से धागा और धागे से वस्त्र निर्माण और कपड़ों की बिक्री, निर्यात का कार्य एक स्थान पर ही होगा। इस योजना की अनुमानित लागत 1670 करोड़ रुपये है। इस योजना के बाद निमाड़ मालवा पुनः कपड़ा और वस्त्र उत्पादन के विश्व मानचित्र पर अपनी खोई हुई पहचान कायम करेगा।
इंदौर की कपड़ा मिलें थीं पहचान
इंदौर में कपड़ा मिलों की वास्तविक शुरुआत 1864 से हो चुकी थी। इसके बाद 1883 में स्टेट कपड़ा मिल की स्थापना की गई थी। यह नगर के कपड़ा उद्योग में निजी क्षेत्र के रूप में 1909 में पहली मिल थी। धीरे-धीरे कपड़ा उद्योग ने प्रगति की और नगर में 6 कपड़ा मिलें कार्य करने लगीं। इन मिलों में निर्मित होने वाले कपड़े की देशभर में पहचान थी, परंतु आधुनिकीकरण के अभाव और अन्य कार्यों से इंदौर की शान रहीं ये कपड़ा मिलें धीरे-धीरे बंद हो गईं। अब इंदौर रेडीमेड यानी तैयार वस्त्र उद्योग व कारोबार में देश में अपनी खास पहचान रखता है।





