सेन्सर बोर्ड के अड़ियल रवैये के कारण भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं हो पा रही फिल्म “संतोष” ओटीटी पर भी प्रदर्शित नहीं हो सकी है।
ब्रिटिश फिल्मकार संध्या सूरी की यह हिन्दी फिल्म लॉयन्सगेट प्ले पर 17 अक्टूबर को प्रदर्शित होनी थी लेकिन प्रदर्शन नहीं हो सका है। सूरी ने यह जानकारी अमेरिकी ट्रेड पत्रिका डेडलाइन को दी है।
फिल्म का प्रीमियर पिछले साल प्रतिष्ठित काँस फिल्मोत्सव में हुआ था और फिर अकादमी पुरस्कारों के लिए फिल्म को यूनाइटेड किंगडम की तरफ से श्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म की श्रेणी में भी भेजा गया। फिल्म दुनिया भर में फिल्मोत्सवों में दिखाई और सराही गई है लेकिन भारत, जहां कि फिल्म का कथानक सेट है, यहाँ प्रदर्शित नहीं हो पा रही। वजह? सेन्सर बोर्ड।
फिल्म मार्च में भारत में रिलीज होनी थी लेकिन केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (जिसे सेन्सर बोर्ड कहा जाता है और सही ही कहा जाता है) ने इतने कट सुझाए कि सूरी ने मना कर दिया।
उत्तर भारत के किसी अनाम शहर में सेट फिल्म में शाहाना गोस्वामी प्रमुख भूमिका में हैं और उनका किरदार एक पुलिस कांस्टेबल का है जो एक दलित लड़की के बलात्कार और हत्या की घटना की जांच टीम का हिस्सा है। घटना के लिए एक मुस्लिम युवक को हिरासत में लिया जाता है लेकिन संतोष की अपनी जांच किसी और तरफ इशारा करती है।
जाहिर है सेन्सर बोर्ड को परेशान होना ही था। फिल्म अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह, हिरासत में संदिग्ध आरोपियों को यातनाएं देने की पुलिस की असीमित शक्तियों, भ्रष्टाचार, जांच में लीपापोती, स्त्री द्वेष आदि पर रोशनी डालती है।
सूरी के अनुसार फिल्म महिलाओं के खिलाफ हिंसा को केंद्र में रखकर बनाई गई है और ऐसी जगहों के बारे में बात करती है जहां हिंसा सामान्य बात मानी जाती है।
यूं तो अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों, दलितों पर अत्याचार की घटनाएं रोज़ मीडिया में आती रहती हैं लेकिन फिल्मों में यह दर्शाने पर सेंसर बोर्ड बिदक जाता है और रोड़े अटकाने लगता है। “धड़क 2” और इसी साल अकादमी पुरस्कारों के लिए भेजी गई “होमबाउन्ड” को भी रिलीज पूर्व काफी कट का सामना करना पड़ा है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जीवनी पर बनी “पंजाब 95” वर्षों से सेन्सर में अटकी पड़ी है। दूसरी तरफ “कश्मीर फाइल्स”, “केरल स्टोरी” से लेकर तमाम प्रॉपगंडा फिल्मों को, जो सांप्रदायिकता, हिंसा को बढ़ावा देती हैं, को पुरस्कृत किया जा रहा है।
“संतोष” का ओटीटी पर भी प्रदर्शित न हो पाना यह दर्शाता है कि भारत में रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए कोई स्पेस नहीं बचा। सिनेमाघरों के विपरीत ओटीटी पर सीबीएफसी प्रमाणपत्र की बाध्यता न होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में “जन भावनाएं आहत करने के आरोप में” ओटीटी प्लेटफॉर्म पर मुकदमेबाज़ी (सेक्रेड गेम्स, तांडव) समेत दक्षिणपंथी एको सिस्टम का दबाव बढ़ रहा है। निर्माताओं का नेटफिलिक्स पर “अन्नपूर्णी” की स्ट्रीमिंग शुरू करने के बाद उसे हटा देना, दिबाकर बनर्जी की “तीस” रिलीज न करना कई उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि फिल्म निर्माता ही नहीं, ओटीटी प्लेटफॉर्म भी दबाव में हैं।
(स्क्रोल से साभार)





