-सुसंस्कृति परिहार
इस बार चूंकि बिहार में छठ पर्व के अवसर के ठीक बाद विधानसभा चुनाव होना था इसलिए उम्मीद थी कि देश भर बिखरे कर्मनिष्ठ बिहारियों के लिए सरकार उनकी यात्रा को सुगम और आसान बना देगी क्योंकि घोषणा की गई थी कि 12,000 रेल गाड़ियां अतिरिक्त चलेंगी। लेकिन यह क्या हुआ पहली बार चुनावी वादा ,चुनाव के दौरान ही जुमला बन गया। बिहारी हमेशा की तरह फिर ठगे गए। रोजगार की जगह उन्हें रील्स बना कर कमाई करने की राह दिखाई गई। हालांकि चुनाव पूर्व महिलाओं को 10,000₹ पकड़ाकर उनकी वोट आसान की गई।जो निश्चित ही छठ पर्व के जश्न की भेंट चढ़ गई होगी। महिला रोजगार के नाम पर यह राशि दी गई थी। पलटूराम के नाम से विख्यात नीतेश कुमार ने भाजपा के साथ रहकर अपनी लुटिया डुबा दी।ताज़ा हालात यह है कि उनका नाम मुख्यमंत्री पद पर उल्लेखित नहीं किया गया है। भाजपा ने बिहार की अवाम को गहरा झटका दे दिया है।चाचा नहीं तो भतीजा ही सही की गाड़ी रफ्तार पकड़ रही है। बिहार में जो गड़बड़ियां उसकी जिम्मेवारी सुशासन बाबू पर डाल भाजपा अपनी स्थिति सुदृढ़ मान रही है।
लेकिन मेहनतकश बिहारियों ने इसे बखूबी समझा है और इसलिए उसने यात्रा गत तमाम असुविधाओं और अपने बंधुओं की शहादत को नज़रंदाज़ करते हुए छठ पर्व के हर्ष को कम नहीं होने दिया। यह इसलिए भी क्योंकि यह साल में दो बार मनाए जाने वाला ऐसा त्यौहार है जो दूर दूर काम में लगे लोगों के मिलन का अवसर होता है।जिसकी तैयारी वे खुशी खुशी करते हैं।
इस सुअवसर का लाभ उठाकर चुनाव आयोग ने सरकार के आदेश से चुनाव घोषित किया है।छठी मैया के गीतों को ज़्यादा बजाने का आग्रह किया है।बात तो तब बनेगी जब ये पता चलेगा कि दूर दराज से आए इन तमाम लोगों को मतदान करने का अवसर मिलेगा।यदि चार लाख से अधिक हटाए मतदाताओं में ये शामिल होंगे तो फिर कहना फ़िज़ूल है।उनका पर्व में आने का उत्साह वा उमंग जाती रहेगी।एक पंथ दो काज की भावना से आए ये लोग अपने मुताबिक लोग नहीं चुन पाएंगे जो इनका संवैधानिक अधिकार है।
पिछली साल छठ पूजा को देश विदेश में भोजपुरी गीतों के माध्यम से ,इस अनूठे एवं महत्वपूर्ण पर्व पर मशहूर लोकगीत गायिका शारदा सिन्हा के असामयिक निधन से लोग दुखी रहे लेकिन उनकी सदाएं और खूबसूरत लरजती व्याकुल आवाज़ ने बराबर ख़ामोशी तोड़ने की कोशिश की थी इस बार भी उनके गाए गीत गुंजायमान हो रहे हैं जो चुनावी शोर को फीका कर रहे हैं।
जैसा कि हम सब जानते हैं बिहार उत्तर प्रदेश, झारखंड ,उत्तरी बंगाल , नेपाल के तराई क्षेत्र में मूलतः यह छठ पर्व मनाया जाता था लेकिन जब नौकरियों की वजह और काम-धंधे की तलाश में यहां के लोग बाहर के राज्यों में पहुंचे तो यह लगभग पूरे देश का पर्व बन गया।अब तो विदेशों में भी छठी मैया की आराधना परम्परानुसार होती है। ठीक उसी तरह वैसे ही जैसे बंगाल की दुर्गा पूजा या महाराष्ट्र का गणेशोत्सव अब देश के नहीं विश्व पर्वों में शामिल हैं।
यह पर्व अनूठे अनूठे स्वरुप में होने की वजह से प्रकृति के ज़्यादा क़रीब है। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला अलौकिक पर्व है। जिसमें पूजन कराने पंडित जी की ज़रूरत नहीं होती। पारंपरिक तौर पर चली आ रही पद्धतियों का अनुकरण होता है। इसमें ऊंच नीच या जाति-पाति का कोई बंधन नहीं इसे सब करते हैं आजकल मुस्लिम, बंगाली, पंजाबी महिलाएं भी इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाने लगीं हैं। इसकी दूसरी खासियत ये है कि इसमें किसी भगवान की मूर्ति की पूजा नहीं होती। छठ पूजा तो सूर्य, उषा, प्रकृति,जल, वायु , भूमि और काल्पनिक बहन छठी मइया को समर्पित है। कल्पित छठी मैय्या को छोड़ दें तो प्रकृति के आधारभूत पंच तत्व इसमें शामिल हैं। हो सकता है सूर्य की प्रभाती रश्मियां सूर्य की बहिन मान ली गईं हों जिनके ज़रिए धरा पर जीवन है और इसके साथ ही साथ उपभोग की तमाम सामग्रियां है जो इसी प्रकृति ने दी हुई हैं। इसी प्रकृति के पंच तत्त्वों से निर्मित तमाम जीवन है। यही प्रकृति उसे सुरक्षित रखती है। इसलिए इस अवसर पर स्वस्थ जीवन ,दीर्घायु जीवन की कामना की जाती है। वे तमाम फल और जो प्रकृति पैदा करती है वह प्रसाद में शामिल कर कायनात का धन्यवाद किया जाता है।
सबसे उम्दा बात इस पूजा की यह है कि इसमें पहले डूबते सूर्य की पूजा का विधान है वह अति श्रेष्ठ है और इंसानी फितरत के लिए एक सबक भी है। क्योंकि समाज में आज उसी व्यक्ति का सम्मान होता है जो उग रहा है यानि आगे बढ़ रहा है ऊंचाई पर है दूसरे शब्दों में कहें जो धन सम्पदा से सम्पन्न हैं। लेकिन जो सब कुछ करके अब डूब रहा है कृषकाय है,जर्जर है आर्थिक रूप से कमज़ोर है उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता । सूर्योपासना बहुतेरे लोग करते हैं उगते सूर्य को जल चढ़ाते हैं,सूर्य नमस्कार जैसे कठिन भी योग करते हैं लेकिन डूबते सूरज को कभी भी अर्घ नहीं चढ़ाते। यह पर्व हमारे उपभोक्तावादी समाज को महत्त्वपूर्ण संदेश देता है।
इसके इतिहास के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है सतयुग में भगवान राम,द्वापर में कर्ण और पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने सूर्य की उपासना की। किंतु ये प्रमाणिक नहीं है लेकिन लोक कथाओं में मौजूद हैं और लोगों को छठ व्रत करने प्रेरित करती हैं।
छठ पूजा चूंकि पूरी तरह प्रकृति पूजा से सम्बद्ध है इसमें पुजारी की ज़रूरत नहीं इसलिए कतिपय लोग इसे आदिवासी समाज से भी जोड़कर देखते हैं।जबकि कुछ लोग इसे बुद्धिस्ट दर्शन से जन्मा मानते हैं। कहते हैं कि बुद्ध के सम्यक सम्बोधी के 5 वर्ष बीतने पर पहली बार जब वह अपने गृह राज्य कपिलवस्तु पधारे तब पूरे कपिलवस्तु में दीपदान उत्सव मनाया गया था ।कपिलवस्तु में आने के बाद सभी सगे संबंधियों और नगर वासियो से मिलने जुलने के बाद छठे दिन सम्बोधि बुद्ध ने देशना दी और प्रकृति के महत्व को बताया और कहा कि इस संसार के अगर कोई सर्व शक्तिमान और जीवन देने वाला है तो वो प्रकृति ही है।
बुद्ध ने ही बताया कि धरती के इस जीवन का केंद्र भी सूर्य ही है जो जीवन दायनी है हम सबको सदा ही प्रकृति के समभाव में जीना चाहिए।प्रकृति कभी भेद भाव नहीं करती और तब से ही दीपदान उत्सव के छठवें दिन को सूर्य उपासना की जाने लगी। यह छठ पर्व कहा जाने लगा। यह सच भी लगता है क्योंकि बिहार बुद्ध की विहार स्थली है और बुद्ध धर्म की श्रेष्ठता जगजाहिर है। बिहार का नामकरण भी बुद्ध के विहार से हुआ। संविधान निर्माता प्रमुख डा०भीम राव अम्बेडकर का वह कथन याद आ रहा है जब उन्होंने हिंदु धर्म में पैदा होने पर दुखी मन से कहा था कि जन्म लेना मेरे बस में नहीं था लेकिन मैं इस धर्म में मरूंगा नहीं। उन्होंने दुनिया के तमाम धर्मों का अध्ययन करने के बाद प्रकृति पूजक बौद्ध धर्म को अपनाया ।अशोक जैसे महान सम्राट ने भी इसे अपनाया और दुनिया के देशों तक इसे पहुंचाया।आज बौद्ध धर्म दुनिया का तीसरा बड़ा धर्म है।
यक़ीनन छठ पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। सामाजिक समरसता और सद्भावना की जोत तो जलाता ही है और कर्मकांडियों से भी बचाता है। आज जब पूरी दुनियां जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से गुजर रही है तब प्रकृति प्रेम का यह पर्व पंच तत्वों के प्रति शुकराना का पर्व है। प्रकृति के प्रति निश्छल संवेदनाओं के विस्तार में इसकी महत्ता का प्रचार प्रसार ज़रुरी है।मूल भावना को जानकर यदि हम सब पर्व मनाएं तो प्राकृतिक ख़तरे टाले जा सकते हैं।
इन प्राकृतिक उपादानों की सुरक्षा तथा सामाजिक समरसता की बात इस समय खासतौर पर ध्यान रखने की है क्योंकि बिहार में चुनाव है और उसे इस पर्व के इन पहलुओं को ध्यान में रखकर ही मत का दान करना है क्योंकि इन सबके आधार पर ही बिहार की पहचान अमिट बनेगी और वे अपने देस में सुकुन भरी ज़िन्दगी गुजर बसर कर पाएंगे।उनका भटकाव ख़त्म होगा।





