(एक विस्तृत, भावनात्मक और मार्मिक लेख)
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
मनुष्य एक विचित्र प्राणी है—अन्य सभी प्राणियों से अलग, असाधारण, असंतुलित, असामान्य, और प्रायः ‘पागल’। पर शायद इसी पागलपन में उसका सौन्दर्य छिपा है। यही पागलपन उसे सभ्यता बनाता है, युद्ध भी; प्रेम करता है, घृणा भी; मंदिर बनवाया है, और जेल भी। जिस दिन आदमी का यह पागलपन समाप्त हो जाएगा, शायद मनुष्य नाम का जीव ही समाप्त हो जाएगा।
मनुष्य की यात्रा आरम्भ से ही असंतुलित रही है। गुफाओं में रहने वाला वह प्रागैतिहासिक आदमी, जिसने पहली बार आग को छूते समय शायद डर और उत्साह की एक साथ अनुभूति की होगी, उसी क्षण ‘पागल’ ठहरा। कौन-सा जीव है जो जिज्ञासा के नाम पर अपने हाथ जला ले? पर वही पागलपन मनुष्य को आगे बढ़ाता गया।
यह लेख उसी पागल और सच्चे आदमी की कहानी है—पुरातन से वर्तमान तक, उसकी अच्छाइयों, बुराइयों, धार्मिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों, सामाजिक उथल-पुथल, और समस्त जीवनीय रंगों का एक विस्तृत आख्यान।
1. पुरातन मनुष्य का पागलपन — सभ्यता का जन्म:
प्राचीन मनुष्य के पास साधन नहीं थे, सुरक्षा नहीं थी, पर जिज्ञासा थी। यही जिज्ञासा उसका पहला पागलपन थी। वह आसमान में चमकते तारों को देखता और सोचता—ये क्या हैं? वह हवा में झूमते पेड़ों को देखता और पूछता—ये क्यों झूमते हैं? वह नदी को देखता और कल्पना करता—क्यों बहती है? यही प्रश्नों का बवंडर उसे विचारशील बनाता गया। उसने पत्थर उठाया, चमकता देखा, घिसा, काटने के काम में लिया—यह पागलपन का एक रूप था। उसने आग को अपना दास बना लिया—यह दुस्साहस का रूप था। उसने पहिये को खोज निकाला—यह विद्रोही पागलपन था। लेकिन इस पागलपन में मनुष्य की सबसे बड़ी जीत यह थी कि उसने दुनिया को जानने का प्रयास किया, स्थिर नहीं रहा। यद्यपि इसी पागलपन ने उसे हिंसक भी बनाया। शिकार का जुनून, शक्ति का प्रदर्शन, कबीलों का द्वन्द्व—यह सब उसी ‘आदिम पागलपन’ के विस्तार थे। पर चमत्कार यह कि उसी मनुष्य ने चित्र भी बनाए—गुफाओं की दीवारों पर, लाल और काले रंगों से, जिससे उसकी संवेदनशीलता प्रकट होती है। यह बताता है कि मनुष्य के भीतर युद्ध और कला, दोनों की जड़ एक ही है—वह बेचैन मन जो कभी तृप्त नहीं होता।
2. किसान और नगरों का मनुष्य — श्रम और अधिकार का पागलपन:
जब मनुष्य ने खेती सीखी, वह जमीन से बंधा। यही बंधन उसे सामाजिक बनाता गया।
भीड़ में रहना, श्रम बाँटना, जिम्मेदारियाँ लेना—यह सब एक सामूहिक ‘पागलपन’ था। कौन-सा जीव है जो खुद पर नियम लागू करता है? पर मनुष्य ने नियम बनाए, व्यवस्था गढ़ी, और फिर नियमों को तोड़ भी दिया—यही उसका वास्तविक स्वरूप है। कृषि करने वाला मनुष्य मौसम के मूड पर आश्रित होता था। इस अनिश्चितता ने उसे आस्था और अंधविश्वास की ओर धकेला। वर्षा न सुने तो देवता क्रोधित, फसल बर्बाद हो तो देवता प्रसन्न नहीं। यह धार्मिक पागलपन था—जिसे रोकना कठिन था, और जिसने मनुष्य के भीतर से विवेक का हिस्सा छीन भी लिया और उसे संभाला भी। नगरों का निर्माण भी इसी पागलपन की उपज थे।क्योंकि एक जगह टिककर रहने के लिए मनुष्य को साहस चाहिए था—प्रकृति से लड़ने का साहस, अजनबियों पर भरोसा करने की शक्ति, और समाज बनाने का जोखिम। नगरों में जन्मा मनुष्य अधिक जटिल था—वह व्यापारी था, कारीगर था, शासक था, सैनिक था। उसके भीतर लालसा और भय दोनों बढ़ते गए। धन का मोह, सत्ता का आकर्षण, श्रेष्ठ होने का अहंकार—ये सभी मानसिक पागलपन थे, जो मनुष्य को निरन्तर खींचते रहे।
3. धार्मिक मनुष्य — श्रद्धा और उन्माद का पागलपन:
धर्म मनुष्य का सबसे गहरा पागलपन है।यही उसे असीम शक्ति देता है, वही उसे बाँधता भी है।मनुष्य जब अपने दुःख, भय और मृत्यु से टकराता है, तो उसे किसी अदृश्य शक्ति की जरूरत पड़ती है—जो उसे साहस दे, सांत्वना दे, दिशा दिखाए। इस प्रकार धर्म जन्मा। परन्तु धर्म जैसे-जैसे संगठित हुआ, वह भावनाओं का दमन भी करने लगा। जो सबसे शक्तिशाली था, उसने धर्म को सत्ता का औजार बना लिया।जो सबसे भावुक था, उसने धर्म को आस्था का मंदिर बनाया। धर्म ने मनुष्य को नैतिकता दी—यह सत्य है। पर धर्म ने मनुष्य को उन्मादी भी बनाया—यह भी सत्य है। युगों तक धार्मिक युद्ध, ईर्ष्या, जाति-प्रथा, मंदिर-मस्जिद के संघर्ष—ये मनुष्य के धार्मिक पागलपन के ही विस्तार हैं। लेकिन यही धर्म मनुष्य को करुणा भी सिखाता है—तपस्वियों, संतों, रहस्यवादियों का संसार इसी पागलपन का उजला रूप है। जिस भक्ति ने सूर को विजयी बनाया, कबीर को विद्रोही बनाया, मीरा को अमर बनाया—वह भी इसी असाधारण पागलपन का प्रकाश था।
4. राजनीतिक मनुष्य — सत्ता और क्रांति का पागलपन:
राजनीति को समझना मनुष्य को समझने जैसा है—दोनों ही विरोधाभासों से बने हैं।
पहली सभ्यताओं में राजतंत्र बना। एक मनुष्य को हजारों मनुष्यों पर शासन का अधिकार मिला। यह ‘मनोवैज्ञानिक पागलपन’ था—जिसने राजाओं को देवता बना दिया। फिर मानव अधिकारों के लिए लड़ाइयाँ शुरू हुईं—यह ‘क्रांतिकारी पागलपन’ था। फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, स्वतंत्रता संग्राम—हर जगह एक पागल भीड़ थी, जो अन्याय सहना नहीं चाहती थी।
सत्ता का नशा और स्वतंत्रता का नशा—दोनों पागलपन हैं। नेता जनसेवक बनता है, फिर प्रभु बन बैठता है। भीड़ नायक बनाती है, फिर उसे गिरा भी देती है। इतिहास बताता है कि राजनीतिक पागलपन जितना विनाशक होता है, उतना ही परिवर्तनकारी भी। आधुनिक राजनीति भी कुछ अलग नहीं। मनुष्य आज भी उसी सत्ता-लोलुप प्रवृत्ति से ग्रस्त है। वोट, बहुमत, प्रचार, झूठ, नफरत—ये सब उसी मानसिक असंतुलन के आधुनिक रूप हैं। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति भी इसी पागलपन में है—मनुष्य अन्याय को हमेशा के लिए स्वीकार नहीं करता।
5. सामाजिक मनुष्य — प्रेम, घृणा और रिश्तों का पागलपन:
सामाजिक जीवन का निर्माण भावनाओं के उतार-चढ़ाव से हुआ है। समाज मनुष्य को सुरक्षा देता है, पर स्वतंत्रता भी छीनता है। रिश्तों का जाल—माता, पिता, परिवार, समुदाय—यह सब मनुष्य की सामाजिकता के कारण ही संभव है। पर रिश्तों में प्रेम जितना गहरा है, द्वेष भी उतना ही प्रबल। मनुष्य प्रेम में पागल होता है—कभी अत्यधिक समर्पण में, कभी अत्यधिक अधिकार में। घृणा में भी पागल होता है—कभी बदले में, कभी अहंकार में। समाज मनुष्य को सभ्य बनाता है, पर कभी-कभी इतना बाँध देता है कि वह अपने मूल स्वभाव को ही खो देता है।
कभी वह स्वार्थी हो जाता है, कभी दयालु। कभी वह नफरत से भर जाता है, कभी बलिदान दे देता है। इसलिए कहा जाता है—मनुष्य एक रहस्य है; उसके भीतर भूख, झूठ, हिंसा, करुणा, दया सब एक साथ रहते हैं।
6. आधुनिक मनुष्य — तकनीकी पागलपन और अकेलापन:
आज का मनुष्य पहले से कहीं अधिक ‘पागल’ है—पर यह पागलपन अदृश्य है। वह मशीनों में जीता है, स्क्रीन में जीता है, आभासी दुनिया में जीता है। वह हर दिन हजारों सूचनाओं से भरा होता है—जो उसे विचारशील नहीं, बल्कि बेचैन बनाती हैं। तकनीक ने गति दी है, पर शांति छीन ली है। लोग ऑनलाइन जुड़े हैं, पर वास्तविकता में अकेले हैं।हर कोई खुद को साबित करने की दौड़ में है—यह एक सामूहिक मानसिक असंतुलन है। आधुनिक मनुष्य को सबसे बड़ा भय यह है कि वह छूट न जाए—समाज से, दोस्तों से, ट्रेंड से, उपलब्धियों से। यह भय उसे और पागल बनाता है। पर इस युग में भी मनुष्य के भीतर दया बची है—वह राहत भेजता है, आंदोलन करता है, किसी घटना पर टूट जाता है, किसी पीड़ा से आहत हो जाता है।
यही उसका ‘सच्चा आदमी’ होना है।
7. आदमी की अच्छाइयाँ — पागलपन की उजली छाया:
यदि मनुष्य पागल न होता तो— वह प्रेम न करता, कला न रचता, गीत न गाता, आंसू न बहाता, बलिदान न देता, सत्य की खोज में जोखिम न उठाता। उसे दूसरों के दुःख का दर्द न होता, गरीब की झोपड़ी में रात न काटता, किसी अजनबी के लिए दिल न पिघलता। मनुष्य का यह उजला पागलपन ही उसे सबसे सुंदर बनाता है। यही उसे देवदूत भी बनाता है—और मनुष्य भी।
8. आदमी की बुराइयां — पागलपन की काली छाया:
मनुष्य की बुराइयां भी उसी पागलपन से जन्मती हैं—हिंसा उसका पुराना साथी है,
लोभ उसका आधुनिक ईश्वर, ईर्ष्या उसका गुप्त जहर, अहंकार उसकी जड़ी पकड़। वह किसी विचार के लिए मार देता है, किसी भूख के लिए लूट लेता है, किसी भय के कारण झूठ बोल देता है। धर्म के नाम पर लड़ता है, राजनीति के नाम पर धोखा देता है, जाति-समुदाय के नाम पर विभाजित हो जाता है। मनुष्य की बुराई उसकी जटिलता का परिणाम है—वह जितना गहरा सोचता है, उतना ही गहरा गिर भी सकता है।
9. “पागल ही सच्चा आदमी” — इस कथन का मर्म:
· जब हम कहते हैं कि “पागल ही सच्चा आदमी”— तो हमारा आशय उस मनुष्य से है:
· जो भीड़ से अलग सोचता है,
· जो परंपरा से सवाल करता है,
· जो न्याय के लिए खड़ा होता है,
· जो प्रेम के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है।
सच्चा आदमी वह है जो सत्ता के सामने झुकता नहीं और कमजोर के सामने सिर झुका देता है। सच्चा आदमी वह है
· जो आँसू देख कर टूट जाता है,
· जो सौंदर्य देखकर भीग जाता है,
· जो दर्द देखकर काँप जाता है।
वह पागल है, क्योंकि सामान्य आदमी इस तरह नहीं जी पाता—सामान्य लोग सुरक्षित रहते हैं; सच्चे लोग जोखिम उठाते हैं। सच्चा आदमी अपने भीतर की आग से चलता है—और आग हमेशा पागल होती है।
10. निष्कर्ष — मनुष्य का यह पागलपन ही उसका भविष्य है:
मनुष्य की पूरी सभ्यता—उसका इतिहास, उसका संघर्ष, उसका प्रेम, उसका विकास—
सब इसी पागलपन की देन हैं। यदि मनुष्य तर्कसंगत ही रहता, तो न कविता जन्मती, न क्रांति, न संगीत, न प्रेम, न तकनीक, न विज्ञान। अतः यह सत्य है—आदमी पागल है, और पागल ही सच्चा आदमी है। अगर मनुष्य के भीतर यह बेचैनी, यह जिज्ञासा, यह विद्रोह समाप्त हो गया,
तो दुनिया अंधकार में पड़ जाएगी। पागलपन मनुष्य का रोग नहीं—उसकी शक्ति है। उसका भय नहीं—उसकी उड़ान है। और जब तक मनुष्य इस पागलपन को सीने से लगाए रखेगा, तब तक वह मनुष्य बना रहेगा— जटिल, अस्थिर, संवेदनशील, करुणामय, और अद्भुत।





