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पुर्जे न बनाए जर्मन कंपनी बॉश, तो बेकार हैं iPhone, अंधी मशीनें बनकर रह जाएंगे Tesla की कारें!

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आईफोन और टेस्ला जैसी बड़ी कंपनियों के पीछे एक ऐसी ताकत छिपी है जिसके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है. यह कहानी है जर्मन कंपनी बॉश (Bosch) की, जो न तो खुद के फोन बनाती है और न ही कारें, फिर भी इनके बिना ये दोनों दिग्गज अधूरे हैं. रोबर्ट बॉश ने कैसे एक छोटे कमरे से शुरुआत कर दुनिया के सबसे बड़े सेंसर और आटोमोटिव सप्लायर के तौर पर अपनी पहचान बनाई, यह जानकर आपको हैरानी जरूर होगी.

आज लोग हाथ में चमचमाता हुआ आईफोन (iPhone) थामकर शान से चलते हैं. सड़क पर टेस्ला (Tesla) कार को लोग मुड़-मुड़कर देख रहे हैं. ये दोनों ही आज की दुनिया में टेक्नोलॉजी में सबसे बड़े नाम हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर एक कंपनी अपना काम रोक दे, जिसके बारे में आम लोग ज्यादा बात नहीं करते, तो न तो आपका iPhone चल पाएगा और न ही Tesla कार एक कदम आगे बढ़ पाएगी. दुनिया इसे एक जर्मन कंपनी के तौर पर जानती है, जो शायद आपके घर की वाशिंग मशीन या मिक्सर बनाती है, लेकिन हकीकत में ये दुनिया की वह अदृश्य ताकत है जिसके बिना आज की माडर्न लाइफ ठहर जाएगी. कंपनी का नाम है बॉश (Bosch). बॉश न तो अपना खुद का फोन बनाती है और न ही अपनी कारें बेचती है, लेकिन दुनिया की हर दूसरी बड़ी चीज के अंदर इसका बनाया “दिल” धड़कता है. यह कंपनी के पीछे एक ऐसे इंसान है, जिसने गरीबी और मुश्किलों के बीच एक छोटे से कमरे से काम शुरू किया और एक ऐसा साम्राज्य खड़ा कर दिया जो आज पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है. हालांकि इस कंपनी को खड़ा करने वाला शख्स हमारे बीच में नहीं हैं.

बात 1886 की है. जर्मनी के स्टटगार्ट शहर की एक छोटी-सी गली में रोबर्ट बॉश (Robert Bosch) नाम के एक नौजवान ने अपनी वर्कशाप खोली. उस समय रोबर्ट के पास न तो बहुत पैसा था और न ही बड़ी टीम. बस एक सपना था कि ऐसी चीजें बनाई जाएं जो लोगों की जिंदगी आसान कर सकें. रोबर्ट बॉश का बचपन बहुत ही साधारण था. उनके पिता एक किसान थे और चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर कुछ बड़ा करे. रोबर्ट ने इंजीनियरिंग सीखी और अमेरिका जाकर थॉमस एडिसन (Thomas Edison) जैसी महान हस्तियों के साथ काम भी किया. थॉमस एडिसन एक महान आविष्कारक और व्यवसायी थे. उन्होंने 1000 से अधिक पेटेंट करवाए, जिनमें लाइट बल्ब, फोनोग्राफ और मोशन पिक्चर कैमरा शामिल हैं.

जब बॉश वापस जर्मनी लौटे, तो उन्होंने अपनी छोटी-सी दुकान शुरू की, जिसे उन्होंने नाम दिया “प्रेसिजन मैकेनिक्स एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग वर्कशाप”. शुरुआत के साल बहुत ही संघर्ष भरे थे. कई बार ऐसा होता था कि हफ्तों तक कोई ग्राहक नहीं आता था. रोबर्ट खुद साइकिल पर बैठकर सामान लेने जाते थे और देर रात तक छोटी-छोटी मशीनों को ठीक करते रहते थे. उन्हें पैसों की इतनी तंगी थी कि कई बार उन्हें लगता था कि शायद यह काम बंद करना पड़ेगा.

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. उस समय की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि जो शुरुआती इंजन बन रहे थे, उन्हें चालू करना बहुत मुश्किल था. उनमें आग जलाने के लिए जो सिस्टम इस्तेमाल होता था, वह बार-बार खराब हो जाता था. रोबर्ट बॉश ने इस पर दिन-रात मेहनत की और एक ऐसी चीज बनाई जिसे “मैग्नेटो इग्निशन” कहा जाता है. यह एक छोटा-सा यंत्र था जो इंजन में बिजली की चिंगारी पैदा करता था, जिससे इंजन तुरंत चालू हो जाता था. 1897 में जब उन्होंने इसे पहली बार एक गाड़ी में फिट किया, तो वह पल इतिहास बदल देने वाला था. यही वह मोमेंट था जब बॉश का नाम पूरी दुनिया में फैलने लगा. देखते ही देखते दुनिया की हर कार कंपनी रोबर्ट बॉश के पास आने लगी. रोबर्ट का एक उसूल था, वह कहते थे कि “मैं पैसे खोना पसंद करूंगा, लेकिन अपने ग्राहकों का भरोसा नहीं.” इसी भरोसे ने बॉश को एक छोटी सी वर्कशाप से निकालकर दुनिया की सबसे बड़ी सप्लाई चेन कंपनी बना दिया.

iPhone में क्या काम करते हैं बॉश के पुर्जे

एमईएमएस (MEMS) सेंसर.
एमईएमएस (MEMS) सेंसर.

आज के दौर में जब हम आईफोन की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि यह सिर्फ ऐपल की देन है. लेकिन आईफोन के अंदर लगे छोटे-छोटे सेंसर, जो उसे यह बताते हैं कि फोन सीधा है या टेढ़ा, या फिर जब आप फोटो खींचते हैं तो हाथ हिलने पर भी फोटो साफ आती है, इन सब के पीछे बॉश की तकनीक है. इन छोटे सेंसर्स को एमईएमएस (MEMS) कहा जाता है. बॉश हर साल अरबों की संख्या में ये सेंसर बनाता है. दुनिया के हर चार में से तीन स्मार्टफोन में बॉश का ही सेंसर लगा होता है. अगर बॉश ये सेंसर बनाना बंद कर दे, तो आपके फोन का कैमरा काम नहीं करेगा, आपके फोन की स्क्रीन खुद-ब-खुद नहीं घूमेगी और मैप्स के जरिए रास्ता ढूंढना नामुमकिन हो जाएगा. ऐपल जैसी कंपनी भी पूरी तरह से इन छोटे पुर्जों के लिए बॉश पर निर्भर है.

टेस्ला के लिए क्या बनाता है बॉश?

iBooster

अब बात करते हैं टेस्ला की. एलन मस्क की टेस्ला कारें अपनी रफ्तार और तकनीक के लिए जानी जाती हैं. लेकिन इन कारों को सुरक्षित रोकने और मोड़ने का जिम्मा बॉश के पास है. टेस्ला की कारों में एक खास सिस्टम लगा होता है जिसे आईबूस्टर (iBooster) कहा जाता है. यह एक ऐसा जादुई ब्रेक है जो बिजली से चलता है. जब टेस्ला की कार सड़क पर दौड़ती है, तो यह सिस्टम न सिर्फ कार को तेजी से रोकता है, बल्कि ब्रेक लगाने पर जो ऊर्जा पैदा होती है, उसे वापस बैटरी में भेज देता है जिससे कार की रेंज बढ़ जाती है. इतना ही नहीं, टेस्ला की कारों में जो आटो-पायलट या ड्राइवर के बिना चलने वाली तकनीक है, उसके पीछे भी बॉश के रेडार और कैमरे लगे होते हैं. बिना इन सेंसर्स के टेस्ला की कार एक अंधी मशीन की तरह होगी, जो सामने वाली बाधा को पहचान भी नहीं पाएगी. एलन मस्क भले ही कारों की डिजाइन और साफ्टवेयर पर ध्यान दें, लेकिन कार के अंदर की वह मशीनरी जो ड्राइवर की जान बचाती है, वह बॉश के इंजीनियरों की मेहनत का नतीजा है.

अरबों का मुनाफा लगता है समाज सेवा में

बॉश का बिजनेस माडल भी दुनिया की दूसरी कंपनियों से बिल्कुल अलग है. आमतौर पर बड़ी कंपनियां शेयर बाजार में लिस्टेड होती हैं और उनका मकसद अपने शेयरधारकों को फायदा पहुंचाना होता है. लेकिन बॉश के साथ ऐसा नहीं है. रोबर्ट बॉश ने अपनी वसीयत में लिखा था कि इस कंपनी का मालिकाना हक किसी एक इंसान के पास नहीं होगा. आज बॉश कंपनी का 94 प्रतिशत हिस्सा “रोबर्ट बॉश स्टिफटंग” नाम के एक चैरिटी ट्रस्ट के पास है. इसका मतलब यह है कि कंपनी साल भर में जो भी करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाती है, उसका बड़ा हिस्सा समाज सेवा, शिक्षा और अस्पतालों पर खर्च किया जाता है. कंपनी का मकसद सिर्फ अमीर बनना नहीं, बल्कि दुनिया को बेहतर बनाना है. यही वजह है कि बॉश कभी भी विज्ञापन पर उतना खर्च नहीं करती, जितना ऐपल या टेस्ला करती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके बिना ये बड़ी कंपनियां चल ही नहीं सकतीं.

कितनी कमाई? कितनी वैल्यूएशन

अगर कमाई और मार्केट वैल्यू की बात करें, तो बॉश बहुत विशालकाय है. साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, बॉश का सालाना रेवेन्यू 90 अरब यूरो (लगभग 8 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा) को पार कर चुका है. इनके पास करीब 4 लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं, जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. बॉश सिर्फ कार के पुर्जे या मोबाइल सेंसर ही नहीं बनाता, बल्कि यह दुनिया का सबसे बड़ा पावर टूल्स और घर के सामान बनाने वाला नाम भी है. इनकी वैल्यूएशन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर आज बॉश अपना काम रोक दे, तो दुनिया की आधी से ज्यादा फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी और सड़कों पर गाड़ियां चलना बंद हो जाएंगी. वे सिर्फ एक वेंडर नहीं हैं, बल्कि वे पूरी इंडस्ट्री के पार्टनर हैं.

आर्थिक मंदी में खोज लिया नया रास्ता

बॉश की सफलता के पीछे एक और रोचक किस्सा है. 1920 के दशक में जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी आई थी, तब बॉश ने हार मानने के बजाय नए क्षेत्रों में हाथ आजमाना शुरू किया. उन्होंने उस समय बिजली से चलने वाले फ्रिज और वाशिंग मशीन बनाना शुरू किया. उनका मानना था कि अगर गाड़ियां बिकना बंद हो गईं, तो घर का सामान तो बिकता रहेगा. यही दूरदर्शिता आज भी कंपनी में दिखती है. आज जब दुनिया पेट्रोल-डीजल से हटकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हाइड्रोजन की तरफ बढ़ रही है, तो बॉश ने पहले ही इसमें अरबों का निवेश कर दिया है. वे ऐसे चिप बना रहे हैं जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी को और ज्यादा दमदार बना देते हैं.

Ramswaroop Mantri

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