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*एस. जयशंकर की कहानी सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि कूटनीतिक काबिलियत की मिसाल*

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राहुल गांधी की कांग्रेस ने जिसे समझा ‘छोटा’, PM मोदी ने उसे ही थमा दी दुनिया की कमान; पढ़ें जयशंकर के जीवन के बड़े राज

 बिना चुनाव लड़े विदेश मंत्री बने एस. जयशंकर की कहानी सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि कूटनीतिक काबिलियत की मिसाल है. जिस नेता को कांग्रेस दौर में नजरअंदाज किया गया, उसी पर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की विदेश नीति की जिम्मेदारी सौंपी. जानिए उनके जीवन और करियर के अहम मोड़.

न कोई चुनाव लड़ा, न किसी राजनीतिक परिवार से सत्ता की विरासत मिली. लेकिन फिर भी भारत की विदेश नीति की कमान उसी शख्स के हाथों में है जिसकी रणनीति और कूटनीतिक समझ की आज दुनिया मिसाल देती है. बात देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की है, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना चुनावी राजनीति में उतारे सीधे वैश्विक मंच पर भारत का चेहरा बना दिया.

एस. जयशंकर की यह यात्रा सिर्फ एक नियुक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस सोच का उदाहरण है जहां योग्यता, अनुभव और वैश्विक समझ को प्राथमिकता दी गई. एक समय जिस कांग्रेस नेतृत्व में उन्हें नजरअंदाज किया गया, उसी व्यक्ति को बाद में मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति का सबसे मजबूत स्तंभ बना दिया.

9 जनवरी 1955 को दिल्ली में जन्मे एस. जयशंकर की पहचान एक करियर डिप्लोमैट के तौर पर रही है. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से राजनीति विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय संबंध और न्यूक्लियर डिप्लोमेसी में एमए, एमफिल और पीएचडी की. यही अकादमिक आधार आगे चलकर उनकी कूटनीतिक ताकत बना.

कैसे शुरू हुआ डिप्लोमेसी का सफर?

1977 में इंडियन फॉरेन सर्विस (IFS) जॉइन करने के साथ ही जयशंकर ने आधिकारिक रूप से भारत की कूटनीति की दुनिया में कदम रखा. उनकी पहली विदेश पोस्टिंग 1979 से 1981 के बीच मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास में हुई, जहां उन्होंने तृतीय और द्वितीय सचिव के रूप में काम किया.

S Jaishankar on Europe
PM मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में भी एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाए रखा.

विदेश मंत्रालय और अहम वैश्विक जिम्मेदारियां

1981 से 1985 तक उन्होंने विदेश मंत्रालय में अमेरिका डेस्क और नीति नियोजन से जुड़े काम संभाले. इसके बाद वाशिंगटन डीसी, श्रीलंका (IPKF के दौरान), बुडापेस्ट, टोक्यो और प्राग जैसे अहम वैश्विक केंद्रों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया. हर पोस्टिंग में उनका फोकस भारत के रणनीतिक हितों को मजबूत करना रहा.

राजदूत से विदेश सचिव बनने की अधूरी कोशिश

2009 से 2013 तक चीन में भारत के राजदूत के रूप में कार्य करने के बाद एस. जयशंकर का कद और ऊंचा हो गया. 2013 में जब यूपीए 2.0 सरकार को नया विदेश सचिव चुनना था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनके पक्ष में थे. लेकिन वरिष्ठता और राजनीतिक दखल के चलते यह फैसला उनके पक्ष में नहीं गया.

कांग्रेस दौर में क्यों रह गए पीछे?

उस समय चर्चा रही कि संगठनात्मक दबाव के चलते सुजाता सिंह को विदेश सचिव बनाया गया. कई रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख हुआ कि गांधी परिवार के करीबी संबंधों के कारण यह फैसला हुआ. नतीजतन एस. जयशंकर को अमेरिका का राजदूत बनाकर भेज दिया गया. जबकि विदेश सचिव की कुर्सी उनसे दूर रह गई.

2014 के बाद कैसे बदली किस्मत?

2014 में सत्ता परिवर्तन के साथ हालात भी बदले. 2015 में मोदी सरकार ने सुजाता सिंह को समय से पहले पद से हटाकर एस. जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त किया. यह वही दौर था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली अमेरिकी यात्रा के दौरान जयशंकर की भूमिका ने उन्हें खासा प्रभावित किया.

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9 जनवरी 1955 को दिल्ली में जन्मे एस. जयशंकर की पहचान एक करियर डिप्लोमैट के तौर पर रही है.

विदेश सचिव से विदेश मंत्री तक का सफर

2018 तक विदेश सचिव रहने के बाद 2019 में एस. जयशंकर को सीधे विदेश मंत्री बनाया गया. दिलचस्प तथ्य यह रहा कि शपथ ग्रहण के समय उनके सामने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बैठे थे… वही नेता जो कभी उन्हें विदेश सचिव बनाना चाहते थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में भी एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाए रखा. यह फैसला पिछले पांच वर्षों में भारत की बदली हुई विदेश नीति, मजबूत वैश्विक छवि और स्पष्ट कूटनीतिक रुख का संकेत माना जाता है. एस. जयशंकर का सफर इस बात का उदाहरण है कि भारतीय राजनीति और प्रशासन में कभी-कभी योग्यता को सही मंच मिलने में समय लगता है, लेकिन जब मिलता है, तो असर पूरी दुनिया देखती है.

Ramswaroop Mantri

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