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*प्रतिष्ठित कहानीकार मनोज रुपड़ा का अपमान!* 

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-सुसंस्कृति परिहार 

हालांकि यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है।एक दक्षिण पंथी सरकार के कुलपति से क्या अपेक्षा की जा सकती है? सात जनवरी 2026 को गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने देश के नामचीन लेखक मनोज रुपड़ा के साथ जो अशोभनीय व्यवहार किया वह बेहद शर्मनाक है. घर पर आमंत्रित किए गए मेहमान के साथ ऐसा कोई करता है क्या? मनोज रूपड़ा जाने माने कहानीकार और उपन्यास कार हैं उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘दफ़न और अन्य कहानियाँ’, ‘साज़-नासाज़’, ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’, ‘आमाज़गाह’, ‘अनुभूति’, ‘दहन’ (कहानी-संग्रह); ‘प्रतिसंसार’, ‘काले अध्याय’ (उपन्यास); ‘कला का आस्वाद’ (वैचारिक निबन्ध)। लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। कथा साहित्य के अलावा आजकल चित्रकारी में  लगे हुए हैं।उन्हें ‘वनमाली कथा सम्मान’, ‘इन्दु शर्मा कथा सम्मान’, ‘पाखी सम्मान’ और ‘कथाक्रम सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है।

विदित हो छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर में साहित्य अकादमी, दिल्ली के साथ संयुक्त रूप से ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’ विषय पर एक आयोजन किया गया था। इसमें देश के कई सुपरिचित कहानीकारों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी थे। बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में चुटकुले सुना रहे थे, और उन्हें अहसास हुआ होगा कि उनकी बातें कुछ लोगों पर भारी पड़ रही हैं। जो स्वाभाविक था।

उन्होंने मंच पर बैठे मनोज रूपड़ा की तरफ देखते हुए पूछा कि वे उनकी बातों से बोर तो नही हो रहे हैं? इस पर मनोज रूपड़ा ने कहा कि आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं। ज़रा सी बात पर आक्रोशित होकर कुलपति ने मंच और माइक से ही उन्हें खूब भला-बुरा कहा, बदतमीज बताया और पूछा कि इन्हें किसने बुलाया है एक कुलपति विश्वविद्यालय के आयोजन में आमंत्रित साहित्यकार को किस तरह दुत्कारते हुए कर वहां से निकाला गया है वह साहित्यकारों के लिए बेहद शर्मसार करने वाला है। कुलपति ने मनोज रूपड़ा को वहां से निकल जाने के लिए कहा, और अपने लोगों को कहा कि ऐसे आदमी को दुबारा न बुलाया जाए। पता चला है कि विश्वविद्यालय के कुलपति बनने के पहले वे गुजरात के राजकोट के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे।

लेकिन यह इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि संघी सरकार में जिस तरह जानबूझकर ऐसे कुलपति बैठाए गए हैं जो संस्कारों की जगह शाखाओं से निकले कुंठित लोग हैं। पिछले दिनों वन्दे मातरम् पर संसद में अमित शाह ने जब ये डंके की चोट पर कहा था कि हम संधियों को महत्वपूर्ण जगहों पर बैठाएंगे। वामपंथियों को कोई जगह नहीं मिलेगी।तभी यह आत्म स्वीकृति सामने आई थी। हालांकि यह सिलसिला सन् 2014के पूर्व ही भाजपा शासित राज्यों में प्रारंभ हो चुका था। लालकिले से भी जब प्रधानमंत्री संघ की प्रशंसा किए तब भी ऐसे मुखर लेखक इन्हें समझ नहीं पाए।

इसलिए इस अपमान भरी बेइज्जती के लिए कहानीकार रूपड़ा और उन जैसे उपस्थित लेखक साहित्यकार ही जिम्मेदार हैं। आजकल किस तरह के बहुसंख्यक लेखक,कवि और संस्कृति- कर्मी सरकार की चरण वंदना और संघ के यशगान में लगे हैं वह उनके संवेदनशील होने और उनके लेखन के समाजोपयोगी होने में संदेहास्पद है। सम्मान और पुरस्कार की लालसा के वशीभूत ये लिजलिजी रीढ़ लिए वहां जाते हैं और खुशी में झूम उठते हैं। यहां वे‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’ विषय पर बोलने गए थे। उन्होंने बदलती राजनैतिक पृष्ठभूमि पर यदि ध्यान दिया होता तो ये दुखद घटना ना होती।

यहां उपस्थित साहित्य कार कहानीकार क्या उन घटनाओं से भी भिज्ञ नहीं थे जिनमें  विद्वान सामाजिक कार्यकर्ता डाॅ नरेन्द्र दाभोलकर,लेखक गोविन्द पानसरे, कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और प्रख्यात पत्रकार  गौरी लंकेश को इनके अनुषंगी संगठन ने गोलियों से मार डाला था। जो आज तक नहीं पकड़े गए।सब जानते हैं उन्हें, लेकिन वे सुरक्षित हैं।यदि उपस्थित साहित्यकारों के ज़हन में उनके लिए लेशमात्र पीड़ा रही होती तो वे यहां नहीं जाते ,तौहीन कराने।

यह घटना उन तमाम लेखकों के लिए एक सबक की तरह है जो संदेश देती है कि दुनिया की भलाई के लिए लिखने वाले गांधी के इन हत्यारों के आयोजनों में क्यों शामिल होते हैं।यदि वे बिकाऊ हैं भांड और चारणगिरि में यकीन रखते हैं तो कुछ नहीं कहना है।

यह पीड़ा उन लेखकों की है जो इस सरकार और उसकी गतिविधियों को गहरे तक समझती है।याद आती प्रगतिशील संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय कार्यकारिणी की छतरपुर में हुई तकरीबन दस साल पूर्व की बैठक जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि संगठन के लोग इस तरह के सरकारी आयोजन में नहीं जाएंगे जो  राजनैतिक साहित्यिक, सांस्कृतिक  होंगे। सिर्फ शासकीय कर्मियों को छूट दी गई थी। इसके बावजूद कुछ बड़े लेखक इसके विरोध में थे। वे गए भी सरकारी आयोजनों में , सम्मानित भी हुए। खैरियत रही वे ऐसे शर्मनाक व्यवहार से बचें रहे। शायद उस वक्त  वातावरण इतना बदतर नहीं था। लेखकों  का सम्मान था।  लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ का यह निर्णय कितना दूरदर्शी था यह आज समझ में आया।

अब कुलपति का विरोध करना,उनको हटाने की मांग किसी भी तरह पूरी नहीं हो सकती।बेतुकी बातें हैं।एक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति महोदया याद आती हैं जिन्हें अलसुबह होने वाली नमाज़ की आवाज़ से परेशानी हुई थी।तब उन्होंने माईक का मुंह दूसरी दिशा में करने के बाद भी माईक की आवाज़ धीमी करवा दी। यानि अब कुलपति सिर्फ अपने विश्वविद्यालय का ही मालिक नहीं है कुल गुरु है विश्वगुरु का चेला है वह किसी को खदेड़ सकता ।मेहमान बनाकर अपमान कर सकता है।उससे छेड़छाड़ ठीक नहीं।अपना भला चाहो तो ऐसे दरवाज़ों की दहलीज पर मत जाओ।

Ramswaroop Mantri

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