
कुमार सिद्धार्थ
इंदौर को आज देश स्वच्छता के सिरमौर के रूप में जानता है। लेकिन अपने
इंदौर की पहचान सिर्फ़ साफ़ सड़कों, सुंदर चौराहों और विकास के बड़े प्रोजेक्ट्स
तक सीमित नहीं है। इंदौर की असली पहचान उसकी प्रगतिशील नागरिक
चेतना है। इस शहर में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सक्रियता, जल-संरक्षण, हरियाली बढ़ाने के अभियान,
तालाबों और बावड़ियों के संरक्षण, साहित्यिक गतिविधियाँ, कवि गोष्ठियाँ, पुस्तक संस्कृति, रंगमंच और
सामाजिक सरोकार और राष्ट्रप्रेम ये सब इंदौर की प्रगतिशीलता को परिभाषित करता हैं।
लेकिन इंदौर की एक पहचान और है, जो शायद सबसे ज़्यादा गर्व करने लायक है यहाँ राष्ट्रीय दिवस एक
उत्सव के रूप में मनाये जाते है। शहर की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन चुका हैं। सेवा सुरभि के
बैनर तले क्रियान्वित “झंडा ऊँचा रहे हमारा” अभियान ने इंदौर को देश के उन गिने-चुने शहरों में खड़ा
कर दिया है, जहाँ राष्ट्रीय पर्व एक जन-आंदोलन का रूप लेते हैं।
“झंडा ऊँचा रहे हमारा” अभियान ने
राष्ट्रप्रेम को मंच से उतारकर सड़कों, चौराहों, स्कूलों और आम लोगों के दिलों तक पहुँचा दिया है।
यह अभियान आज अपने 24वें वर्ष में है और अगले वर्ष इसका रजत जयंती वर्ष होगा। यह इस बात का
प्रमाण है कि इंदौर ने राष्ट्रप्रेम को एक स्थायी परंपरा में बदल दिया है। ऐसी परंपरा, जो आदेशों से नहीं,
नागरिक सहभागिता से चलती है। जो औपचारिकता से नहीं, आत्मीयता से आगे बढ़ती है।
झंडा ऊँचा रहे हमारा को और भी जीवंत बनाते हैं वे सांस्कृतिक और वैचारिक आयोजन, जिनमें देश के
प्रसिद्ध कवि, कलाकार, संगीतज्ञ, विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हिस्सा लेते रहे हैं। कविताओं,
गीतों, संवादों और प्रस्तुतियों के ज़रिये राष्ट्रप्रेम को नए अर्थ मिलते हैं।
इस अभियान की सबसे भावुक और सशक्त झलक 25 जनवरी की शाम को मिलती है, जब रीगल चौराहे
पर अनाम शहीदों की स्मृति में हजारों नागरिक हजारों मोमबत्तियाँ प्रज्ज्वलित कर श्रद्धा सुमन
अर्पित करते हैं। उस समय पूरा इंदौर एक स्वर में श्रद्धा से झुक जाता है। बच्चे, युवा, महिलाएँ, बुज़ुर्ग
सब बिना किसी भेदभाव के एक साथ खड़े होकर उन शहीदों को नमन करते हैं, जिनके नाम हम नहीं
जानते, लेकिन जिनकी वजह से हम आज़ाद हैं। वह बताता है कि राष्ट्रप्रेम इंदौर में किताबों में नहीं, दिलों
में बसता है।
इसी तरह शहीद परिवारों का सम्मान इस अभियान की आत्मा है। हर वर्ष उन परिवारों को सम्मानित कर
इंदौर यह संदेश देता है कि बलिदान केवल इतिहास की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी है। यह
सम्मान नई पीढ़ी को यह सिखाता है कि राष्ट्रभक्ति सिर्फ़ नारों से नहीं, कृतज्ञता और संवेदना से बनती
है।
सेवा सुरभि द्वारा रीगल चौराहे पर स्थापित इंडिया गेट की प्रतिकृति गणतंत्र उत्सव का प्रतीक बन
चुकी है। यहाँ जब सैकड़ों स्कूली बच्चे देशभक्ति गीतों की सामूहिक प्रस्तुति देते हैं, तो लगता है मानो
राष्ट्र स्वयं बच्चों की आवाज़ में बोल रहा हो। यह दृश्य बताता है कि यह केवल वर्तमान का नहीं, भविष्य
का भी निर्माण कर रहा है। बच्चों के मन में राष्ट्रप्रेम का बीज यहीं पड़ता है, और वही बीज आगे चलकर
जिम्मेदार नागरिक बनाता है।
इंदौर की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और युवा संस्थाएँ गणतंत्र दिवस को जनोत्सव का
रूप देने में सक्रिय भूमिका निभाती आई हैं। रंग-ए-महफ़िल, वनबंधु परिषद, अभिनव कला समाज, स्टेट
प्रेस क्लब, श्री गीता रामेश्वरम ट्रस्ट, इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन, भारत विकास परिषद, लायंस और
रोटरी क्लब जैसे संगठनों से लेकर एनसीसी, एनएसएस, स्काउट-गाइड और विभिन्न स्कूल-कॉलेजों की
इकाइयाँ तक, सभी अपने-अपने स्तर पर इस राष्ट्रीय पर्व को जीवंत बनाती हैं। यही सामूहिकता इंदौर को
प्रदेश में अलग पहचान देती है।
इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी एक संस्था का कार्यक्रम नहीं है। जिला
प्रशासन के नेतृत्व में इंदौर नगर पालिक निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, इंदौर पुलिस, सेवा सुरभि और
शहर की अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ मिलकर इसे एक जन-आंदोलन का स्वरूप देती हैं।
शासन, प्रशासन और समाज का ऐसा समन्वय प्रदेश में दुर्लभ है। यही कारण है कि “झंडा ऊँचा रहे हमारा”
अभियान आज इंदौर की पहचान बन गया है और मध्यप्रदेश में इसे “इंदौर मॉडल” के रूप में देखा जाता
है।
“झंडा ऊँचा रहे हमारा” इसी प्रगतिशील चेतना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यहाँ नागरिक स्वयं आगे
बढ़कर भागीदारी करते हैं। यही नागरिक अग्रणीता इस अभियान को विशेष बनाती है।
आज जब राष्ट्रप्रेम को अक्सर शोर, विवाद और विभाजन से जोड़ा जाने लगा है, तब इंदौर का यह
अभियान हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रप्रेम का सबसे सुंदर रूप समावेशिता है। यहाँ हर धर्म, हर वर्ग और
हर उम्र के लोग एक साथ खड़े होते हैं।
आज, जब यह अभियान रजत जयंती की दहलीज़ पर खड़ा है, तो यह इंदौर के लिए गर्व का क्षण है। यह
इस बात का प्रमाण है कि अपन इंदौर केवल विकास का शहर नहीं, बल्कि संस्कारों और नागरिक चेतना
का शहर है।
शायद इसी कारण जब प्रदेश में कहीं राष्ट्रीय पर्वों की बात होती है, तो इंदौर अपने आप उदाहरण बनकर
सामने आता है। बिना शोर किए, बिना दिखावे के, चुपचाप लेकिन पूरे गर्व के साथ—झंडा ऊँचा थामे हुए।
कुमार सिद्धार्थ, पिछले चार दशक से पत्रकारिता और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय है। आप
पर्यावरण, शिक्षा, सामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्न अखबारों में लिखते रहते हैं।





