मनोज अभिज्ञान
मीडिया क्यों सच बोल कर भी झूठ पैदा करता है? यह सवाल पहली नज़र में विरोधाभासी लगता है। सच और झूठ को हम आमतौर पर एक-दूसरे के उलट मानते हैं। लेकिन आधुनिक मीडिया के साथ समस्या यह नहीं है कि वह झूठ बोलता है। समस्या यह है कि वह सच बोलते हुए भी ऐसी दुनिया रच देता है जो सच नहीं होती। आज का मीडिया झूठ गढ़ने के लिए तथ्यों को छिपाने का जोखिम नहीं उठाता; वह तथ्यों को दिखाकर, सजाकर, चुनकर और दोहराकर झूठ पैदा करता है। यही इस दौर की सबसे खतरनाक और सबसे सूक्ष्म प्रक्रिया है।
मीडिया कभी पूरा सच नहीं दिखाता। वह सच का चयन करता है। कौन सा तथ्य ख़बर है और कौन सा नहीं, यह निर्णय खुद में राजनीतिक निर्णय होता है। जब कोई घटना घटती है, तो उसके सैकड़ों पहलू होते हैं। मीडिया उनमें से कुछ को उठाता है और बाकी को छोड़ देता है। छोड़े गए तथ्य झूठ नहीं होते, लेकिन उनकी अनुपस्थिति से जो तस्वीर बनती है, वह झूठी हो सकती है।
यहां झूठ किसी गलत सूचना का नाम नहीं है, बल्कि अधूरी सच्चाइयों से बनी पूरी कहानी है। मीडिया इसी कला में निपुण हो चुका है। वह कह सकता है, हमने तो कोई झूठ नहीं बोला, और यह तकनीकी रूप से सही भी होगा। लेकिन जो अर्थ दर्शक के मन में बैठता है, वह सत्ता के अनुकूल गढ़ा गया होता है।
मीडिया अध्ययन में इसे फ्रेमिंग कहा जाता है। एक ही तथ्य को अलग-अलग फ्रेम में रखकर बिल्कुल अलग अर्थ पैदा किए जा सकते हैं; किसी युद्ध को आत्मरक्षा कहा जाए या आक्रमण, किसी विरोध को लोकतांत्रिक असहमति कहा जाए या अराजकता? तथ्य वही रहता है, भाषा बदलते ही सच्चाई का रूप बदल जाता है। यहां मीडिया सच को छुपा नहीं रहा, बल्कि उसे इस तरह प्रस्तुत कर रहा है कि दर्शक खुद वही निष्कर्ष निकाले जो सत्ता चाहती है। यही वह बिंदु है जहां सच बोलते हुए झूठ पैदा होता है।
आज का युग सूचना की कमी का नहीं, बल्कि सूचना की बाढ़ का युग है। हर मिनट ब्रेकिंग न्यूज़, हर सेकंड अपडेट, हर घटना पर एक्सपर्ट की राय। लेकिन इस बाढ़ का नतीजा ज्ञान नहीं, थकान है। जब दर्शक थक जाता है, तो वह तथ्यों का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि भावनात्मक संकेतों पर भरोसा करने लगता है। मीडिया इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझता है। वह दर्शक को सोचने का समय नहीं देता। एक खबर खत्म होने से पहले दूसरी खबर शुरू हो जाती है।
इस निरंतरता में सच बिखर जाता है और दर्शक के मन में केवल एक भाव बचता है — डर, गुस्सा, राष्ट्रवाद या घृणा। झूठ यहीं जन्म लेता है, किसी गलत तथ्य से नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता के क्षरण से।
फ्रांसीसी चिंतक जीन बॉडरिलार्ड ने कहा था कि आधुनिक समाज में हम वास्तविकता नहीं, बल्कि सिमुलेशन में जीते हैं। मीडिया इस सिमुलेशन का सबसे बड़ा निर्माता है। युद्ध, राजनीति, आपदा, विरोध; सब कुछ एक तमाशे में बदल दिया जाता है। कैमरा, ग्राफिक्स, म्यूज़िक और एंकर की आवाज़ मिलकर ऐसी नाटकीयता रचते हैं जिसमें सच भी कोई दृश्य बनकर रह जाता है। जब सच दृश्य बन जाता है, तो उसका नैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ गायब हो जाता है।
दर्शक घटना को नहीं, उसकी प्रस्तुति को याद रखता है। इस तरह सच मौजूद रहता है, लेकिन उसका अर्थ खो जाता है। यही अर्थहीन सच झूठ का सबसे उन्नत रूप है।
मीडिया खुद को सत्ता का निगरानीकर्ता बताता है, लेकिन व्यवहार में वह अक्सर सत्ता का साझेदार होता है। यह साझेदारी किसी आदेश से नहीं बल्कि साझा हितों से चलती है — टीआरपी, एक्सेस, विज्ञापन, राष्ट्रवादी भावनाएं। अमेरिकी चिंतक नोम चोम्स्की ने इसे मैनुफैक्चरिंग कंसेंट कहा था। मीडिया सीधे प्रचार नहीं करता, बल्कि ऐसी सहमति गढ़ता है जिसमें सत्ता के फैसले स्वाभाविक, अपरिहार्य और नैतिक लगने लगते हैं। यहां झूठ किसी खबर में नहीं, बल्कि पूरे नैरेटिव में होता है।
आज राजनीति और मनोरंजन के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। नेता बयान देता है, मीडिया उसे शो में बदल देता है। ट्रंप जैसे नेताओं के संदर्भ में यह साफ दिखता है, लेकिन यह समस्या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। मीडिया सत्ता को सवालों के कटघरे में खड़ा करने की बजाय उसे कंटेंट में बदल देता है। इस प्रक्रिया में मीडिया सच तो दिखाता है, लेकिन यह नहीं दिखाता कि इन बयानों के पीछे की संरचनाएं क्या हैं।
नतीजा यह होता है कि राजनीति व्यक्तियों का नाटक बन जाती है और सिस्टम अदृश्य हो जाता है। यह अदृश्यता ही सबसे बड़ा झूठ है।
आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा एल्गोरिदम तय करता है। कौन सी खबर दिखेगी, कितनी बार दिखेगी, किसे दिखेगी, यह निर्णय मशीनें लेती हैं, जिनका लक्ष्य सच नहीं, बल्कि जुड़ाव और मुनाफा होता है। एल्गोरिदम आपको वही दिखाता है जो आपकी पूर्व धारणाओं को मजबूत करे। इससे ऐसा सूचना-बुलबुला बनता है जिसमें व्यक्ति को लगता है कि पूरी दुनिया वही सोचती है जो वह सोचता है। यहां मीडिया झूठ नहीं बोल रहा, बल्कि सच को इस तरह फ़िल्टर कर रहा है कि असहमति गायब हो जाए।
मीडिया नैतिक भाषा का प्रयोग भी बहुत चुनिंदा ढंग से करता है। कहीं बच्चों की मौतें मानवीय त्रासदी होती हैं, कहीं कोलैटरल डैमेज। शब्द वही तय करते हैं कि दर्शक दुख महसूस करेगा या नहीं। यह चयनात्मक संवेदना दर्शक को नैतिक रूप से भ्रमित करती है। वह सोचता है कि वह सच देख रहा है, जबकि वह सच का नैतिक रूप से संपादित संस्करण देख रहा होता है। झूठ यहां किसी तथ्य में नहीं, बल्कि सहानुभूति के वितरण में होता है।
आज मीडिया का संकट यह नहीं है कि वह झूठ फैलाता है। संकट यह है कि वह सच को इस तरह व्यवस्थित करता है कि झूठ अपने आप पैदा हो जाए। यह झूठ पकड़ में नहीं आता, क्योंकि वह तथ्यों के भीतर छिपा होता है। इसलिए मीडिया की आलोचना का अर्थ यह नहीं कि हर खबर को झूठ कहा जाए। इसका अर्थ यह है कि हर सच से पूछा जाए —
यह क्यों दिखाया गया?
यह कैसे दिखाया गया?
और इससे कौन सा सच अदृश्य हो गया?
जब तक ये सवाल ज़िंदा हैं, तब तक मीडिया पूरी तरह झूठ नहीं बन सकता। और जिस दिन ये सवाल मर गए, उस दिन सच भी झूठ का सबसे विश्वसनीय रूप बन जाएगा।
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)





