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पूर्वोत्तर की ‘7 बहनों’ में कैसे शामिल हुए मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा…?

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भारत में 21 जनवरी का दिन मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा के स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है. साल 1972 में इसी दिन इन तीनों राज्यों को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था. मणिपुर और त्रिपुरा पहले रियासतें थीं जिनका भारत में विलय हुआ. वहीं मेघालय असम से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य बना. यह दिन पूर्वोत्तर की विशिष्ट पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत का महापर्व है.

भारत के इतिहास में 21 जनवरी का दिन बेहद खास माना जाता है. इसी दिन भारत के नक्शे पर तीन नए राज्यों का उदय हुआ था. मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा ने साल 1972 में इसी दिन पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल किया था. इन राज्यों की यात्रा संघर्ष और संवाद की एक लंबी कहानी है. यह दिन पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक अधिकारों की जीत का प्रतीक है. इन राज्यों ने राजशाही से लोकतंत्र और केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य तक का लंबा सफर तय किया है. यह लेख इन तीनों राज्यों के गठन की ऐतिहासिक घटनाओं और उनके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेगा. जानिए कैसे इन राज्यों ने अपनी खोई हुई आवाज वापस पाई और भारतीय संघ के अटूट हिस्से बने.

मणिपुर की राजशाही से लोकतंत्र तक की यात्रा कैसी रही?

मणिपुर आजादी से पहले एक स्वतंत्र और समृद्ध रियासत थी. महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे. शुरुआत में मणिपुर को आंतरिक स्वायत्तता देने का वादा किया गया था. साल 1948 में यहां वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव हुए थे. उस समय भारत में यह एक अनोखी और गौरवपूर्ण उपलब्धि थी. हालांकि साल 1949 में परिस्थितियां तेजी से बदल गईं. महाराजा ने निर्वाचित विधानसभा की सलाह के बिना विलय समझौते पर दस्तखत कर दिए. इसके बाद मणिपुर को एक भाग ‘सी’ राज्य का दर्जा दिया गया. लंबे संघर्ष के बाद 1956 में यह केंद्र शासित प्रदेश बना. अंततः 21 जनवरी 1972 को मणिपुर एक पूर्ण राज्य के रूप में उभरा.

त्रिपुरा के राजाओं ने भारत में विलय का फैसला कब और क्यों लिया?

त्रिपुरा की कहानी भी एक शाही रियासत से जुड़ी हुई है. महाराजा बीर बिक्रम की मौत के बाद शासन रानी कंचन प्रभा देवी के हाथों में था. उन्होंने साल 1949 में भारत सरकार के साथ विलय को मंजूरी दी थी. विलय के बाद त्रिपुरा को प्रशासनिक रूप से भाग ‘सी’ श्रेणी में रखा गया. साल 1956 में इसे भी एक केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया. त्रिपुरा के लोग लंबे समय से पूर्ण राज्य और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग कर रहे थे. उनकी यह प्रतीक्षा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम 1971 के बाद समाप्त हुई. 21 जनवरी 1972 को त्रिपुरा भारत का पूर्ण राज्य बन गया. यह बदलाव वहां के लोगों के लिए राजनीतिक भागीदारी का नया द्वार लेकर आया.

मेघालय का निर्माण असम से अलग होने के लिए क्यों जरूरी था?

मेघालय के बनने की कहानी बाकी दोनों राज्यों से बिल्कुल अलग है. यह किसी रियासत का भारत में विलय नहीं था. यह आंदोलन खासी, जयंतिया और गारो हिल्स के लोगों की पहचान से जुड़ा था. यहां के लोग असम के भीतर अपनी संस्कृति और स्वदेशी अधिकारों की रक्षा चाहते थे. इस मांग ने एक बड़े और शांतिपूर्ण आंदोलन का रूप ले लिया था. साल 1969 में असम पुनर्गठन अधिनियम के तहत इसे एक स्वायत्त राज्य बनाया गया. यह पूर्ण राज्यत्व की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम था. इसके बाद 21 जनवरी 1972 को मेघालय भारत का 21वां पूर्ण राज्य बना. शिलांग को इसकी राजधानी बनाया गया जो आज शिक्षा का बड़ा केंद्र है.

पूर्वोत्तर पुनर्गठन अधिनियम 1971 ने भारत का भूगोल कैसे बदला?

साल 1971 का पुनर्गठन अधिनियम पूर्वोत्तर की राजनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट था. इसी कानून ने मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय को पूर्ण राज्य का संवैधानिक दर्जा दिया. इसने पूर्वोत्तर की सात बहनों यानी ‘सेवन सिस्टर्स’ के ढांचे को मजबूती प्रदान की. इस अधिनियम के जरिए केंद्र सरकार ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक तरीके से स्वीकार किया. इससे देश की संघीय संरचना और अधिक विविधतापूर्ण और जीवंत बन गई. यह कानून याद दिलाता है कि भारत केवल एक भू-राजनीतिक इकाई नहीं है. यह विभिन्न संस्कृतियों और पहचानों का एक खूबसूरत और अटूट संगम है. इन राज्यों की प्रगति आज पूरे देश के लिए गौरव का विषय है.

Ramswaroop Mantri

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