“जॉर्ज अभी ज़िंदा है सत्य में संघर्ष में”
जॉर्ज मरे नहीं है,
वो हर उस मुट्ठी में ज़िंदा है
जो मज़दूरी से नहीं—
ज़ुल्म से टकराती है।
जॉर्ज मरे नहीं है,
वो हर उस आवाज़ में है
जिसे सत्ता ने दबाया,
और जनता ने वापस लाया।
जब संसद दलालों की मंडी बने,
जब संविधान पोस्टर रह जाए,
तब याद रखना—
एक आदमी था
जो जेल को पदक समझता था।
आपातकाल आया,
डर का राज चला,
पर एक नाम भूमिगत होकर भी
सत्ता के सीने पर चढ़ा रहा—
जॉर्ज फ़र्नांडिस!
न जाति की ढाल,
न धर्म का ज़हर,
मज़दूर था उसकी पहचान,
और इन्कलाब उसका कहर।
आज फिर वही समय है—
सिस्टम गूंगा है,
न्याय बिकाऊ है,
और जनता से कहा जा रहा है
“चुप रहो, यही देशभक्ति है।”
नहीं!
देशभक्ति चुप्पी नहीं होती,
देशभक्ति सवाल होती है
जॉर्ज यही सिखा गया।
अगर तुमने आवाज़ उठाई,
तो तुम उसके वारिस हो,
अगर तुमने डर ओढ़ लिया।
तो शोषण के साझेदार हो।
जॉर्ज को श्रद्धांजलि फूलों से नहीं,
सड़कों से दो,
नारों से दो,
विरोध से दो,
लड़ाइयों से दो।
क्योंकि
जो सत्ता से नहीं टकराता,
वो इतिहास नहीं बनता।
लाल सलाम उस जिद्दी विरोधी क्रन्तिकारी आग को—
जिसका नाम जॉर्ज फ़र्नांडिस है। ✊🔥
*अनिल चौहान, जागरूक भारतीय
जॉर्ज अभी ज़िंदा है सत्य में संघर्ष में”





