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इतिहास:औपनिवेशिक अवशेष

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शैलेन्द्र चौहान

विंस्टन चर्चिल आधुनिक इतिहास में एक ऐसे ब्रिटिश राजनेता के रूप में स्मरण किए जाते हैं जिन्हें यूरोप में नाज़ी फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक माना जाता है, किंतु यही चर्चिल जब भारत के प्रश्न पर आते हैं तो उनका बौद्धिक, नैतिक और राजनीतिक चेहरा एकदम भिन्न दिखाई देता है। भारत के संबंध में चर्चिल के वक्तव्य केवल तत्कालीन औपनिवेशिक नीति की अभिव्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे उस साम्राज्यवादी मानसिकता के दस्तावेज़ हैं जो उपनिवेशों को स्वशासन के अयोग्य मानती थी। आज का भारत—एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और वैश्विक शक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला राष्ट्र—चर्चिल के उन वक्तव्यों को ऐतिहासिक आलोचना की कसौटी पर परखने की माँग करता है।

चर्चिल का भारत-दृष्टिकोण मूलतः नस्लवादी और संरक्षकतावादी था। 1931 में राउंड टेबल कॉन्फ़्रेंस के समय उन्होंने कहा था—

“I have not become the King’s First Minister in order to preside over the liquidation of the British Empire.”

यह कथन सामान्यतः साम्राज्य-रक्षा के रूप में उद्धृत किया जाता है, किंतु भारतीय संदर्भ में इसका अर्थ स्पष्ट था: भारत को स्वतंत्रता देना चर्चिल के लिए ब्रिटिश सत्ता के आत्मविसर्जन के समान था। आज के भारत के संदर्भ में यह वक्तव्य इस तथ्य को रेखांकित करता है कि औपनिवेशिक शासन स्वतंत्रता को किसी नैतिक अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन के प्रश्न के रूप में देखता था।

चर्चिल भारत को एक राजनीतिक राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। 1930 के दशक में उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया कि भारत “एक देश नहीं, बल्कि अनेक जातियों, धर्मों और भाषाओं का अव्यवस्थित समूह” है। उनका कथन था—

“India is a geographical term. It is no more a united nation than the equator.”

आज जब भारत एक लिखित संविधान, नियमित चुनावों, न्यायपालिका और संघीय ढाँचे के साथ विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, तब यह उद्धरण चर्चिल की ऐतिहासिक भूल और औपनिवेशिक अज्ञान दोनों को उजागर करता है। चर्चिल भारतीय विविधता को राष्ट्र-निर्माण की क्षमता के रूप में नहीं, बल्कि अव्यवस्था के प्रमाण के रूप में देखते थे।

महात्मा गांधी के प्रति चर्चिल की घृणा उनके भारत-विरोधी दृष्टिकोण का सबसे नग्न रूप है। 1931 में उन्होंने गांधी के लंदन आगमन पर टिप्पणी की—

“It is alarming and nauseating to see Mr. Gandhi, a seditious Middle Temple lawyer, now posing as a fakir of a type well known in the East, striding half-naked up the steps of the Viceregal palace.”

यह वक्तव्य केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं है; यह उस औपनिवेशिक सत्ता की बेचैनी है जो नैतिक बल पर खड़े जन-आंदोलन से भयभीत थी। आज के भारत में गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में वैश्विक सम्मान प्राप्त है, जबकि चर्चिल का यह वक्तव्य इतिहास में औपनिवेशिक अहंकार के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चर्चिल का भारत के प्रति दृष्टिकोण और अधिक कठोर हो गया। जब भारतीय नेतृत्व ने यह प्रश्न उठाया कि ब्रिटेन लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर युद्ध लड़ रहा है, तो भारत को स्वतंत्रता क्यों नहीं दी जा सकती, तब चर्चिल ने स्पष्ट कहा—

“I hate Indians. They are a beastly people with a beastly religion.”

यह उद्धरण, चाहे बाद में इसके शब्दों पर विवाद हुआ हो, चर्चिल की निजी चिट्ठियों और सहयोगियों के संस्मरणों में जिस मानसिकता की पुष्टि करता है, वह निर्विवाद है। आज के भारत के संदर्भ में यह कथन औपनिवेशिक नस्लवाद की उस जड़ को उजागर करता है जो स्वयं को सभ्यता का वाहक मानते हुए उपनिवेशित जनता को हीन समझती थी।

1943 के बंगाल अकाल के समय चर्चिल का रवैया और भी अमानवीय हो जाता है। जब भारत में लाखों लोग भूख से मर रहे थे, तब चर्चिल ने अनाज भेजने से इनकार करते हुए कहा—

“Why hasn’t Gandhi died yet?”

यह कथन आज के भारत में केवल एक ऐतिहासिक उद्धरण नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन की नैतिक विफलता का प्रमाण है। समकालीन भारत में जब खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी राज्य की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं, तब चर्चिल की यह उपेक्षा औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्र भारत के नैतिक दृष्टिकोण के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित करती है।

चर्चिल का यह भी मानना था कि यदि ब्रिटेन भारत से चला गया तो वहाँ “रक्तपात और अराजकता” फैल जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी थी—

“If British rule ends, India will fall back quite rapidly through the centuries into the barbarism and privations of the Middle Ages.”

आज का भारत, जो अंतरिक्ष मिशनों, परमाणु तकनीक, आईटी उद्योग और वैश्विक कूटनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, इस कथन का सबसे सशक्त प्रत्युत्तर है। चर्चिल जिस “मध्ययुगीन बर्बरता” की भविष्यवाणी कर रहे थे, वह भारत में नहीं, बल्कि स्वयं औपनिवेशिक सोच में निहित थी।

यह उल्लेखनीय है कि भारत की स्वतंत्रता चर्चिल के कार्यकाल में नहीं हुई। 1945 में उनकी हार और लेबर पार्टी की जीत के बाद प्रधानमंत्री बने क्लेमेंट एटली ने स्पष्ट स्वीकार किया था कि भारत में ब्रिटिश शासन बनाए रखना न तो नैतिक रूप से संभव था, न ही राजनीतिक रूप से। एटली के शब्दों में—

“The principal cause of our withdrawal from India was the moral pressure of Gandhi and the Indian National Congress.”

यह कथन अप्रत्यक्ष रूप से चर्चिल की नीति की विफलता की स्वीकृति भी है। आज का भारत इसी ऐतिहासिक तथ्य को स्मरण करते हुए चर्चिल को स्वतंत्रता-दायक नहीं, बल्कि स्वतंत्रता-विरोधी नेता के रूप में देखता है।

समग्रतः, चर्चिल के भारत-सम्बन्धी वक्तव्य आज के भारत के लिए केवल अतीत के उद्धरण नहीं हैं; वे औपनिवेशिक सत्ता की मानसिक संरचना को समझने के स्रोत हैं। वे यह दिखाते हैं कि साम्राज्यवाद केवल राजनीतिक नियंत्रण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अवमानना और नैतिक दमन का तंत्र था। आज का भारत जब आत्मनिर्भरता, लोकतंत्र और बहुलता की बात करता है, तब चर्चिल के वक्तव्य एक नकारात्मक संदर्भ बिंदु के रूप में सामने आते हैं—जिससे दूरी बनाकर ही आधुनिक भारतीय राष्ट्र ने अपनी पहचान गढ़ी है।लेकिन क्या वास्तव में यह कहा जा सकता है कि आज का भारत चर्चिल की भविष्यवाणियों का पूर्णतः खंडन है उनके पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के बावजूद ? हालांकि उनके औपनिवेशिक विश्वासों का ऐतिहासिक प्रतिवाद तो है।

Ramswaroop Mantri

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