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पीएम मोदी की इजरायल यात्रा के मायने

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चंद्रभूषण
पीएम नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे को दोनों देशों के आपसी रिश्ते की ही नजर से देखा जाना चाहिए, लेकिन पश्चिमी एशिया के हालात अभी जैसे हैं, उसमें ग्लोबल मीडिया इसको कुछ अलग ही नजरिये से देख रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह कि अमेरिका किसी भी क्षण ईरान पर हवाई हमलों की झड़ी लगा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ संबोधन में हमले के संकेत दे चुके हैं और ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों को तत्काल वहां से निकल जाने की आधिकारिक सलाह भी दी जा चुकी है।

गाजा संकट

दूसरी बात इजरायल की आंतरिक स्थिति से जुड़ी है। गाजा पट्टी में पिछले तीन वर्षों में हुई 72 हजार से ज्यादा मौतों में काफी बड़ा हिस्सा आम नागरिकों का और उसमें भी बच्चों का रहा है, जिन्हें हमास के लड़ाकों में तो कतई शामिल नहीं माना जा सकता। इस तबाह इलाके में आज भी लोगों को भोजन, पानी और दवाएं नहीं मिल पा रहीं। बाहर से वहां कोई सहायता भी नहीं पहुंचने दी जा रही है। गाजा के राजनीतिक भविष्य पर कोई बात नहीं हो रही, उलटे फलस्तीन के दूसरे बड़े इलाके वेस्ट बैंक के लोग अभी जबरदस्ती वहां जा बसे इजरायलियों के हमले झेल रहे हैं और इजरायली हुकूमत उन्हें रोकने के बजाय उनके साथ खड़ी है।

टू स्टेट सॉल्यूशन
भारत सरकार इजरायल की बसावट के समय से ही फलस्तीनियों के साथ खड़ी है और इस स्थिति में आधिकारिक रूप से आज भी कोई बदलाव नहीं आया। पश्चिमी एशिया के इस सबसे तीखे टकराव में भारत पहले की ही तरह आज भी ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ का पक्षधर है। यह दृष्टि लेकर ही भारत संयुक्त राष्ट्र की सीधी पहलकदमी के साथ खड़ा है। ट्रंप की पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान की उत्साहपूर्ण भागीदारी है, लेकिन भारत इसमें शामिल नहीं। कारण वही कि फलस्तीनी हितों की रक्षा की उम्मीद इस बोर्ड से नहीं की जा सकती।

हालात अलग
इस नजरिये के साथ अभी के समय में भारतीय प्रधानमंत्री का इजरायल दौरा भारत जैसी क्षेत्रीय महाशक्ति की कुछ अंतर्विरोधी छवि प्रस्तुत करता है। सन 2017 में भारतीय प्रधानमंत्री जब इस्राइल गए थे, तब बात अलग थी। वह सन 1992 में इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंधों की बहाली से शुरू हुई प्रक्रिया का हिस्सा था। वहां से चीजें अभी बहुत आगे आ चुकी हैं।

गहराता रिश्ता
इस छोटे-से मुल्क के साथ पिछले पांच वर्षों में भारत ने 20 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार किया है। पूरी दुनिया में इजरायली हथियारों की बिक्री का 34% हिस्सा अकेले भारत ने खरीदा है। इन व्यापारिक रिश्तों के दायरे अभी खुलने शुरू ही हुए हैं, लेकिन आशंका है कि पीएम मोदी का यह दौरा निवेश, व्यापार या तकनीकी सहयोग से ज्यादा कहीं विवादित नेता बेंजामिन नेतन्याहू के हाथ मजबूत करने की तरह न देखा जाए।

नेतन्याहू से नाराजगी
नरेंद्र मोदी जब इजरायली संसद नेसेट के एक विशेष सत्र को संबोधित कर रहे थे, तो वहां के विपक्षी सांसदों ने सदन से बाहर रहने का फैसला किया। इसका कारण उन्होंने इस आयोजन में न्यायपालिका के प्रमुख को आमंत्रित न किया जाना बताया। नेतन्याहू अभी इजरायल की राष्ट्रीय भावनाओं का किस हद तक प्रतिनिधित्व कर पा रहे हैं, इसका अंदाजा उनकी आमफहम तस्वीरों से नहीं लगाया जा सकता। लगभग लगातार ही उनके खिलाफ इजरायल की सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। यहूदी समुदाय ने अमेरिका और विभिन्न यूरोपीय देशों में सार्वजनिक रूप से उनकी कट्टरपंथी नीतियों के प्रति नाराजगी जताई है।

खाड़ी में निश्चिंत
हालांकि इस बात को लेकर हम निश्चिंत रह सकते हैं कि मोदी के नेतन्याहू के साथ खड़े होने से खाड़ी क्षेत्र में भारत अलग-थलग नहीं पड़ने जा रहा। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते अभी इतिहास के सबसे अच्छे दौर से गुजर रहे हैं और ये दोनों देश किसी भी कीमत पर इजरायल से अपना बिगाड़ नहीं चाहते।

जनभावना से दूरी
खाड़ी क्षेत्र में अपना राजनय सुचारू ढंग से आगे बढ़ाना दुनिया के किसी भी देश के लिए कभी बहुत आसान नहीं रहा। भारत के लिए इसमें उलझनें और भी ज्यादा रही हैं, क्योंकि किसी खेमे का हिस्सा बनकर चलना कभी उसकी नीति नहीं रही। ऐसे में नरेंद्र मोदी की प्रो-एक्टिव कूटनीति से व्यापार, निवेश और रोजगार के क्षेत्र में हमें फायदा हुआ है, लेकिन फलस्तीनी नागरिकों की दुर्दशा पर ध्यान न दे पाने से अभी लोकतांत्रिक जनभावनाओं से कुछ दूरी-सी बन गई दिखती है। ईरान से रिश्तों का स्तर पहले जैसा बनाए रखने में भी आगे थोड़ी मुश्किलें आ सकती हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Ramswaroop Mantri

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