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भारत की विदेश नीति के ‘ब्लाइंड स्पॉट’ को उजागर किया ब्रह्मा चेलानी ने

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क्या ईरान वाकई हमसे हजारों मील दूर एक मिड‍िल ईस्‍ट का देश है, या यह हमारे घर के ठीक बगल का समुद्री पड़ोसी

जब हम भारत के पड़ोसियों की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में तुरंत पाकिस्तान, चीन, नेपाल या बांग्लादेश के नाम आते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ईरान भी हमारा उतना ही करीबी पड़ोसी है जितना कि कोई और? सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने एक ऐसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा किया है, जिसे भारत की विदेश नीति और आम समझ का ब्लाइंड स्पॉट कहा जा सकता है. उन्‍होंने कहा, ईरान को मिड‍िल ईस्ट का हिस्सा कहना बंद कीजिए, वह भारत का समुद्री पड़ोसी है.

ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि ईरान को मिड‍िल ईस्ट के चश्मे से देखना न केवल भूगोल की गलती है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच को भी सीमित करता है. मिड‍िल ईस्ट एक पश्चिमी अवधारणा है, जिसे यूरोपीय देशों ने अपने नजरिए से गढ़ा था. चेलानी कहते हैं कि जब हम ईरान को एक दूर के ‘खाड़ी देश’ के रूप में देखते हैं, तो हम उस बुनियादी भौगोलिक तथ्य को भूल जाते हैं कि ईरान का दक्षिणी तट अरब सागर के ठीक उस पार है, जो भारत के पश्चिमी तट के बिल्कुल सामने पड़ता है.

यह लेबल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि ईरान में जो कुछ भी हो रहा है, वह ‘किसी और की समस्या’ है. जबकि असलियत यह है कि ईरान हमारे दरवाजे पर खड़ा एक ऐसा मुल्क है, जिसकी स्थिरता और अस्थिरता का सीधा असर भारत पर पड़ता है.

मुंबई से जितना दूर चेन्नई, उतना ही ईरान

ब्रह्मा चेलानी ने दूरियों का जो गणित पेश किया है, वह चौंकाने वाला और आंखें खोलने वाला है. अक्सर हमें लगता है कि ईरान बहुत दूर है, लेकिन आंकड़ों पर गौर करें. गुजरात के कांडला पोर्ट से ईरान के चाबहार पोर्ट की दूरी महज 550 नॉटिकल मील यानी लगभग 1000 किलोमीटर है. जबक‍ि मुंबई से चाबहार की दूरी सिर्फ 786 नॉटिकल मील है.

तुलना के लिए समझें, तो मुंबई से दिल्ली की हवाई दूरी भी लगभग इतनी ही है. सदियों से इसी समुद्री गलियारे ने भारत और ईरान की सभ्यताओं के बीच व्यापार और संस्कृति के जीवंत सेतु का काम किया है. अरब सागर के इस पार और उस पार के इन दो छोरों ने इतिहास को एक साथ जिया है. चेलानी का तर्क है कि जब फासला इतना कम है, तो हम इसे एक ‘दूर का देश’ कैसे मान सकते हैं?

ईरान का रणनीतिक महत्व

भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और हमें खूब सारी एनर्जी चाह‍िए. ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, भारत के लिए ईरान तेल और एलएनजी (LNG) का सबसे निकटतम और प्रमुख स्रोत है. अगर कूटनीतिक और वैश्विक प्रतिबंधों का दबाव न हो, तो ईरान से भारत तक ऊर्जा की आपूर्ति सबसे सस्ती और सुलभ हो सकती है.

ईरान भारत के ल‍िए चौराहा

  1. अफगानिस्तान: पाकिस्तान द्वारा जमीन का रास्ता रोके जाने के बाद, अफगानिस्तान तक पहुंचने का भारत का एकमात्र विश्वसनीय रास्ता ईरान का चाबहार पोर्ट ही है.
  2. मध्य एशिया: कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान जैसे संसाधन संपन्न देशों तक पहुंचने के लिए ईरान भारत का प्रवेश द्वार है.
  3. पाकिस्तान पर नजर: ईरान की सीमाएं पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत से लगती हैं. पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से संतुलित करने के लिए ईरान के साथ भारत की दोस्ती अनिवार्य है.

पड़ोसी की समस्या, हमारी समस्या

ब्रह्मा चेलानी का सबसे बड़ा प्रहार इसी बात पर है कि हम ईरान को “किसी और की समस्या” मान लेते हैं. जब अमेरिका या इजरायल ईरान पर पाबंदियां लगाते हैं या युद्ध की स्थिति बनती है, तो भारत इसे एक वैश्विक संकट की तरह देखता है. चेलानी का कहना है कि हमें इसे एक ‘पड़ोसी के घर में लगी आग’ की तरह देखना चाहिए.

अगर ईरान में अस्थिरता आती है, तो अरब सागर में भारत के व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो जाते हैं. अगर वहां तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो भारत में महंगाई का सीधा झटका लगता है. इसलिए, ईरान को मिडल ईस्टर्न देश कहना केवल शब्दों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक कूटनीतिक ढिलाई है जो हमें अपने एक महत्वपूर्ण पड़ोसी से मानसिक रूप से दूर कर देती है.

Ramswaroop Mantri

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