-सुसंस्कृति परिहार
दुनियां के बहुसंख्यक देश ईरान इज़राइल युद्ध की वजह से इन दिनों भीषण ऊर्जा त्रासदी के दंश को झेलने विवश हैं। लगभग हर देश में पेट्रोल पंपों और गैस वितरकों के यहां लंबी कतारें हैं आपूर्ति कम हुई है। कहीं कहीं भंडारण ख़त्म हो चुका है। हमारे देश में तो युद्ध की ख़बर के बाद से जो भी माल असबाब संग्रहीत था वह या तो कालाबाजारी के हवाले बड़े दामों पर मिल रहा है या जो दबंग हैं उन्होंने आपदा में अवसर का लाभ लेते हुए भंडारण कर लिया है।
हालांकि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती दिखाई देने लगी है। तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और वैश्विक बाजारों में महंगाई की आशंका गहरा गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव और पाबंदियों की वजह से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है।
इसी बीच ईरान ने पहली बार खुलकर बताया है कि वह किन शर्तों पर अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध समाप्त करने को तैयार है।
ईरान की पहली शर्त है,वह कानूनी अधिकार चाहता है इसका अर्थ है, ईरान के परमाणु कार्यक्रम (यूरेनियम संवर्धन) के शांतिपूर्ण उपयोग के अधिकार को मान्यता देना।दूसरी शर्त है, मुआवजा वह चाहता है युद्ध के कारण हुए आर्थिक और बुनियादी ढांचे के नुकसान की भरपाई की मांग।तीसरी महत्वपूर्ण शर्त है ईरान की सुरक्षा गारंटी यानि यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में युद्ध दोबारा न भड़के।ईरान के राष्ट्रपति ने इन शर्तों को युद्ध ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता बताया है।
दुनियां में अचानक आई भीषण ऊर्जा त्रासदी से निपटने में देखना है राष्ट्रसंघ और अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है। क्योंकि यह एक ऐसी त्रासदी है जिससे यदि नहीं निपटा जाता है तो दुनिया के चंद मुल्कों को छोड़कर जिनके पास ये संसाधन मौजूद बाकी दुनिया पूरी तरह ठप्प हो जाएगी।सब कुछ थम जाएगा। ऊर्जा के वैकल्पिक साधन सौंर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, आण्विक ऊर्जा या ज्वारीय ऊर्जा इतनी जल्दी क्षतिपूर्ति करने का माद्दा नहीं रखते हैं।तो क्या लकड़ी,कोयला जैसे प्राचीन ऊर्जा संसाधन की ओर हमें लौटना होगा। यातायात संसाधनों के रुकने से तमाम व्यापार प्रभावित होगा। निश्चित तौर पर जो भी मिलेगा वह आम आदमी की खरीदने की क्षमता से बाहर होगा। सबसे ज्यादा असर गृहणियों पर पड़ने लगा है।बिना गैस रसोई सूनी हो रही है। विद्युत हीटरों का इस्तेमाल भी किया जाए तो विद्युत भी इतनी मंहगी कि कचूमर निकल जाएगा।भारत जैसे देश में वैसे भी गर्मी के मौसम में पानी के अभाव में बिजली कटौती अधिक होती है।खनिज तेल के साथ गौतम अडानी के हाथ में देश की 80%बिजली भी है।जिसने रुस से आयातित सस्ते तेल ,और गैस को देश में इतना मंहगा बेचा और मुनाफा लिया। वह ऐसे संकट के समय में बिजली कैसे सस्ती कर सकता है।जिसके ख़ून में व्यापार हो।देश के हालात बहुत खराब है। अमेरिका से गाढ़ी दोस्ती ने ईरान को मानसिक तौर पर भारत ने परेशान कर रखा इसलिए उसने गुजरात आ रहे जहाज पर हमला किया।और होर्मुज़ से भारत के जलयानों को रोका है।जबकि ,रुस और चीन को छूट दी गई है।
ईरान की मित्रता खटाई में तो पड़ी ही।रुस भी भारत की विदेश नीति से नाखुश है उसने साफ़ कह दिया है कि जो देश अमेरिकी बर्चस्व को महत्व देंगे उसे वह तेल नहीं देगा। ऐसे कठिनाई भरे दौर में मोदीजी सदन में भी नहीं आ रहे।मुंह छुपाए कब तक रहेंगे। सामने आएं,अपने कृत्यों के लिए माफी मांगे। अमरीका से यारी ख़त्म करें। ईरान की शर्तों को मनवाने चीन,रुस के साथ खड़े हों।वरना अमेरिकी कथित सनकी तानाशाह का भरोसा नहीं वह मध्यपूर्व पर परमाणु बम से हमला कर सब कुछ बर्बाद कर दें। हिरोशिमा और नागासाकी की पीड़ा का अहसास अब तक हमें रुला देता है।यह दंश बहुत जहरीला है इससे उबरने सबको सोचने की ज़रुरत है। रमजान के पाक माह में सभी सही सलामत ईद मना पाएं ऐसी मुहिम बेहद ज़रुरी है। उम्मीद है कुछ रास्ता ज़रुर निकलेगा।






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