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लावारिस नवजात को पुलिस ने” दिव्या “बनाया

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सुसंस्कृति परिहार
आमतौर पुलिस का दमनकारी रूप जनता को देखने मिलता है ‌‌‌लेकिन पुलिस समाज से अलग नहीं होती यह तो उनके अंग्रेजी शासन से चले आ रहे प्रशिक्षण का असर है। पुलिस से डरना और बच्चों को डराना भी हमारे परिवारों में चलन है। इसलिए पुलिस से अपने दिल की बात लोग नहीं पहुंचा पाते ना ही किसी सहयोग की अपील कर पाते हैं। इसलिए जब पुलिस किसी मामलात की तलाश में समाज से जो अपेक्षाएं रखती हैं वह पूरी नहीं हो पाती और कड़ी मेहनत के बाद भी पुलिसिग कामयाब नहीं हो पाती।
बहरहाल, पुलिस को कल्याणकारी होना चाहिए ये ज़रूरी है तभी उसकी अपील को सुना जा सकता है।देश में इतने बड़े पुलिस महकमें में चंद लोग ही ऐसे हैं जिन्होंने जनहित में आगे बढ़कर लोगों को मुश्किल वक्त में ऐसा भरोसा दिलाया कि कई दफ़े साम्प्रदायिक ताकतों को मुंह की खानी पड़ी।कोरोना काल में भी की पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों ने जिस सेवा भाव से काम किया वह हमेशा स्मरण किया जाऐगा तथा लोगों के किस्से कहानियों में गूंजता रहेगा सिर्फ आदेश का परिपालन ही नहीं बल्कि इंसानियत के जज़्बे के साथ काम मायने रखता है।
पिछले दिनों जबलपुर में आधारताल तालाब के पास एक नवजात पड़ी थी जिसके जिस्म को चींटियां नोंच रहीं थीं वह रोए जा रही थी तब अज्ञात राहगीर ने यह खबर आधारताल पुलिस को दी। पुलिस ने देर ना करते हुए उसे शासकीय रानी दुर्गावती चिकित्सालय पहुंचाया। जहां एस एन सी यू में चिकित्सकों के निर्देशन में वह बच्ची स्वास्थलाभ ले रही है। आमतौर पर ऐसी अनेक घटनाओं में आम नागरिकों ने नवजात बच्चों को चिकित्सालय पहुंचाया है। पुलिस सिर्फ अज्ञात मां बाप के खिलाफ मामला दर्ज करती रही है। लेकिन यहां पुलिस ने जिस तरह बच्ची को ना सिर्फ चींटियों से बचाया बल्कि उसे चिकित्सालय पहुंचाकर जिस मानवीय संवेदना का परिचय दिया वह अप्रत्याशित ही नहीं बहुत महत्वपूर्ण है।
 बताते हैं,इस अमानवीय हरकत की पीड़िता नन्हीं मुन्हीं नवजात की खबर जब पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ बहुगुणा तक पहुंची वे अपने को रोक नहीं पाए तुरंत  बच्ची की ज़रूरत का सामान लेकर अस्पताल पहुंच गए।देखते ही देखते एक फेकी गई बच्ची ने मानो आसमान छू लिया।कई  लोगों के दिलों में उसने दस्तक दे दी सब उसकी सुश्रूषा और मदद में लग गए। चिकित्सकीय स्टाफ के साथ पुलिस अधीक्षक महोदय ने उसका नामकरण भी कर दिया वह अपने दिव्य स्वरुप में अब “दिव्या” बन गई है।अब दिव्या को पाने वालों की लंबी लाइन है। चिकित्सकों के मुताबिक अब वह स्वस्थ हो रही है । वहां से उसे कुछ दिनों में मातृछाया शिशु गृह भेजा जाएगा। भविष्य में किशोर बालक बालिका न्याय अधिनियम के तहत उसे उचित अभिभावक को सौंपा जाएगा।वह किसी घर को अपनी किलकारियों से भर देगी ।
कुल मिलाकर जबलपुर पुलिस इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बधाई की पात्र है।यह अन्य जगहों की पुलिस के लिए भी प्रेरणास्पद  है। पुलिस की  संवेदनशीलता और जनकल्याण की भावना से किए ऐसे कार्य ही उसे लोकप्रिय बना सकते है। लावारिस नवजात को पुलिस के साथ ने दिव्या बना दिया।दिव्यता को प्यार और पुलिस और सभी सेवा कर रहे साथियों को सलाम ।

Ramswaroop Mantri

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