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क्या यह भारत का बेस्ट ओलिंपिक होगा?

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मनोज चतुर्वेदी
कोरोना महामारी की वजह से बने अनिश्चितता के माहौल में तोक्यो ओलिंपिक शुरू होने जा रहा है। आयोजकों ने पहले तय किया था कि प्रत्येक स्पर्धा के दौरान स्टेडियम की क्षमता का 50 प्रतिशत या 10000 में से जो भी संख्या कम होगी, उतने ही दर्शकों को स्टेडियम में प्रवेश दिया जाएगा। लेकिन हालात को देखते हुए अब फैसला हुआ है कि स्टेडियम में दर्शक होंगे ही नहीं। खिलाड़ियों को न केवल बिना दर्शकों के बेहतर प्रदर्शन करने के लिए खुद को प्रेरित करना होगा बल्कि कोरोना से बचे रहने के अतिरिक्त प्रयास भी करने होंगे। नए नियमों के मुताबिक फाइनल में पहुंचने के बाद कोरोना से संक्रमित होने पर पदक खोने का खतरा रहेगा। इसलिए खिलाड़ियों पर इस बार इसका अतिरिक्त दवाब होगा।

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारतीय टीम भी 2016 के रियो ओलिंपिक से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद के साथ जा रही है। जहां तक ओलिंपिक में भारतीय प्रदर्शन की बात है तो वह चमकदार तो कतई नहीं है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश ने 121 सालों के ओलिंपिक इतिहास में कुल जमा 28 पदक जीते हैं, जिनमें नौ स्वर्ण पदक शामिल हैं। इनमें से हॉकी में जीते आठ स्वर्ण पदक को निकाल दें तो बाकी खेलों में सिर्फ एक स्वर्ण पदक हमारे नाम है, जिसे निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने 2008 के पेइचिंग ओलिंपिक में जीता था। दूसरी तरफ अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स चार ओलिंपिक खेलों में भाग लेकर 23 स्वर्ण सहित 28 पदक जीत चुके हैं। इससे भारत की स्थिति को अच्छे से समझा जा सकता है।

हॉकी में राष्ट्रीय प्रदर्शन में गिरावट आने के बाद से कई ओलिंपिक खेलों में हमारा दल खाली हाथ लौटा है। 1996 के अटलांटा ओलिंपिक में लिएंडर पेस के टेनिस सिंगल्स में कांस्य पदक जीतने के बाद से इतना जरूर हुआ कि हम हर ओलिंपिक से पदक के साथ लौटे। 2012 के लंदन ओलिंपिक में पहली बार भारतीय दल ने छह पदक जीते तो लगा कि अब हम सही राह पर बढ़ने लगे हैं। लेकिन चार साल बाद रियो ओलिंपिक में हम फिर दो पदकों पर आ गए। अब पांच साल बाद हो रहे तोक्यो ओलिंपिक में जरूर दहाई संख्या में पदक जीतने की उम्मीद की जा रही है, लेकिन जरूरत इन उम्मीदों को पदक में बदलने की है।

भारत 18 खेलों के 119 खिलाड़ियों को तोक्यो भेज रहा है, लेकिन पदकों के लिहाज से देखें तो बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाजी, हॉकी और मुक्केबाजी ही ऐसे खेल हैं, जिनमें उम्मीद की जा सकती है। यह सही है कि कोरोना की वजह से खिलाड़ी इस बार अच्छी तरह तैयारी नहीं कर पाए हैं, पर यह स्थिति दुनिया के ज्यादातर देशों के खिलाड़ियों की है। इस माहौल में कितने नए विश्व और ओलिंपिक रेकॉर्ड बनते हैं, यह देखने वाली बात होगी। महामारी की वजह से ओलिंपिक क्वालिफाइंग प्रतियोगिताओं का आयोजन नहीं किया जा सका, जिसके कारण कई खिलाड़ियों का तोक्यो जाने का सपना टूट गया। ऐसे खिलाड़ियों में लंदन ओलिंपिक की कांस्य पदक विजेता सायना नेहवाल और किदाम्बी श्रीकांत भी शामिल हैं।

भारतीय पदक उम्मीदों की बात करें तो जेहन में पहला नाम देश की स्टार शटलर पीवी सिंधु का आता है। वह रियो ओलिंपिक की रजत पदक विजेता हैं। कड़े संघर्ष में केरोलिना मारिन से स्वर्ण पदक का मुकाबला वह हार गई थीं। लेकिन इस बार वह बेहतर तैयारियों के साथ जा रही हैं। सिंधु ने इस साल ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन और स्विस ओपन में भाग लिया है। उन्होंने पिछले तीन चार महीनों में दक्षिण कोरियाई कोच पार्क तेई सेंग की देखरेख में बढ़िया तैयारी की है। वह हर दिन ट्रेनिंग में खिलाड़ी बदलकर अभ्यास करती रही हैं, ताकि ओलिंपिक में विभिन्न स्टाइल वाली खिलाड़ियों के खिलाफ खेलने में दिक्कत ना आए।

मुक्केबाजी में 2008 में विजेंदर ने कांस्य पदक जीतकर युवाओं को इस तरफ आकर्षित किया था। इस बार अमित पंघाल और एमसी मैरिकॉम को पदक का मजबूत दावेदार माना जा रहा है। मैरिकॉम 2012 के लंदन ओलिंपिक में कांस्य पदक जीत चुकी हैं। यह उनका आखिरी ओलिंपिक होगा। इसलिए वह इसे यादगार बनाने में कोई कसर छोड़ने वाली नहीं हैं। अमित विश्व चैंपियनशिप के पदक विजेता हैं और वह फ्लाइवेट वर्ग में विश्व के नंबर एक मुक्केबाज के तौर पर ओलिंपिक रिंग में उतरने जा रहे हैं। हमारे बाकी मुक्केबाज भी कम नहीं हैं, लेकिन वे अपनी चुनौती को कहां तक ले जा पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

निशानेबाजी में भी हमारी स्थिति अच्छी है। माना जाता है कि हमारे निशानेबाज विश्वस्तरीय हैं, जिसे वह विश्व चैंपियनशिपों में धमाकों से साबित भी करते रहते हैं। भारत के 15 निशानेबाजों ने ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई किया है। यह उनके दबदबे को दर्शाता है। इस बार आयोजित होने वाले मिश्रित वर्ग में एयर पिस्टल में मनु भाकर और सौरभ चौधरी, यशस्विनी सिंह देसवाल और अभिषेक वर्मा की जोड़ियां और मिश्रित टीम राइफल में देवांश सिंह पंवार और इलावेनिल की जोड़ी पदक ला सकती है। भारत को व्यक्तिगत वर्ग में भी पदक मिलने की अच्छी संभावनाएं हैं।

भारत के लिए एक अच्छी बात यह है कि लंबे समय बाद हॉकी टीम को पदक का मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसकी वजह पिछले दो सालों में तमाम दिग्गज टीमों को फतह करना और विश्व की चौथी रैंकिंग की टीम के तौर पर भाग लेना है। इसके अलावा विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया की अगुआई वाला कुश्ती दल, तीरंदाज दीपिका कुमारी और जेवेलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा को भी भाग्य का साथ मिल जाए तो वे पोडियम पर चढ़ते दिख सकते हैं। भारतीय खिलाड़ियों की तैयारियों को देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि इस बार हम अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके लौटें तो अचरज नहीं होगा।

Ramswaroop Mantri

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