यूँ ही नहीं बन जाती कोई फुल्लन
दलितों उत्पीडितों की नजर में देवी ।
उसकी पहली शर्त है
फुल्लन अर्थात मादा होना
दूसरी किसी दलित के यहाँ पैदा होना
और तीसरी है गरीब होना।
कुल मिला कर यह
इस बात का प्रमाण भी है
कि तुमने चाहे कोई अपराध किया हो या नहीं
तुम जन्मना अपराधी हो
और
वो जो तुम से इतर हैं
उनके पास अधिकार हैं
तुम्हे दण्डित करने के लिए।
तुमने खायी होती है
उन्हीं की जूठन
जिससे निर्मित तुम्हारे
शरीर पर वे समझते हैं
अपना पुश्तैनी हक,
तुम पहने होती है
उन्हीं की उतरन
जिसे उतारकर
वे तुम्हें गाँव में नंगा
नचवा सकते हैं
और
कर सकते हैं तुम पर
सामूहिक बलात्कार ।
फुल्लन से
फुल्लन देवी बनने की यात्रा में
रखना होता है
खुद को जिन्दा ।
जिन्दा रहने के लिए जीवित रखनी होती है,
अपने अंदर की आग
उतर जाना होता है,
माँ चम्बल की गोद में
भूखे प्यासे नंगे पाँव
निर्जन घाटियों में
तलाशते हुए
अपनी ही तरह के मनुष्यों को
जिनके दिल में भी
जल रही हो
ठीक वैसी ही आग
जिसने बना दिया हो उन्हें डाकू।
डाकू हो जाना
सिर्फ डाकू हो जाना नहीं होता,
डाकू होने से पहले
होना होता है
अपमानित
झेलना पड़ता है
कायर होने का कलंक
कहलाना होता है
रणछोड़
उतर जाना होता है
कहीं दूर
नवद्वारका बनी
चम्बल की घाटियों में ,
रचना होता है
अपना धर्म – युद्ध
कुरुक्षेत्र बेहमई में ।
देवी होने के लिए
विजेता होना
एक आवश्यक शर्त है
जिसके लिए करनी होती है
शेर पर सवारी।
रामकिशोर मेहता ,संपर्क - 919408230881,ईमेल - ramkishoremehta9@gmail.com
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,




