मध्य प्रदेश के कई किले आज भी रहस्य का पर्याय बने हुए हैं. ऐसा ही एक किला है बजरंगगढ़ किला . गुना जिले में मौजूद बजरंगगढ़ किले के बारे में कहा जाता है कि इसकी दीवारों पर पारस पत्थर लगा हुआ है. लोहा इसकी दीवारों को छूते ही सोना बन जाता है. इन तमाम दावों-अफवाहों के बीच पुरातत्व विभाग ने इसका जीर्णोद्धार करने का फैसला लिया था. लेकिन, फिलहाल इसकी हालत खस्ता है. सोने के चक्कर में लोगों ने इस किले की दीवारों को ही ढहा दिया है

यह किला गुना के आरोन रोड पर स्थित है. इसे झारकोन के नाम से भी जाना जाता है. यह किला गुना से 8 किमी दक्षिण-पश्चिम में बना है. इस किले में तोपखाना, रंग महल और मोती महल भी हैं. भले ही आज यह किला पूरी तरह नष्ट हो गया हो, लेकिन देखने में अभी भी अद्भुत है. इससे यहां आने वाले पर्यटक रोमांचित होते हैं.

पुरातत्व विभाग 2 साल पहले तक इस किले का जीर्णोद्धार कर रहा था. लेकिन, फिलहाल ये काम बंद है. इस पर अभी तक करीब 3 करोड़ रुपए खर्च कर परकोटा, अंदर के हिस्से और दरवाजों को ठीक किया गया. किले के एक हिस्से में नदी, दूसरे में पहाड़ी है. जैसे-जैसे ये किला लोगों के बीच प्रसिद्ध होता गया, वैसे-वैसे इसकी हालत खस्ता होने लगी.विज्ञापन

तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगीं. कोई कहने लगा कि एक आदमी ने दीवार से लोहा लगाया तो वह सोने का हो गया. इस तरह की कई अजीब बातें चारों ओर फैल गईं. लोगों को यकीन होने लगा कि इसकी दीवारों में पारस पत्थर है. इसके बाद लोगों ने किले की दीवारें पूरी तरह खोद दीं. किसी को पारस पत्थर तो नहीं मिला, लेकिन किले को बहुत नुकसान हुआ.

बजरंगगढ़ किले के पास दो इमारतें और हैं. इनका इस्तेमाल शिकार करने और निगरानी रखने के लिए किया जाता था. ये दोनों शिकारगाहें नदी के करीब और किले से 1 किमी दूर बनी हैं. बताया जाता है कि 50 साल पहले यहां घना जंगल मौजूद था. उस जंगल में ये दोनों इमारतें छिपी हुई थीं. किले की मरम्मत के लिए 2011 में बजट स्वीकृत किया गया. काम 2014 में शुरू हुआ. 1710 और 1720 के बीच इस किले का निर्माण राघौगढ़ के शासक धीरसिंह के बेटे विक्रमादित्य ने कराया था. 1776 में राजा बलवंत ने किले के मुख्य द्वार को बनवाया. 19वीं सदी में इस पर फांस ने हमला किया और ये तहस-नहस हो गया.




