शशिकांत गुप्ते
ईस्वी सन 2022 की शुरुआत हो गई। हम अपने धर्म के प्रति निष्ठावान है। हम इस नववर्ष को नहीं मानते है। फिर भी हमे अपने हर घर में कैलेंडर बदलना हमारी मजबूरी है।
हमारा नव वर्ष चैत्र माह की शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। चैत्र माह की शुल्कपक्ष की एकम कब आएगी, यह तो हमे अंग्रेजी तारीख से ज्ञात होता है। हम अपना जन्मदिन तिथि से मनाना चाहतें हैं, लेकिन हमारी जन्म तिथि किस अंग्रेजी तारीख को आएगी यह भी हमे अंग्रेजी कैलेंडर से ही ज्ञात होता है।
हम धर्म के प्रति आस्थावान रहते हुए भी, उदारहृदय हैं। हम भलेही अंग्रेजी नववर्ष को मान्यता न दे लेकिन अपने आत्मीय स्नेहियों को Happy New Year, कह कर नववर्ष की शुभकामनाएं देना नहीं भूलते हैं।
हम अंग्रेजी नववर्ष का विरोध करतें हैं।लेकिन अंग्रेजी नववर्ष पर अपने प्रसिद्ध मन्दिरों में दर्शनार्थ जातें ही हैं।
अंग्रेजी नववर्ष पर मन्दिरों में दर्शनार्थ कतार में खड़े होकर दर्शनलाभ प्राप्त करने के लिए हम अपने ही स्नेहियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करतें हैं। पहले कौन पुण्य कमाएगा? क्षमा करना कमाएगा यह व्यापारिक शब्द है, इसे डिलीट कर दीजिए और पहले कौन पुण्य प्राप्त करेगा इस तरह पढ़िएगा? इस पुण्यप्राप्ति की प्रतिस्पर्द्धा में कभी कभी मानवीय भूल हो जाती है,और एक दूसरे से होड़ लगाने में स्वाभविक ही भगदड़ मच जाती है। इस भगदड़ में बहुत से पुण्य वान भगवान के दर्शन के पूर्व ही परलोक सिधार कर स्वर्गवासी हो जातें हैं। इस भगदड़ का कारण जो भी हो लेकिन व्यवस्था और आमजन में एक दूसरें पर अरोपप्रत्यारोप का औपचारिकता का निर्वाह होता ही है। यह अंतहीन और बगैर निर्णय की बहस होती है।
हम अपनी आस्था अस्मिता को कभी भी कम नहीं होने देतें हैं।
त्रेतायुग में भगवान राम ने दैत्यराज रावण से भलेही जमीन पर खड़े होकर युद्घ किया हो,हम कलयुग में रथ पर सवार होकर रामजी के मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन करतें हैं।
हम अंग्रेजी का भले ही विरोध करें लेकिन हम अपनी पाठशाला में अंग्रेजी भाषा को आंग्लभाषा संबोधित कर पढातें हैं।
जो भी हो हम अंग्रेजी नववर्ष का विरोध करतें हैं, करते रहेंगे।
हमें अपनी संस्कृति की चिंता है।
हम महंगाई, शिक्षा,चिकित्सा, आदि मूलभूत समस्याओं को दरकिनार कर मंदिर निर्माण को प्राथमिकता देतें है।
यदि हमारे देश में धार्मिक स्थल नहीं होंगे तो हमारे देश के दानवीर अपने मुक्तहस्त से दान कहाँ करंगे।
हम अपनी आस्था को प्रमाणित करने के लिए मंदिर परिसर के बाहर याचक बन कतार में खड़े भिखारियों को भीख देकर पुण्य प्राप्ति के अधिकारी बन जातें हैं।यह एक अहम प्रश्न है,यदि देश में भिखारी नहीं होंगे तो हम भीख किसे देंगे।इसीलिए भिखारियों का होना अनिवार्य है।
हमारे देश के धार्मिक आस्थावान राजनेता और जनप्रतिनिधियों के सौजन्य से आमजन, तीर्थस्थानों की मुफ्त यात्रा का लाभ प्राप्त करतें है।
हमारी धार्मिक आस्था को प्रमाणित करने के लिए ऐसे अनगिनत प्रमाण है।
एक आस्थावान धर्मप्रेमी युवक ने एक ज्योतिषी से मोबाइल पर संपर्क किया और पूछा कि 6 दिसम्बर 1992 को मेरा जन्म दिन है,पंडितजी जरा पंचाग खोलकर बताइए कि,इस दिन कौन सी तिथि थी? मुझे अपना जन्म दिन तिथि को ही मनाना है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





