अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

भात-भात करते भूख से मरते बच्चों के देश में गणतंत्र दिवस मनाने की व्यर्थता !

Share

निर्मल कुमार शर्मा

गणतांत्रिक देश उस देश को कहते हैं, ‘जिसकी सत्ता जनसाधारण में समाहित हो ! गण मतलब जन समूह और तंत्र मतलब शासन व्यवस्था यानी जनता द्वारा जनता के लिए,सभी नागरिकों को बराबरी और सभी को न्याय पाने,रोटी और शिक्षा पाने का समान अधिकार प्रदान करता हो,वही शासन प्रणाली गणतांत्रिक प्रणाली कहलाने का अधिकारी है ! ‘
इस देश को गणतंत्र बनने के 73 वर्षों बाद भी क्या उक्तवर्णित परिभाषा पर भारत की गणतांत्रिक प्रणाली अभी तक खरी उतर पाई है ? इसका जबाब है बिल्कुल नहीं ! ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों की गुलामी से मुक्ति के बाद इस देश की सत्ता फिसलकर देशी साम्राज्यवादियों और चंद पूँजीपतियों की गोद में जा गिरी है !

Republic Day 2020: 26 January History, Importance, Significance, Facts Know  All About Republic Day - India Republic Day: जानिए गणतंत्र दिवस का इतिहास,  महत्‍व और रोचक तथ्‍य | Education News In Hindi

इस देश में अभी भी इतनी विकराल आर्थिक असमानता और बेइमानी तथा नाइंसाफी है कि एक तरफ भूख से बिलबिलाते हुए नन्हें बच्चे ‘भात-भात की रट लगाए हुए ‘ भूख से दम तोड़ देते हैं,किसान अपनी फसलों की जायज कीमत की रट लगाए हुए वर्षों इस देश की राष्ट्रीय राजधानी के चारों तरफ बैठने को बाध्य किए जाते हुए 750 किसानों की मौत हो जाती हो ! दूसरी तरफ एक-दो पूँजीपतियों की प्रतिदिन की आमदनी 36.71 करोड़ की हो ! ऐसा नहीं है कि ये प्रतिदिन करोड़ों की कमाई करनेवाले बहुत ही काबिल और कर्मठ हों, ऐसा बिल्कुल नहीं है,अपितु उनके उस बड़े आर्थिक साम्राज्य बनाने में देश के कर्णधारों की उनको देश के संसाधनों को लगभग लुटा देने की,की गई उदारता से ही उनका आर्थिक साम्राज्य का इतना विस्तार हुआ है ! यहाँ की व्यवस्था में न्यायालय,सेना,पुलिस और सरकारी मशीनरी का पूरा ताम-झाम केवल कुछ धनी और ताकतवर लोगों के कुछ समूहों की सुरक्षा के लिए दिन-रात काम करतीं हैं ! यहाँ का न्याय व्यवस्था कुछ धनी और ताकतवर लोगों की सुरक्षा में हाथ बाँधे खड़ी रहती है ! स्वतंत्रता के बाद आपने इन बीते 75 सालों में किसी अमीर और धनी व्यक्ति को उसके किए जघन्यतम् अपराध के लिए भी मौत की सजा पाते हुए देखा है ? कभी भी नहीं ! क्योंकि हमेशा यहाँ के न्यायालय एक कमजोर, निर्बल और निर्धन व्यक्ति को फाँसी पर चढ़ देते हैं ! प्रश्न है कि क्या केवल गरीब और निर्धन व्यक्ति ही अपराधिक कृत्य करते हैं ? ऐसा बिल्कुल नहीं है,होता यह है कि एक धनी व्यक्ति गंभीर से गंभीरतम् अपराध करके भी मंहगे से मंहगे वकील करके अपने किए गंभीरतम् अपराध से भी बच निकलते हैं,जबकि एक गरीब बेरोजगारी से त्रस्त व्यक्ति, जिसे दो जून खाने को मयस्सर नहीं है,वह मंहगा वकील कर ही नहीं सकता इसलिए अंधे जज उसे आसानी से सूली पर चढ़ा देते हैं ! उस स्थिति में इस व्यवस्था की कथित न्याय व्यवस्था कतई न्यायपरक व्यवस्था नहीं है अपितु न्याय के नाम पर एक ढोंग है ! उसी प्रकार पुलिस और सेना का भी दुरूपयोग हमेशा धनी व ताकतवर लोगों के पक्ष में और गरीबों के हमेशा मुखालफत और दमन के लिए ही होता है !


दुनिया में आज हमारी स्थिति बहुत ही हास्यास्पद और दयनीय हो गई है । हम और हमारे नेता वास्तविकता के धरातल पर अपनी हालात का आकलन न करके,केवल उसे छुपाने और झूठ बोलकर अपने को कथित विश्वगुरू और आध्यात्मिक गुरू आदि भ्रामक और काल्पनिक बातें करके स्वयं को श्रेष्ठ मान लेने का भ्रम पालकर शुतुरमुर्ग जैसे खतरे का आभास होने पर रेत में अपना मुँह छिपा लेने मात्र से खतरा टल जाता है ! जैसी ग्रंथि पाल लिए हैं ! हम अपनी वर्तमान स्थिति का ईमानदारी से आकलन करके उसका निराकरण न करके उसे कुशलता से झूठ बोलकर, ढकने और छिपाने के कार्य में बहुत कुशल और पारंगत हैं !
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी विश्व खुशहाली सूची के 156 देशों में अपने भारत महान की दयनीय हालत देख-सुनकर रोना आ जाता है ! देश के कर्णधारों के कथित सबका सबका साथ सबका विकास को मुँह चिढ़ाता और आइना दिखाता ये रिपोर्ट भारतीय समाज में व्याप्त सुशासन,प्रति व्यक्ति आय,स्वास्थ्य,जीवित रहने की उम्र,भरोसा,सामाजिक सहयोग,स्वतंत्रता और उदारता की दयनीय स्थिति की पोल खोल के रख देता है । सबसे दुखद यह है कि वर्तमान सत्ता के कर्णधारों द्वारा अपने पालतू और चमची मिडिया द्वारा विकास का लाख ढिंढोरा पीटने के बावजूद भारत की स्थिति पिछले सालों में अपेक्षाकृत बद से बदतर होती गई है,मसलन भारत इस खुशहाली सूची में 2016 में 118 वें,2017 में 122 वें, 2018 में 133 वें और इस साल और लुढ़क कर 140 वें स्थान के दयनीय पायदान पर जा पहुंचा है !
वास्तव में इस देश के राजनैतिक कर्णधारों के स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दो-ढाई दशकों के बाद से ही राजनीति का मतलब आम आदमी के सुखदुख,शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार आदि से ध्यान पूर्णतः हटकर खुद के विलासितापूर्ण जीवन और अरबों-खरबों रूपये विदेशों में जमाकर,राजनीति को पूर्णतः एक कमाई का पेशा बना लेना है । देश की खुशहाली का मतलब देश के हर गरीब से गरीब नागरिक को कम से कम भोजन,वस्त्र और सिर ढकने का एक अदद घर मिल जाने की सुनिश्चिंतता तो रहनी ही चाहिए ! केवल अरबपतियों की संख्या बढ़ाने वाली दुर्नीति और उस पर स्वयं अपनी पीठ थपथपा लेने से देश के लोग खुशहाल कैसे हो जायेंगे ? इसके विपरीत इन संवेदनहीन राजनीति करने वाले भारतीय नेताओं को सह अस्तित्व,भाई-चारे,अमन-चैन, मिल-जुलकर कर शांतिपूर्वक रहने वाले भारतीय समाज में धार्मिक और जातिगत् वैमनस्यता और विग्रह पैदाकर दुखदरूप से दंगे-फसाद फैलाकर अपने वोट की फसल काटने का दुष्कृत्य करने में जरा भी संकोच नहीं है ! इसी प्रकार इस देश की लगभग आधी आबादी मतलब लगभग 60 करोड़ किसानों को उनके द्वारा पैदा फसल को उचित मूल्य न देकर आत्महत्या करने को बाध्य करना ! उससे भी गंभीर अपराध, किसानों द्वारा उत्पन्न 40 प्रतिशत खाद्यान्न को जानबूझकर उचित भंडारण सुनिश्चित न कर,हर साल सड़ाकर,इसी देश के लगभग 20 करोड़ लोगों को रात में भूखे पेट सोने को बाध्य करने जैसे कुकृत्यों ने भारत को इस दयनीय स्थिति में ला खड़ा कर दिया है !
आखिर 60 करोड़ दुःखी किसानों और प्रतिदिन 20 करोड़ भूखे सो जाने वाले लोगों मतलब कुल मिलाकर 80 करोड़ लोगों से हम खुश रहने की आशा कैसे कर सकते हैं ? इस देश में गलत नीतियों की वजह से कितना विरोधाभास है कि एक तरफ कुल 135 करोड़ लोगों में 80 करोड़ लोग मतलब लगभग 59 प्रतिशत लोग भूख से बिलबिला रहे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं,वहीं कथित आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे इसी देश में दूसरी तरफ मुकेश अंबानी प्रतिदिन 36.71 करोड़ की सरकारी मदद से कमाई कर रहा है !
सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हमारे देश में सब कुछ प्रचुर मात्रा में रहते हुए भी,यहाँ के लोगों को जानबूझकर दुखी और वंचित करने का एक मात्र कुकृत्य यहाँ के भ्रष्ट,पतित,अपराधी व्यभिचारी,क्रूर और असहिष्णु कथित नेताओं की दुर्नीतियों की वजह से हो रहा है ! जब तक यहाँ की राजनीति में अपराधियों,माफियाओं,झूठों, मक्कारों जुमलेबाजों,दंगाजीवियों,हत्यारों,मॉफियाओं, गुँडों, मवालियों और लंपटों का वर्चस्व रहेगा,तब तक इस देश के बहुसंख्या में लोग हमेशा दुखी रहेंगे । इस दुखद स्थिति में तभी सुधार होगा,जब इस देश का नेतृत्व युवा,कर्मठ ,ईमानदार,सच्चरित्र,शिक्षित वर्ग के हाथों में सत्ता आ जाये,नहीं तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह देश इन सत्ता-पिपासुओं के हाथों अगले सालों में इस देश को खुशहाली की सूची के 156 वें अन्तिम पायदान पर भी पहुँचने को अभिशापित होना पड़ जाय ! पूरे देश की जनता एक तरफ भूख,गरीबी, अशिक्षा,बेरोजगारी, कुपोषण आदि गंभीरतम् और मूलभूत समस्याओं से त्रस्त रहे और दूसरी तरफ दिल्ली के बोट क्लब पर कुछ रईसों के समूह और उनके दलाल सत्ता के कर्णधारों के रंगारंग गणतंत्र दिवस मना लेने मात्र से यह देश कतई गणतांत्रिक देश कभी भी नहीं बन पाएगा !

निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड,अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक,पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ‘, गाजियाबाद, उप्र,

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें