शशिकांत गुप्ते
किसी व्यक्ति के जहन में भ्रम पैदा करना होतो एक कहावत है चने के झाड़ पर चढ़ाना। मतलब व्यक्ति की बनावटी स्तुति करना।
कुछ लोग स्तुति प्रिय ही होतें हैं।
ऐसे लोग स्वयं भ्रमित होतें हैं और भ्रम फैलातें हैं। ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है। अपने मुँह मिया मिठ्ठू बनना ये लोग हमेशा यथार्थ से भयभीत रहतें हैं। सदा भ्रम में ही रहतें हैं। ऐसे भ्रमित लोगों के लिए प्रख्यात सहाय दुष्यन्त कुमार का यह शेर मौजु है।
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
हमेशा यथार्थ से अवगत रहना चाहिए कारण भ्रम हमेशा क्षण भंगुर रहता है।
यदि भ्रम को जहन से हटाया नहीं गया तो ऐसे लोग अनावश्यक ग़ुरूर में रहतें हैं।
ऐसे लोगों के लिए शायर दुष्यन्त कुमार फ़रमाते हैं।
रौशन हुए चराग़ तो आँखे नहीं रहीं
अंधों को रोशनी का गुमाँ और भी खराब
ऐसे आँखों के अंधे और नाम नयन सुख लोगों के कारण ही सियासतदान वादों को जुमलों में बदल ने का साहस कर पाते हैं।इनदिनों विकास और प्रगति कागजों पर ही बेतहाशा दिखाई जा रही है।
यथार्थ में प्रगति विभिन्न प्रकार की प्रताड़नाएं सहन करती है। यहॉ तक स्वयं के देह शोषण का भी शिकार हो जाती है।
विकास यदि किसी रसूखदार का सपूत होतो दिन चौगुनी और रात आठ गुनी रफ्तार से तरक्की करता है। आम आदमी के बेटे का नाम विकास हो तब निश्चित ही वह बेरोजगरों की संख्या में इजाफा करता नजर आएगा।
वह कितना भी पढ़ ले,उसे रसायन शास्त्र के स्वयम्भू विशेषज्ञ द्वारा नाली के गैस से ईंधन तैयार कर पकौड़े तलने की सलाह दी जाएगी।
कुछ लोग होतें हैं, जो हरक्षेत्र में कुछ ही होतें हैं। स्वतंत्रता संग्राम में ये लोग कुछ ही थे। इनमें जुनून होता है। ये लोग व्यवस्था परिवर्तन के लिए सतत प्रयत्नशील रहतें हैं। सिर्फ सत्ता परिवर्तन इनका लक्ष्य नहीं रहता है।
इनलोगों के पास पर्याप्त धैर्य होता है। यह लोग Quantity मतलब संख्या में भलेही कम हो लेकिन Quality मतलब गुणवत्ता में बेमिसाल होतें हैं।
ऐसे लोगों के साहस को बल देने के लिए दुष्यन्त कुमार जी का ही यह शेर है।
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मै इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं
शशिकांत गुप्ते इंदौर





