अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

कश्मीर के लिए एक मित्र का आह्वान : आओ मरहम लगायें

Share

पुष्पा गुप्ता

 _मैं कश्मीर में रहा हूं। नफरत की हिंसा में मैंने वहां अपने दोस्तों को खोया है। अपने सामने चिथड़े शरीरों को देखा है। आप को मेजर पुरुषोत्तम की कहानी सुनाता हूं :_
     तब मैं रिपोर्टिग करता था। एक सुबह मुझे कारगिल जाना था। घुसपैठिया युद्ध शुरू हो चुका था। मैंने सुबह दिल्ली से इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट ली। हमारा विमान श्रीनगर पहुंचा। वहां से सीधे हम लाल चौक स्थित अहदूस होटल पहुंचे। हमें कारगिल के लिए निकलना था। कारगिल जाने के लिए तब कोई तैयारी नहीं थी। हमारे साथ उसी होटल में और भी कई पत्रकार ठहरे थे। 
    _किसी पत्रकार ने बताया कि संजय, कल तुम मेरे साथ बादामीबाग छावनी चलना। वहां मेजर पुरुषोत्तम से मिलना। वो सेना के जनसंपर्क अधिकारी हैं। पत्रकारों की खूब मदद करते हैं। अगली सुबह मैं बादामीबाग छावनी में था।_
  मेरे सामने एक मुस्कुराता हुआ नौजवान खड़ा था। 

“हैलो, मिस्टर सिन्हा, मैं मेजर पुरुषोत्तम।”
“जी आपकी बहुत तारीफ मैंने सुनी है।”
“पता नहीं तारीफ वाली क्या बात है, पर आपको जब भी यहां श्रीनगर में किसी चीज की ज़रूरत हो, तो आप मुझसे मिल सकते हैं।”
“फिलहाल तो मैं सिर्फ कारगिल जाना चाहता हूं।”
“ओह! अभी तुरंत तो संभव नहीं। पर मैं आपको भिजवा दूंगा। अभी आप श्रीनगर के मज़े लीजिए।”
“श्रीनगर में मज़ा कैसा? यहां तो आए दिन फायरिंग होती है।”
“ओह! आप इतने से घबरा गए? हमें देखिए, जरा भी घबराहट नहीं होती। दोस्त, ये श्रीनगर है।”
“मेजर साहब, आपको तो शायर होना चाहिए था। कहां फौज में फंस गए?”
“यार, फौज से अच्छी कोई नौकरी नहीं। यहां आदमी पूरे टिप-टाप में रहता है। गोली लग जाए तो आदमी एकदम टिप-टाप मरता है। किसी सैनिक को कभी बिस्तर पर पड़े-पड़े खांसते हुए मरते देखा है? एक सैनिक को आप संसार के किसी कोने में भेज दीजिए, वो खुद को फंसा हुआ महसूस नहीं करता। और ये तो कश्मीर है। वही कश्मीर जिसके लिए कहा जाता है कि अगर संसार में कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। मैं स्वर्ग में हूं।”

पहली ही मुलाकात में मैं समझ गया था कि ये शख्स बहुत बिंदास और दिलचस्प है। मेरी समझ में ये बात भी आ चुकी थी अगर मुझे कारगिल तक पहुंचना है, तो यही आदमी मदद कर सकता है।
वो गर्मी का मौसम था। श्रीनगर में भी ठंड नहीं थी। हम अहदूस होटल से निकलते, दिन भर श्रीनगर और आसपास के इलाकों में रिपोर्टिंग करते और कारगिल जाने को बेचैन रहते। अगले दिन मेजर पुरुषोत्तम का फोन आया। “सिन्हा, कल तुम कैमरा टीम तैयार रखना। कारगिल निकलना है।”
बाकी की कहानी आपको मुझसे अधिक पता है। सैनिक वहां सिर्फ दुश्मनों से लोहा भर नहीं ले रहे थे, हम पत्रकारों की भरपूर मदद भी कर रहे थे।
कारगिल से टीवी पर खूब रिपोर्टिंग हुई। हमारे दफ्तर को अंदाज़ा था कि कारगिल में काफी मुश्किल हालात हैं, इसलिए कई टीम बना दी गई और तय हुआ कि बारी-बारी से टीम आती-जाती रहे।

मैं कारगिल से वापस श्रीनगर पहुंचा, दिल्ली से दूसरी टीम वहीं अहदूस होटल पहुंच चुकी थी। मेरे साथी ने मुझसे पूछा कि कारगिल कैसे पहुंचना होगा।
मैंने बताया था कि अपने मेजर पुरुषोत्तम हैं न! चलो मिला देता हूं।
शाम को मैं अपने साथी को लेकर मेजर से मिलने गया। मेजर साहब एकदम प्रसन्न भाव से मिले। “चिंता न करो, जी। भिजवा देंगे। बताओ क्या लोगे?”
“चाय।”
“यार, चाय?”
मेरे दोस्त ने मुझे कोहनी मारी। “यार मैं तो दिल्ली से निकला था बहुत टेंशन में कि पता नहीं श्रीनगर में क्या हालात हों। एयरपोर्ट से होटल तक पहुंचने में मेरी जान निकली पड़ी थी। दिल्ली में बैठ कर और टीवी पर खबरें देख कर तो मेरा दम निकला पड़ा था। पर यहां तो मेजर साहब से मिल कर सारी टेंशन गायब हो गई।”
मैंने कहा कि हां, मैं भी पहली बार मिला हूं। ये बंदा बड़ा खुशदिल है। अपने साथी को मेजर से मिलवा कर मैं दिल्ली के लिए निकल पड़ा।

कारगिल युद्ध खत्म हो चुका था। हम जीत गए थे। आज मैं यहां ये बयां नहीं करने जा रहा कि कितने सैनिक हमारे शहीद हुए थे। कितनी लाशें मैंने खुद देखी थीं। कारगिल की कितनी विधवाओं से मैं खुद मिला था। कइयों के छोटे-छोटे बच्चों को मैंने मां से ये पूछते हुए खुद सुना था कि पापा की फोटो टीवी पर क्यों आ रही है? टीवी मीडिया उन दिनों नया-नया था। एक-एक कर सारी टीमें वहां गई थीं। खूब रिपोर्टिंग हुई। कभी लिखने बैठा तो मैं तब सेना अध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक के साथ सीमा तक की उन यात्राओं और यादों को भी जरूर आपसे साझा करूंगा। बताऊंगा कि एक सैनिक को शहीद कह देना जितना आसान होता है, उसके पीछे की ज़िंदगी उतनी आसान नहीं रह जाती है।

फिलहाल मेजर पुरुषोत्तम की कहानी।
युद्ध खत्म हो चुका था। आतंक नहीं। श्रीनगर भितरघात का शिकार था। हालात का जायजा लेने के लिए हम एक बार फिर श्रीनगर में थे। फिर उसी अहदूस होटल में। लाल चौक पर आए दिन धमाके हुआ करते थे। पर हमें किसी बात का डर नहीं था। अपने पास मेजर पुरुषोत्तम थे।

मैं दिन भर रिपोर्टिंग करता और शाम को मेजर से मिलता। उनके पास पत्रकारों का जमावड़ा लगा रहता। संसार की सारी खबरें उनके पास होतीं। मैंने कई बार देखा, कोई नया पत्रकार कहीं से उनका नाम पूछता हुआ उनके पास पहुंचता, तो वो उससे ऐसे मिलते, मानो वर्षों से जान पहचान हो। इतनी गर्मजोशी उनके चेहरे पर होती कि आदमी भूल जाता कि वो फिलहाल जिस शहर में है, वो बारूद के ढेर पर है। हम बादामी बाग इलाके में होते, तो लगता कि यहां कोई क्या कर लेगा। ये तो श्रीनगर की सबसे महफूज जगह है।
श्रीनगर में सर्दी शुरू हो चुकी थी। वो एक दिन था। आतंकवादियों ने बादामी बाग छावनी पर हमला कर दिया था। कुछ पत्रकार वहां उनसे मिलने गए थे। वो उनके साथ बैठे थे। तभी अचानक धमाका हुआ था।

उस धमाके में हमारा मेजर शहीद हो गया। जबलपुर का वो नौजवान,जो कहता था कि सैनिक को कहीं भी भेज दो, वो खुश रह लेगा, अब नहीं था।
कारगिल में किसी पहाड़ी पर चढ़ कर सीमा पार से बम लुढ़का कर भारत की सीमा में गिरा देना आसान था। पर यहां श्रीनगर में नाक के नीचे भला कैसे कोई इस तरह गोला-बारूद से लैस होकर घर में घर में घुस कर हमला कर सकता है? दुश्मन तो सीमा पार था, फिर यहां कौन था?

मेजर पुरुषोत्तम मेरी यादों से कभी मिटे ही नहीं। वो हंसता-मुस्कुराता नौजवान।
मैंने पहले भी कहा था, आज दुहरा रहा हूं कि नीतिविहीन रणनीति एक ऐसी आग होती है, जिसकी लपटें दुश्मनों की तुलना में खुद को अधिक जलाती हैं, इसलिए हिंसा की कहानी को कभी विकल्प नहीं बनाना चाहिए।
मैं मेजर पुरुषोत्तम की कहानी रिपीट नहीं करना चाहता था। लेकिन आपको ये बताना चाह रहा था कि जैसे कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने शांति की राह चुन ली थी, वैसे ही आपका ये रिपोर्टर, जो हर सुबह रिश्तों की कहानियां आपको सुनाता है, वो बारूद की सुरंग में घुस कर रिपोर्टिंग कर चुका है। वो लाशों के बीच रातें गुजार चुका है। वो दहशत के धमाकों बीच पीटीसी कर चुका है। वो सब कुछ करके, सबका हश्र देख कर आज शांति की बातें करता है, रिश्तों की बातें करता है। आपका ये रिपोर्टर आपसे रिश्तों की कहानियां इसलिए साझा करता है क्योंकि इसने दहशत के दंश को बहुत करीब महसूस किया है। क्योंकि ये जानता है कि लकड़ी छीलने से मुलायम होती है, जख्म छीलने से तकलीफ बढ़ती है। समझिए,
युद्धनीति और राजनीति दो अलग-अलग चीज़ हैं।
कभी-कभी अनिच्छा को भी इच्छा की तरह स्वीकार करना चाहिए
[चेतना विकास मिशन]

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें