कृष्ण प्रताप सिंह

अवध के नवाबों के वक्त कैसरबाग को लखनऊ की आत्मा कहा जाता था तो अमीनाबाद को दिल। नवाबों का पराभव हो गया और राजपाट वाले उनके सुनहरे दिन अतीत में समा गए तो भी इस दिल का रूप-रंग भले ही बदला, धड़कनें धीमी नहीं पड़ीं और रौनक लगातार बढ़ती ही गई तो उत्साहित कद्रदान उसे ‘लखनऊ का चांदनी चाौक’ कहने लगे।
अवधी के अपने वक्त के सबसे लोकप्रिय कवि रमई काका ने यों ही ‘हम गयन अमीनाबादै जब’ शीर्षक अपनी कविता में खूब रस लेकर इस बात का जिक्र नहीं किया है कि किसी गांव-गिरांव से कोई भोला-भाला ग्रामीण अमीनाबाद पहुंच जाता तो किस तरह खुद को किसी और दुनिया में पाता, चैंधियाता और अकबकाया-सा रह जाता था। इतना ही नहीं, ‘जल में थल और थल में जल’ जैसे विभ्रम का शिकार होकर ‘सजी-धजी मूरति’ को ‘सुघर मेहरिया’ और ‘मेहरिया’ को ‘मूरति’ समझ बैठता और वापस लौटने पर गांव के लोगों से कहता था- बड़ा ध्वाखा होइगा!
लेकिन आज की तारीख में किसी को भी ठीक से नहीं मालूम कि लखनऊ के इस चांदनी चाौक का नाम अमीनाबाद क्योंकर पड़ा? कुछ कद्रदानों के अनुसार इसका नाम पहले नवाब बुरहान-उल-मुल्क सआदतअली खां प्रथम (1680-1739) के नाम पर है, जिनका एक नाम मीर मोहम्मद अमीन भी था, लेकिन कई अन्य कद्रदान इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनके अनुसार अमीनाबाद नवाब अमजदअली शाह (1801-1847) के वजीर-ए-आला अमीनुद्दौला के नाम पर है, जो इमदाद हुसैन के नाम से भी जाने जाते थे।

जो भी हो, अमीनाबाद में पहला निर्माण पहले नवाब के वक्त मुगल सल्तनत की ब्राह्मण जागीरदार रानी जयकुंअरि पांडे ने कराया था। वे नवाब की बेगम खदीजा खानम की दोस्त थीं और अपनी दोस्त की इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने वहां जो मस्जिद बनवाई, वह कालांतर में उनके नाम पर ‘पड़ांइन की मस्जिद’ कही जाने लगी।
फिर तो, कहते हैं कि मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय (1728-1806) ने भी अमीनाबाद के विकास और विस्तार में भरपूर रुचि ली। इस विस्तार में उनके बेटे सिकंदर शिकोह की भूमि और अवध के वजीर-ए-आला अमीनुद्दौला के अनुभव बहुत काम आए। अमीनुद्दौला ने वहां एक घंटाघर तो बनवाया ही, बाग भी विकसित कराया। उन्होंने इस बाग का नाम अपने पुराने नाम पर इमदाद बाग रखा था, लेकिन वह लखनवियों की जीभ पर नहीं चढ़ा। वक्त के साथ उन्होंने पहले उसे अमीनुद्दौला पार्क कहना शुरू किया, फिर झंडेवाला पार्क कहने लगे।
इस नामांतरण का भी एक प्रेरक इतिहास है। जनवरी, 1928 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान इस पार्क में हुई एक बड़ी सभा के दौरान गोरी सरकार की सख्त मनाही के बावजूद आजादी के दीवाने गुलाब सिंह लोधी ने एक पेड़ पर चढ़कर तिरंगा फहरा दिया, तो उन्हें पुलिस के हाथों जान गंवाकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। तिरंगे के लिए यह शहादत रंग लाई तो अमीनुद्दौला पार्क को झंडे वाला पार्क कहा जाने लगा। पार्क के बीचोबीच लोधी की प्रतिमा भी लगाई गई।
लेकिन आज की बात करें तो नवाबों के वक्त के अमीनाबाद के दीदार की हसरत लिए लखनऊ आने वालों को निराशा ही हाथ आती है। इसके कई कारण हैं। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम विफल होने के बाद गोरों ने लखनऊ के दूसरे हिस्सों की तरह अमीनाबाद को भी तहस-नहस कर दिया। रही-सही कसर 1905 में तत्कलीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जे डी लाटूश द्वारा दिए गए इसके जीर्णोद्धार के आदेश ने पूरी कर दी। इस जीर्णोद्धार के तहत ही बहुचर्चित लाटूश रोड का निर्माण कराया गया।
फिर 1912 में एक मास्टर प्लान के तहत अमीनाबाद के बीच से सड़कें निकाली गईं और उसकी भूमि के टुकड़े इस तरह बांट दिए गए कि पुराने अमीनाबाद का वजूद ही खत्म-सा होकर रह गया। आज के अमीनाबाद में नवाबों के दौर की इमारतों के कुछ अवशेषों को छोड़ दें तो कुछ नहीं बचा। उस वक्त के उन दो फाटकों का भी अस्तित्व अब नहीं रहा, जो उसकी शान थे और जिनमें से एक को कलां यानी बड़ा और दूसरे को खुर्द यानी छोटा फाटक कहा जाता था।
यही कारण है कि अब लखनवी किसी से ‘अमीनाबाद नहीं, लखनऊ का चांदनी चाौक कहिए जनाब’ कहते हैं तो अजीब-सी कसक से भर उठते हैं।





