व्यंग्य –विवेक मेहता
रात होते ही राजा ने श्मशान में प्रवेश किया। पेड़ पर से लटकी लाश को उतारा, पीठ पर लादा और चल पड़ा। उसके चलते ही लाश में छिपा बैताल बोल पड़ा- “राजन, तुम प्रयास करते-करते थक गए होंगे। तुम्हारी थकान कम करने के लिए एक कहानी सुनाता हूं- पूरे विश्व में भयंकर बीमारी फैली थी। जम्बूद्वीप भी उसकी चपेट में आ गया। दाढ़ी, ताली, थाली, दीये, मोमबत्तियों के टोने-टोटकों से भी रोग काबू में नहीं आया। द्वीप के मुखिया के पास करोड़ों का फंड इकट्ठा हो गया फिर भी मजदूरों और उनके परिवार को घर भेजने की वाहन व्यवस्था के लिए वह कम था। उन्हें हजारों किलोमीटर पैदल, भूखे-प्यासे अपने घरों को लौटना पड़ा। पहले दौर में डर और खौफ का माहौल था। थोड़ी शांति के बाद बीमारी का दूसरा दौर चल पड़ा। इस दौर में लोग अस्पताल,ऑक्सीजन और दवाओं के लिए भटकने लगे। उधर श्मशानों में भी लगातार आग की वजह से चिमनिया गलने लगी। जो लोग लकड़ियों का जुगाड़ नहीं कर सके उन्होंने नदी के किनारे रेत में शव दफना दिए। बारिश होते ही वे शव नदी में तैरने लगे। मृतकों की संख्या इतना बढ़ गई कि प्रशासन गिनती भूलने लगा। इतनी गफलत होते हुए भी यह तो अच्छा रहा कि रोज थोड़ा-थोड़ा आंकड़ा बढ़ा ही, कम नहीं हुआ!

ऐसे ही खराब समय में जम्बूद्वीप के किसी गणतंत्र के, किसी शहर में एक पति पत्नी रहते थे। पति महामारी की चपेट में आ गया। सांस लेने में परेशानी होने लगी। पत्नी उसे लेकर सरकारी अस्पताल में गई। कोई बिस्तर खाली नहीं मिला। जैसे-तैसे समाचार मिला कि एक महंगे प्राइवेट अस्पताल में बिस्तर खाली है। पच्चीस हजार रुपए जमा करवा कर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। दो दिनों तक पत्नी अस्पताल में समाचार लेने गई। बीमारी का डर दिखाकर वहां उसे पति से मिलने नहीं दिया गया। तीसरे दिन पत्नी में भी बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे। उसे घर में ही बंद रहने की सूचना देने वाला पोस्टर प्रशासन ने चिपका दिया। चौथे दिन अस्पताल से फोन आया कि इलाज के लिए और पैसे जमा करवाओ। महिला ने मजबूरी जताई- बीमारी के कारण वह बाहर निकल नहीं सकती और बिना निकले पैसों का इंतजाम करना उसके लिए संभव नहीं था। दो-चार दिन और रोज फोन आते रहें। बिल बढ़कर 75-80 हजार रूपयों का हो गया। एक दिन फोन आया कि उसका पति मर गया। बिल जमा करवा दें और दर्शन कर लें। रोते हुए महिला ने कहा- व्यवस्था करती हूं। महिला ने अपने परिचितों रिश्तेदारों से संपर्क साधा। पैसों की जरूरत बताई। सभी की राय थी कि बिल चुकाने से कोई फायदा नहीं। लाश तो वैसे भी देंगे नहीं। आखिर में महिला ने भी हाथ खड़े कर दिए। अस्पताल वालों ने बहुत कोशिश की कि थोड़ा बहुत जो भी पैसा मिल सके उतना मिल जाए मगर मिला नहीं।”
कहानी समाप्त कर बैताल ने सवाल दाग दिया- “राजन, जम्बूद्वीप के प्राइवेट अस्पताल यूं तो बड़े बदनाम थे। कहते है कि वे मरे हुए व्यक्ति का इलाज करके भी पैसे वसूल कर लेते। बिना बिल वसूलें मृतक का अंतिम संस्कार नहीं होने देते। फिर इस मामले में उन्होंने न केवल बिना पैसे इलाज किया बल्कि बिना बिल वसूली के लाश का अंतिम संस्कार भी होने दिया। क्या रिश्ते इतने बेमानी हो गए कि लोग पैसों के पीछे अपने परिजनों का अंतिम संस्कार भी नकारने लगे। इन सवालों का जवाब जानते हुए भी नहीं दोगे तो तुम्हारे सिर की टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।”
“बीमारी के दौर में स्थिति विकट थी। बीमारी के नाम पर प्राइवेट हॉस्पिटल कमा भी बहुत रहे थे। इलाज करें या ना करें, इस खतरनाक बीमारी से ग्रसित मरीज को वे अस्पताल से निकाल भी नहीं सकते थे। इलाज का ढोंग करना उनकी मजबूरी थी। मृतक का अंतिम संस्कार वैसे भी प्रशासन को करना था। सामाजिक बंधन तो था नहीं। परिजनों को तो शमशान में बटन ही दबाना था। महामारी से ग्रसित मृतक का शरीर पैसों के लिए अस्पताल में रखते और खबर बाहर आ जाती तो जो धंधा चल रहा था वह भी खतरे में पड़ जाता। ऊंट भी कभी पहाड़ के नीचे आ जाता है, यह मानने के अतिरिक्त अस्पताल प्रशासन के पास कोई चारा नहीं था।”
राजा का उत्तर समाप्त होते ही बैताल लाश को लेकर पेड़ पर लटक गया।





