
“संजय कनौजिया की कलम”✍️
अल्पसंख्यक ब्राह्मण और बहुसंख्यक ब्राह्मणवाद में जमीन-आसमान का फ़र्क है उदार मानसिकता का ब्राह्मण आज भी सभी धर्मो को सामान दृष्टि से देखता है और सम्मान करते हुए अपने हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांत की सही व्याख्या करता है..तो वहीँ दूसरी ओर कट्टरता के प्रतीक ब्राह्मणवादी मनुवाद के सिद्धांत को प्रमुखता देते हुए सदैव अधर्म करते आ रहे हैं..जिसके खिलाफ डॉ० भीम राव अंबेडकर को अधर्म की विषैली प्रस्थितयों ने हिन्दू धर्म के कर्म-काण्डों के आधार पर, विरोधी तो बना दिया था लेकिन वह धर्मो के विरुद्ध नहीं थे..अधर्म चरम पर ना होता तो क्या हिन्दू धर्म से ही निकले अन्य धर्मो की उत्पत्ति होती..? भारत एक धर्मनिरपेक्ष मुल्क है यह व्याख्या अंबेडकर ने अपने लिखे संविधान में भी वर्णित की हैं और सभी धर्मो को बराबर का स्थान भी दिया है..अम्बेडकरवादी चिंतकों का यह मानना कि अंबेडकर नास्तिक थे, यह कहना सरासर निराधार है..अंबेडकर नास्तिक होते तो वह बौद्ध धर्म क्यों अपनाते ?..वह बुद्ध को भगवान क्यों कहते ?..अंबेडकर हिन्दू धर्म में शूद्रों के प्रति सोच और बेबुन्यादि आडंबरों से तंग आ चुके थे..अंबेडकर चाहते थे कि हिन्दू धर्म के मूल में छिपे प्राणियों के प्रति सौहार्द व सद्धभावना जिसमे समता-समानता-समन्वय तथा प्रेम के सिद्धांत का सत्य रुपी सन्देश है, इसी सन्देश की ख़ूबसूरती को लेकर नवीन-स्वस्थ्य और उज्जवल चर्चा सहित वैज्ञानिक एवं अध्यात्म विज्ञान द्वारा एक मत से सार्वजनिक किया जाए..इससे यह सिद्ध होता है कि अंबेडकर, हिन्दू कहे जाने वाले धर्म के विरोधी नहीं थे..अंबेडकर अवैज्ञानिक तथा रचे गए ब्राह्मणवादीयों के आचरण के विरुद्ध थे..वह ब्राह्मणवादियों से स्वस्थ्य चर्चा कर जानना चाहते थे कि हिन्दू धर्म की नीव जातियों के आधार पर क्यों रखी गई ?..क्या हिन्दू धर्म का ब्रह्मणवाद यह बतलायेगा कि शूद्र वर्ग के लोगों को शिक्षा से वंचित क्यों रखा गया ?..शूद्रों को धार्मिक पूजा पद्दति के द्वारा व अन्य सामाजिक आधारों को लेकर लगातार भयंकर प्रताड़नाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं ?..शूद्रों पर जान-माल-इज्जत-आबरू व सम्मान का खतरा क्यों बना आ रहा है ? किस पैमाने के आधार पर शूद्र को शूद्र कहा गया ?..लेकिन जब अंबेडकर ने पूरी तरह समझ लिया कि हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी ठेकेदार इन बिंदुओं पर कोई चर्चा करना ही नहीं चाहते और अपने-अपने दकियानूसी एजेंडों को ही बढ़ावा दे रहें है तो अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के घमंड और विषमताओं के विरुद्ध जाकर हिन्दू धर्म को त्यागकर, बौद्ध धर्म अपना लिया और मुल्क की आजादी के बाद उभरते आधुनिक भारत के सबसे बड़े बौद्ध प्रचारक बने..परन्तु अंबेडकर ने ये कभी नहीं कहा कि सभी शूद्र बौद्धिष्ट हों जाएँ उन्होंने केवल इतना कहा कि बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच का फर्क सदैव ध्यान में रखें और हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में से किसी एक को चुनना हो तो इसकी आपको आजादी है कि अपने उज्जवल भविष्य के लिए जहाँ आपके अपने हक़-अधिकार, मान-सम्मान और स्वाभिमान सुरक्षित रह सकें, उसे चुने..!
डॉ० अंबेडकर के परिनिर्वाण के बाद अम्बेडकरवाद पर विद्वानों ने शोधकर्ताओं ने लेखकों ने बुद्दिजीवी वर्ग के भाषण कर्ताओं ने या 60-70 के दशक तक अंबेडकर के साथ व्यक्तिगत अनुभव रखने वालो ने जो भी बातें तथ्य व साक्ष्यों को अपनी अपनी समझ से व्याख्याएं की हैं उसे हम सम्पूर्ण अम्बेडकरवाद का सिद्धांत मान लें, यह उचित ना होगा..कई जगह अंतर्विरोध भी देखने में आया है बहुत सी ऐसी ऐसी बातें हैं जिनका उजागर शूद्र विद्वानों ने किया ही नहीं..जबकि उन बिंदुओं को अंबेडकर ने समय समय पर स्वयं अपने लेखों में अपने लिखे पत्रों में और अपने भाषणों में चिन्हित किया है..जो अंबेडकर की ओर पुनः आंकलन या शोध हेतू विवश करता है..दो दिलचस्प उदहारण अंबेडकर की लेखनी के जानना और समझना जरुरी है..दिलचस्प यह है कि आत्मा और परमात्मा में विश्वाश न रखने वाले अंबेडकर पुनर्जन्म में विश्वाश रखते थे..जबकि पुनर्जन्म की बात हिन्दू धर्म में कही जाती है..5 फरवरी 1956 को बुद्ध जयंती के अवसर पर अंबेडकर ने अपने लम्बे सम्बोधन द्वारा जो बात रखी जो हिंदी वॉल्यूम-35, पेज-487 में दर्ज़ है उसके कुछ अंश, लेखक के अपने अगले लेख में, जो अधर्म का नाश हो शीर्षक का पार्ट-2, उसमे विस्तारित होगा..अभी तो लेखक अपने व्यक्तिगत विचार में इतना ही वर्णित करेगा कि धर्म की परिभाषा या उसकी मूल गहराई तक तो नहीं जाया जा सकता..क्योकि यह एक लम्बी बहस और विवाद बन जाता है लेकिन लोकतान्त्रिक प्रणाली में यदि राजनीतिक रूप से हम मार्क्सवाद को समझें तो उसमे वर्ग संघर्ष की बात है और उसकी आर्थिक व्याख्या जिसमे समाज की उत्पत्ति हेतू कहा गया कि दुनियां के मजदूरों एक हो जाओ तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं बल्कि पाने को दुनियां पड़ी है..हम वर्ग संघर्ष की बात करें या समाजवाद की अंत में सभी वैचारिक संघर्ष की धूरियों का केंद्र बिंदु धर्म पर आकर केंद्रित हो जाता है..हिन्दू धर्म पर गांधी दर्शन सहित प्रखर समाजवादी नेता डॉ० राममनोहर लोहिया जो घोर नास्तिक थे, परन्तु जनभावनाओं की धार्मिक आस्था को समझते हुए उन्होंने रामायण मेले के आयोजनो को स्वीकृति दी थी..जिसका उल्लेख क्रमबद्ध अगले लेख में होगा..उल्लेख में उदार ब्राह्मणों जिन्होंने हिन्दू धर्म की ख़ूबसूरती और विशेषताओं का बखूबी बख़ान कर हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने का काम किया है, इसके आलावा कट्टरता की अधर्मता जो हिन्दू धर्म सहित अन्य धर्मो में होते हुए अब शूद्रों में भी समाहित होती जा रही है..जैसे वर्तमान में तरोताज़ा ज्ञानव्यापी मंदिर-मस्जिद विवाद सामने आया है और उस विवाद पर दिल्ली महाविद्यालय के एक शिक्षक ने भाषा की मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए किन्तु-परन्तु-यदि-शायद का प्रयोग कर शिवलिंग पर ख़तने जैसे शब्द का इस्तेमाल किया है तो क्या यह कट्टरता की निशानी नहीं ? क्या अब अधर्मियों का मुक़ाबला करने के लिए हमे अधर्म का मार्ग चुनना होगा ? या अधर्म का नाश हो सर्व-धर्म की विजय हो के लिए संघर्ष करना होगा ? इन्ही सभी बिंदुओं पर अपनी व्यक्तिगत राय “अधर्म का नाश हो” शीषर्क (पार्ट-2) में रखूँगा..!!

अधर्म का नाश हो* (पार्ट-2)
अपने पिछले लेख “अधर्म का नाश हो” (पार्ट-1) में, कुछ धर्म और अधर्म से जुड़े अन्य बिंदुओं को रेखांकित करते हुए डॉ० भीम राव अंबेडकर का “हिन्दू धर्म का विरोधी होना एवं धर्म के विरुद्ध” में ना होने का जिक्र था..साथ ही इस बात का भी जिक्र था कि अंबेडकर “पुनर्जन्म” पर विश्वास करते थे..उन्ही बिंदुओं को क्रमबद्ध आगे बढ़ाते हुए..वॉल्यूम-35, पेज-487 में दर्ज़ 5, फरवरी 1956 का बौद्ध जयंती के अवसर पर अपने लम्बे सम्बोधन में कहे उनके कुछ अंश यूँ थे..”कोई भी धर्म जो साम्यवाद का विकल्प नहीं प्रस्तुत करेगा, बचा नहीं रह पायेगा..मेरी समझ में बौद्ध धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो साम्यवाद का विकल्प प्रस्तुत कर सकता है..में उन लोगो से सहमत नहीं हूँ जो हर पंथ में विश्वास करते हैं और हर जगह से थोड़ा कुछ ग्रहण करने की कोशिश करते हैं..भारत में इस तरह का दृष्टिकोण देखा जा सकता है..व्यक्ति को अपना चुनाव खुद करना चाहिए और फिर उस चयन के साथ रहना चाहिए..एक धर्म दूसरे धर्म से अलग हो सकता है..बौद्ध धर्म और जैन धर्म में अहिंसा के जो उपदेश दिए गए हैं, वह अलग-अलग हैं..जैन धर्म में अहिंसा एकदम चरम पर ला दी गई है..पुनर्जन्म में मेरा पूरा विश्वास है, में वैज्ञानिकों को यह सिद्ध कर सकता हूँ कि पुनर्जन्म तर्कसंगत है..मेरे नजरिये में मनुष्य नहीं बदलता तत्व बदल जाते हैं”..इसी के साथ एक और मामला है जो शोध का विषय है..डॉ० अंबेडकर के लिखे पत्रों में कोई न कोई प्रतीक चिन्ह (लोगो) बने होते थे..और इस तरह के अधिकतर पत्र, वॉल्यूम-21 में छपे हुए हैं..उनके लैटर पैड्स में ब्रिटिश क्रॉउन, फ्रेंच वर्ड, व और अन्य प्रतीक चिन्ह हैं लेकिन डेढ़ दर्ज़न से अधिक पत्र हैं जिसमे चौंकाने वाले प्रतीक चिन्ह बने हुए हैं..वॉल्यूम-35, पेज-210, वर्ष 1924 को बॉम्बे गवर्नर को चौंकाने वाले प्रतीक चिन्ह का पहला पत्र लिखा जिसका प्रारूप यह है..”प्रमाणित किया जाता है कि इस पत्र का धारक शंकरदास नारायणदास बर्ले, दलित वर्गों के उत्थान के लिए स्थापित किये गए संगठन बहिष्कृत हितकारिणी सभा का कार्येकर्ता है और दलित वर्गों के उत्थान के लिए प्रकाशित समाचार पत्र के लिए, प्रचारक है..इसका काम दलित वर्गों के लिए व्याख्यान देने और उन्हें उनके अपने विकास के लिए प्रयास करते रहने हेतू प्रोत्साहित करने के लिए बम्बई क्षेत्र में घूमते रहने का काम है..अनुरोध किया जाता है, सार्वजनिक निकाय जहाँ तक संभव हो सहायता करे..जय भवानी..और प्रतीक चिन्ह था शेर पर बैठी देवी यानी “देवी दुर्गा” का..इसी तरह समय समय पर उनके यह प्रतीक चिन्हित पत्र काफी लम्बे समय तक गवर्नर और अधिकतर भाऊराव को लिखे गए है और उनका आखिरी पत्र भाऊराव के लिए ही वर्ष 29/7/1936 को लिखा गया था जिसमे “देवी दुर्गा और जय भवानी” अंकित था..इससे यह सिद्ध होता है कि डॉ० अंबेडकर हिन्दू धर्म के विरुद्ध नहीं थे..!
डॉ० अंबेडकर कोई धार्मिक या दार्शनिक व्यक्तित्व नहीं थे, वे सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत के पक्षधर एक महान राजनीतिक नेता थे और सभी समस्याओं का समाधान वह राजनीतिक रूप से सुलझाना चाहते थे..समझा जाए तो अंबेडकर के कार्येकर्मों को आगे बढ़ाने वाले दूसरे बड़े नेता समाजवादी सिद्धांत के अद्येता “डॉ० राममनोहर लोहिया” थे..लोहिया ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वर्ष 1956 के मध्य पत्राचार के माध्यम से अंबेडकर तक यह सन्देश पहुँचाया, कि वे डॉ० अंबेडकर का नेतृत्व स्वीकारते हैं और “रोटी और बेटी के रिश्ते” एक करने हेतू मिलकर अभियान चलाया जाए..जिससे जाति ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म में भी समरसता का भाव पैदा होगा..और आप दलित तक नहीं बल्कि पूरे भारत के नेता जाने जाएंगे..जिसपर पत्राचार के माध्यम से डॉ० अंबेडकर ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी थी और दिल्ली में लोहिया से मिलने का दिन तय हुआ था..परन्तु दुर्भाग्यवश दो महीने की बीमारी के बाद डॉ० भीम राव अंबेडकर का परिनिर्वाण हो गया..जिससे डॉ० लोहिया सबसे ज्यादा आहत हुए और एक पत्र द्वारा उन्होंने मधु लिमय को अपनी इस आहत की वेदना को प्रकट किया था..बाद में अपने लेखन के दौर के चरम में, जब मधु लिमय थे, तब उन्होंने “डॉ० अंबेडकर एक चिंतन” नामक शीर्षक को लेकर एक किताब तक लिख डाली थी..!
वर्ण, स्त्री, सम्पति, सहनशीलता को समझें तो अंबेडकर और लोहिया समकालीन थे..दोनों ही राजनीतिक नायकों का एजेंडा एक ही था..आश्चर्यजनक है कि इसके बावजूद दोनों की वैचारिक समानताएं खोजने के प्रयास बहुत ही कम हुए..लोहिया ने अंबेडकर की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “धर्म और राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है..धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म..धर्म श्रेयस की उपलब्धि का प्रयत्न करता है..राजनीति बुराई से लड़ती है”..लोहिया का एक लेख वर्ष 1955 के अगस्त में “मैनकाइंड” अंग्रेजी पत्रिका में छपा था और हिन्दू भगवानो के लिए जो व्याख्या की जिसकी प्रशंसा दुनियां में हुई..”हे भारतमाता..हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म और वचन दो..हमें असीम मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो”..!
कैसे लोहिया ने रामायण मेले के आयोजन को स्वीकृति दी..क्या दृष्टिकोण था हिन्दू धर्म के प्रति..हिन्दू धर्म पर गांधी दर्शन, उदार ब्राह्मणो का हिन्दू धर्म..कट्टर ब्राह्मणवादियों का हिन्दू धर्म..चुनावो को देखते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का शिवलिंग को लेकर तरोताज़ा लच्छेदार जुमला सम्बोधन और क्यों कुछ दलित कट्टरपंथियों की भांति, फासीवादियों के मार्ग का अनुशरण करते हुए प्रतीत हो रहे है..इन सभी बिंदुओं पर अपनी राय, में अपने लेख “अधर्म का नाश हो” के पार्ट-3-4 या 5 में क्रमबद्ध रखूँगा..!!
(लेखक-राजनीतिक और सामाजिक चिंतक है)





