अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

बैताल कथा-केंचुआ और एक दिन के राजा

Share
व्यंग्य

विवेक मेहता

                 फिर से राजा ने चुपचाप जाकर पेड़ पर से लाश को उतारकर कंधे पर लोकतंत्र की तरह लादा और चल पड़ा। लाश में छुपे बैताल ने कहा- “लगता है राजन, राज भार ज्यादा हो गया हैं। निराश और थके हुए लगते हो। चलो तुम्हारी परेशानी दूर करने के लिए एक कहानी सुनाता हूं- जम्बूद्वीप लोकतांत्रिक द्वीप था। इस कारण समय-समय पर वहां चुनाव होते रहते। कभी किसी गणराज्य का, कभी पंचायत का, कभी द्वीप का।

सरकारी, अर्द्ध सरकारी कर्मचारी चुनाव संपन्न करवाने में व्यस्त रहते। अपने काम को ईमानदारी से करने वाले लोग उस वक्त तलवार की धार पर चलते। कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर और ऑब्जर्वर सभी निर्देशों के साथ दबी जुबान से उन्हें धमकाते भी जाते। आपको यह करना है, वह नहीं करना हैं। इसे अंदर आने देना है, उसे बाहर का रास्ता दिखालाना हैं। एजेंट यह नहीं करेगा, आपका अधिनस्थ वह काम करेगा। चुनाव केंद्र से सौ मीटर के दायरे के आप राजा हैं। कुछ भी हो तो पुलिस को सूचित करें और सामने वाला अंदर फिर चाहे- वह मंत्री हो या संत्री। इस कार्य में कुछ गड़बड़ हुई तो गए आप काम से। सौ मीटर के दायरे से बाहर निकलते ही आपको कोई पूछेगा नहीं- यह वे नहीं बताते थे।मगर द्वीप के मुखिया के सेल्फी लेने वाले लफड़े के बाद से सब यह जानते थे।

                 ऐसे ही एक चुनाव में रामलाल जी की ड्यूटी लगी। इससे बचने के उन्होंने सब प्रयास किए। घरवालों को बीमार किया। बच्चों की शादी तय की। जोर लगाया, तिकड़म भिड़ाई। ड्यूटी से न बच पाए। दूरदराज के एक स्कूल में ड्यूटी लगी। तीन सहयोगी, चौथा चपरासी। दो सहयोगी बाहर से आए थे इस कारण साथ में स्कूल के कमरे में रात रूके। बहन जी स्थानीय थी। लापता थी। चुनाव के दिन भी दर्शन देगी या नहीं अनिश्चित था। चुनाव के पहले की सारी प्रक्रिया निपटाई- सामग्री की जांच, बैठक व्यवस्था, वोटर लिस्ट, 20-25 लिफाफे और उनके फॉर्म। टेंशन में रात को नींद भी बराबर नहीं आई। दूसरे दिन मॉक पोल कर चुनाव कार्य समय पर चालू करवा दिया। स्थानीय चुनाव थे। कांटे का मुकाबला रहा होगा, इस कारण गहमागहमी और गर्मी ज्यादा थी। बात, बिना बात माहौल गर्म हो जाता। प्रिसाइडिंग ऑफिसर रामलाल सब को शांत रखते। कभी नरम होते, कभी गरम होते। काम चल जाता। दोपहर होते-होते लाइन लंबी होने लगी। काम बढ़ गया। अचानक गले में भगवा गमछा डाले मंत्री जी आ धमके। मंत्री हैं तो अकेले तो होंगे नहीं। दो-चार चमचे भी साथ में थे। बुथ के बाहर खड़ा पुलिसवाला गधे के सींग की तरह गायब हो गया। रामलाल जी ने देखा और सोचा-चलो आए हैं तो वोटिंग प्रतिशत पूछ कर चले जाएंगे। मंत्रीजी तो ठहरे कुशल राजनेता। लोगों पर प्रभाव जमाने के लिए सवाल दागा – “अफसर, काम कैसा चल रहा है?”

                  उत्तर की चिंता उन्हें कहां थी। जतलाना था- ये तो हमारे नौकर हैं। सो जतला दिया। आगे बढ़े। वोटरों से चर्चा में लग गए। रामलाल जी के सामने दुविधा की स्थिति आ गई। नियम बोलते है कि मंत्री का अंदर आना मना हैं। भीड़ न लगे। वोटरों को कोई प्रभावित न करें। अब तो कैमरे की साईज छोटी हो गई। किसी ने रिकॉर्डिंग कर ली, वीडियो वायरल हो गया तो गए काम से। रामलाल जी उठे। मंत्री जी के पास पहुंचे।धीरे से उनके कान में फुसफुसाए- “मंत्रीजी आपका अंदर आना मना हैं। मुझे क्यों समस्या में डालते हैं।”  

“कोई समस्या नहीं होगी।”-मंत्री जी बोले। मगर समझ गए कि अब खड़ा रहना उचित नहीं। चमचों के साथ सरक लिए।

                राजन, तुम को लग रहा होगा कि रामलाल जी की समस्या समाप्त। मगर ऐसा नहीं था । यह तो कुएं में गिरने से बचने वाली स्थिति थी। खाई तो अब सामने आने वाले वाली थी। पांच मिनट में एक आदमी मोबाइल लेकर आया। साहब को आपसे बात करनी हैं। नियम विरुद्ध जाकर मोबाइल कान से लगाना पड़ा। आवाज गूंजी- “मंत्रीजी का पीए बोल रहा हूं। मंत्रीजी जानना चाहते हैं कि आप कौन से विभाग में हैं?”

               धमकी स्पष्ट थी। हम से टकराता हैं। बच्चू अब देख! रामलाल जी ने जवाब दिया- “शिक्षा”

                 थोड़ी चुप्पी के बाद फिर से सवाल दगा -“पोस्टिंग कहां है?” रामलाल जी ने वह भी बतला दिया। मगर धीरे से सवाल सरका दिया -“आपका नाम क्या है, सर? वह क्या है ना, आचार संहिता का मामला बनता हैं। प्रिसाइडिंग डायरी में लिखना पड़ेगा।” उधर से फोन कट गया। लगा होगा कि आदमी अडियल हैं। रामलाल जी ने जोनल अधिकारी से बात की। उसने बात को सुना अनसुना कर दिया। रामलाल जी को भी लगा मामला खींचा तो लेने के देने न पड़ जाए। कल से तो कोई उन्हें जानेगा भी नहीं। अधिकारियों में अपने कर्तव्यों को पूरा करने की इच्छा शक्ति ‘शेष-न’ रही। आयोग ‘केंचुआ’ हो गया। बिना रीढ़ की हड्डी का। आगे समस्या खड़ी हुई तो कौन अधिकारी उनको बचाएगा।”

         कहानी समाप्त कर पीठ पर सवार बैताल ने सवाल दागा-“रामलाल जी ने मंत्री की शिकायत न करके अपने कर्तव्य का पालन क्यों नहीं किया? मंत्री जी को देखकर पुलिस वाला गायब क्यों हो गया? इन सवालों का जवाब जानते हुए भी नहीं दोगी तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।”

             “अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना परेशानी भरा होता हैं। कठिनाई और भी बढ़ जाती है जब ऊपरी अधिकारी डरपोक, लालची हों। जिन्हें गड़े मुर्दे उखड़ने का डर हो। जब ऊपर से गड़बड़ हो तो एक दिन के अधिकार संपन्न नीचे वाले रामलाल, पुलिस वााले क्या कर लेंगे!”-कह कर राजा ने अपने कंधे की लाश खुद ही उतार कर बेताल के हवाले कर दी।

             

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें