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अमेज़न के मज़दूरों ने कैसे बनायी अपनी यूनियन

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 भारत

दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक अमेज़न लगातार अपने यहाँ मज़दूरों की यूनियन बनने से रोकने की कोशिश करती रही है। यूनियन न बन पाये इसके लिए वह अरबों रुपये अदालती कार्रवाई पर और तरह-तरह की तिकड़मों पर ख़र्च करती रही है। मज़दूरों को डराने-धमकाने, उनके बीच फूट डालने के लिए उसने बाक़ायदा कई फ़र्मों को करोड़ों के ठेके दिये हुए हैं।
लेकिन उसकी वर्षों पुरानी कोशिश आख़िरकार नाकाम हो गयी है। अमेरिका में स्टेटन आइलैण्ड स्थित अमेज़न के वेयरहाउस के कर्मचारियों ने यूनियन बनाने सम्बन्धी प्रस्ताव को बड़े बहुमत से पारित कर दिया है। इसके पहले अमेज़न की जिस किसी इकाई में ऐसी कोशिश हुई, कम्पनी उसे नाकाम करने में सफल रही। आरोप है कि कई जगहों पर कम्पनी ने इसके लिए करोड़ों डॉलर ख़र्च किये और विवादास्पद क़दम उठाये। अमेज़न यह सब इसलिए करती रही है क्योंकि मालिकान तात्कालिक तौर पर सबसे ज़्यादा मज़दूरों की यूनियन से ही घबराते हैं।
अमेरिका में परम्परा यह है कि यूनियन बनाने के प्रस्ताव पर कारख़ानों में मज़दूरों के बीच मतदान कराया जाता है। 1980 के बाद से यूनियनों के कमज़ोर होने का चलन रहा है। सरकारों की सहायता से पूँजीपतियों ने 1970 के दशक से ही यूनियनों पर और श्रम अधिकारों पर आक्रामक हमले किये और मज़दूर आन्दोलन के भीतर सक्रिय सुधारवादियों और पूँजीपतियों की एजेण्ट यूनियनों के कारण वे इसमें काफ़ी हद तक कामयाब भी रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से लहर बदल रही है। मज़दूरों के बीच भी यह भावना घर करने लगी है कि अब बहुत हो गया! तमाम जगहों पर फिर से यूनियन बनाने की कोशिशें तेज़ हो गयी हैं। इनमें कई जगहों पर कर्मचारियों को सफलता हाथ लगी है। उसी में अब स्टेटेन आईलैण्ड का अमेज़न का वेयरहाउस भी शामिल हो गया है। वहाँ हुए मतदान में 2,654 कर्मचारियों ने यूनियन बनाने के पक्ष में मतदान किया। जबकि 2,121 कर्मचारियों ने इसका विरोध किया। वहाँ कुल 8,325 मतदाता थे।
अमेज़न ने पिछले दो सालों में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को काम पर रखा है। कम्पनी में विश्व स्तर पर 16 लाख कर्मचारी हैं। महामारी ने कर्मचारियों में कार्यस्थल की सुरक्षा के बारे में चिन्ताओं को बढ़ाया है। स्टेटन आईलैण्ड वेयरहाउस, जिसे JFK8 के नाम से जाना जाता है, पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी जाँच में पाया था कि अमेज़ॅन के रोज़गार मॉडल में कई प्रकार की विसंगतियाँ हैं। अमेज़न में मज़दूर पिछले कई वर्षों से यूनियन के गठन का प्रयास कर भी रहे थे।
अमेज़न ने भी पूरी कोशिश की थी कि यूनियन का गठन न हो पाये। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ मतदान से ठीक पहले अमेज़न के अधिकारियों ने कर्मचारियों से सम्पर्क की मुहिम चलायी। इस दौरान वे कर्मचारियों से यूनियन गठन के विरोध में मतदान करने की अपील कर रहे थे। इस बारे में उन्हें टेक्स्ट मैसेज भेजे गये थे। साथ ही वेयरहाउस में कर्मचारियों के कुछ समूहों के साथ अधिकारियों ने बैठकें की थीं। डू इट विदाउट ड्यूज़.कॉम नाम से एक यूनियन विरोधी वेबसाइट भी बनायी गयी। कर्मचारियों को भेजे गये सन्देशों में कहा गया कि कम्पनी अपने बारे में बोलने का अधिकार ख़ुद अपने आपको देगी! यूनियन को बदनाम करने के लिए इस प्रकार का झूठा प्रचार किया गया कि यूनियन एक बिज़नेस है, जिसके पदाधिकारी बिना कोई काम किये कर्मचारियों से चन्दा लेते हैं! चूँकि इन्हीं पूँजीपतियों ने ऐसी जेबी यूनियनें भी बना रखी हैं, जो वाक़ई एक धन्धा हैं और जिनके पदाधिकारी वाक़ई मुफ़्तख़ोरी और चन्दाख़ोरी करते हैं, इसलिए इस प्रकार के दुष्प्रचार के मज़दूरों के बीच असर की गुंजाइश थी। यानी मालिक अपने कुकर्म का ठीकरा यूनियन की पूरी सोच पर फोड़कर मज़दूरों को गुमराह करना चाहते थे।
ख़बरों के मुताबिक़ अमेज़न ने फ़ेसबुक पर कई यूनियन विरोधी विज्ञापन दिये, जिनमें कर्मचारियों से यूनियन गठन के ख़िलाफ़ वोट डालने का आह्वान किया गया था। अमेज़न कम्पनी का अलाबामा स्थित वेयरहाउस मार्च 2020 में बना था। यहाँ यूनियन बनाने के लिए कर्मचारियों ने अर्ज़ी पिछले नवम्बर में दायर की। उस आवेदन पर दो हज़ार से ज़्यादा कर्मचारियों के दस्तख़त थे। ज़ाहिर है कि शोषण और दमन अब उस सीमा पर पहुँच चुका था जहाँ यूनियन के बारे में कम्पनी के दुष्प्रचार का मज़दूरों पर असर कम हो रहा था और मज़दूर इस बात को शोषण और दमन के अपने तजुरबे से समझ गये थे यूनियन के बिना अपनी आर्थिक माँगों के लिए वे लड़ ही नहीं सकते हैं।
अमेज़न उन कम्पनियों में है, जिसके मुनाफ़े में कोरोना महामारी के दौरान भारी इज़ाफ़ा हुआ है। इसके संस्थापक और सीईओ जेफ़ बेजॉस की सम्पत्ति इस दौरान 70 अरब डॉलर बढ़ गयी। अब उनकी कुल सम्पत्ति 185 अरब डॉलर के क़रीब है। जब भी आर्थिक संकट गहराता है तो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की बुरी हालत के बावजूद जो सबसे बड़े पूँजीपति होते हैं, उनकी पूँजी में बढ़ोत्तरी होती ही है क्योंकि इस दौरान वे तमाम छोटी पूँजियों को निगल जाते हैं, जो कि संकट के दौर में बच नहीं पातीं। साथ ही, ऑनलाइन होने वाले कारोबार में भी लॉकडाउन के दौरान बढ़ोत्तरी होना लाज़िमी था। नतीजतन, पहले से ही संकटग्रस्त पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के कोरोना महामारी के दौरान और भी बुरी तरह संकट की गिरफ़्त में आने के बावजूद जो दुनिया के सबसे बड़े पूँजीपति थे, जैसे कि जेफ़ बेजॉस, उनकी पूँजी में भारी बढ़ोत्तरी हुई। हर संकट में ऐसा होता है, जैसा कि मार्क्स ने 200 साल पहले ही बता दिया था।
अमेज़न पर आरोप रहा है कि उनकी कम्पनी के पास कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए कार्यस्थलों पर पर्याप्त इन्तज़ाम नहीं हैं। महामारी के दौरान भी ये कर्मचारी बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के काम करते रहे हैं। इण्टरनेट युग की इन कम्पनियों में मैन्युफ़ैक्चरिंग की कम्पनियों की तरह यूनियन गठन का चलन नहीं रहा है। अमेज़न के कर्मचारियों का आरोप है कि उनमें आपस में संवाद ना रहने के कारण मैनेजर उनसे दुर्व्यवहार करते हैं। ऐप के ज़रिए उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर दी जाती है। बर्ख़ास्तगी तक हो जाती है जबकि उनके लिए अपील करना और अपना पक्ष रखना मुश्किल बना रहता है। एक मामले में आरोप लगा कि जब एक महिला एरिया मैनेजर ने लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न की शिकायत की, तो उसे बर्ख़ास्त कर दिया गया। ऐसी ही घटनाओं के बाद यूनियन बनाने की मुहिम ने ज़ोर पकड़ा था।
अमेज़न के मज़दूरों की यह जीत पूरी दुनिया के मज़दूरों के लिए महत्व रखती है। हमें अमेज़न के अपने जुझारू भाइयों व बहनों को बधाई देनी चाहिए और उनसे सीखना चाहिए कि किस तरह से दुनिया की सबसे ताक़तवर कम्पनियों में से एक से टकराकर उन्होंने अपनी यूनियन बनाने में कामयाबी हासिल की। यह भारत के हम मज़दूरों के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि भारत में 94 प्रतिशत मज़दूर किसी यूनियन के तहत संगठित नहीं हैं और नतीजतन उन्हें अपने मालिकों की मनमानी को चुपचाप सहने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

Ramswaroop Mantri

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