“संजय कनौजिया की कलम”![]()
डॉ० अंबेडकर और डॉ० लोहिया हिन्दू धर्म में जो दृष्टि भेद के ठोस चार कारणों पर समकालीन रहे है, वह हैं..वर्ण, स्त्री, सम्पति, और सहिष्णुता और इन चारों भेदों पर डॉ० लोहिया ने जुलाई 1950 को अपने लेख “हिन्दू बनाम हिन्दू” में विस्तार सहित जो व्याख्या की है उसके कुछ महत्वपूर्ण अंशों को में, अपने धारावाहिक लेख “अधर्म का नाश हो” पार्टों सहित, प्रेषित करता आ रहा हूँ..चूँकि इन महानुभावों की संक्षिप्त टिप्पणियां भी, केवल 12 सौ या 15 सौ शब्दों के एक लेख में पूरी करना असंभव क्रिया है अतः यह लेख धारावाहिक किया गया है, जबकि डॉ० लोहिया द्वारा लिखित लेख, एक लम्बे लेख में विस्तारित है..!
वर्ण :- पर महत्वपूर्ण मुख्य अंश का “पार्ट-3” में जिक्र किया गया है..डॉ० लोहिया ने वर्ण पर आगे लिखा है कि कट्टरपंथी और उदारवादी वर्ण-व्यवस्था के अंदर ही एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और हिन्दू इतिहास के दो कालों में एक या दूसरी धारा के प्रभुत्व का ही अंतर होता है..(लेख 1950 का लिखा है उन प्रस्थितयों पर डॉ० लोहिया ने नज़र डालते हुए लिखा)..इस समय उदारवादियों का जोर है और कट्टरपंथियों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे गौर कर सकें..लेकिन कट्टरता उदारवादी विचारों में घुसकर अपने को बचाने की कोशिश कर रही है..अगर जन्मना वर्णो की बात करने का समय नहीं तो कर्मणा जातियों की बात की जाती है..अगर लोग वर्ण-व्यवस्था का समर्थन नहीं करते तो उसके खिलाफ काम भी शायद कभी करते हैं और एक वातावरण बन गया है जिसमे हिन्दुओं की तर्कबुद्धि और उनकी दिमागी आदतों में टकराव है..व्यवस्था के रूप में वर्ण कहीं-कहीं ढीले हो गए हैं लेकिन दिमागी आदत के रूप में अभी भी मौजूद हैं..इसकी आशंका है कि हिन्दू धर्म में कट्टरता और उदारता का झगड़ा अभी भी हल ना हो..!
स्त्री :- आधुनिक साहित्य में हमें बताया गया है कि केवल स्त्री ही जानती है कि उसके बच्चे का पिता कौन है, लेकिन तीन हज़ार वर्ष या उससे भी पहले जबाल को स्वयं भी नहीं मालूम था कि उसके बच्चे का पिता कौन है और प्राचीन साहित्य में उसका नाम एक पवित्र स्त्री के रूप में आदर के साथ लिया गया है..हालांकि वर्ण-व्यवस्था ने उसके बेटे को ब्राह्मण बनाकर हज़म भी कर लिया..उदारकाल का साहित्य हमें चेतावनी देता है कि परिवारों के स्रोतों की खोज नहीं करनी चाहिए क्योकिं नदी के स्रोत की तरह वहां भी गन्दगी होती है..यदि स्त्री बलात्कार का सफलतापूर्वक विरोध ना कर सके तो उसे कोई दोष नहीं होता क्योकि इस साहित्य के अनुसार स्त्री का शरीर हर महीने नया हो जाता है..स्त्री को भी तलाक और सम्पति का अधिकार है..हिन्दू धर्म के स्वर्ण युगों में स्त्री के प्रति यह उदार दृष्टिकोण मिलता है जबकि कट्टरता के युगों में उसे केवल एक प्रकार की सम्पति माना गया है, जो पिता, पति और पुत्र के अधिकार में रहती है..!
इस समय हिन्दू स्त्री एक अजीब स्थिति में है जहाँ स्त्री के लिए सम्मानपूर्ण पद पाना आसान है लेकिन सम्पति और विवाह के सम्बन्ध में पुरुष के समान ही स्त्री के अधिकार हों, इसका विरोध अब भी होता है..मुझे ऐसे पर्चे पढ़ने को मिलें हैं जिसमे स्त्री को सम्पति का अधिकार न देने की वकालत इस तर्क पर की गई है कि वह दूसरे धर्म के व्यक्ति से प्रेम करने लगकर अपना धर्म न बदल दे, जैसे यह दलील पुरुषों के लिए कहीं ज्यादा सच न हो..जब तक कानून या रीति-रिवाज़ या दिमागी आदतों में स्त्री और पुरुष के बीच विवाह और सम्पति के बारे में फर्क रहेगा, तब तक कट्टरता पूरी तरह खत्म नहीं होगी..हिन्दुओं के अंदर स्त्री को देवी के रूप में देखने की इच्छा, जो अपने उच्च स्थान से कभी न उतरे, उदार से उदार लोगों के दिमाग में भी बेमतलब के और संदेहास्पद ख्याल पैदा कर देती है..उदारता और कट्टरता एक दूसरे के साथ जुडी रहेंगी, जब तक हिन्दू अपनी स्त्री को अपने समान ही इंसान नहीं मानने लगता..!
सम्पति :- हिन्दू धर्म में सम्पति की भावना संचय न करने और लगाव न रखने के सिद्धांत के कारण उदार है..लेकिन कट्टरपंथी हिन्दू कर्म-सिद्धांत की इस प्रकार व्याख्या करता है कि धन और जन्म या शक्ति का स्थान ऊँचा है और जो कुछ है वही ठीक भी है..सम्पति का मौजूदा सवाल कि मिल्कियत निजी हो या सामाजिक हाल ही का है..लेकिन सम्पति की स्वीकृति व्यवस्था या सम्पति से कोई लगाव न रखने के रूप में यह सवाल हिन्दू दिमाग में बराबर रहा है..अन्य सवालों की तरह सम्पति और शक्ति के सवालों पर भी हिन्दू दिमाग अपने विचारों को उनकी तार्किक परिणति तक भी नहीं ले जा पाया..समय और व्यक्ति के साथ हिन्दू धर्म में इतना ही फर्क पड़ता है कि एक या दूसरे को प्राथमिकता मिलती है..!
सहिष्णुता :- आमतौर पर यह माना जाता है कि सहिष्णुता हिन्दुओं का महान गुण है है..वह गलत है, सिवाय इसके कि खुला रक्तपात इसे पसंद नहीं रहा…
धारावाहिक लेख अभी जारी है…
(लेखक- राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)





