पुष्पा गुप्ता
_इस देश का योग से नाभिनाल का संबध है। हमारे यहां का सिस्टम इतना तगड़ा है कि कई योग तो बिना किए ही अर्थात स्वतः हो जाते हैं और कइयों को करने की कोई विशेष जरूरत ही नहीं पड़ती।_
जैसे किसी शरीफ से अगर पुलिस वाले ने अपने ‘ही’ अंदाज में (यहां ही पर विशेष जोर दें) कुछ पूछ लिया तो उसे ‘पवनामुक्तासन’ करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती।
रोजमर्रा के अपने काम कराने आम शहरी जब सरकारी विभाग जाता है, तो वहां उसे ‘ताड़ासन’ ही कराया जाता है। (बिना लक्ष्मी के ताड़ा ही जाएगा!)
_हम सब का यह रोज का अनुभव है कि हमें अपने छोटे से छोटे काम के चक्कर में ‘चक्रासन’ करना पड़ता है। इस सिलसिले में एक विज्ञापन याद आता है जिसमें एक बेचारे को अपना एक काम कराने के लिए ‘चक्रासन’ करते-करते चप्पल तक घिस गई थी।_
योग भले ही हमारी पुरातन परंपरा का हिस्सा रही हो मगर आजादी के बाद योग का महत्व हमारे आधुनिक जीवनशैली से जबरदस्त ढंग से पैबस्त हैै। आप इसे संजोग माने या नियति, मगर है यह कडुवा सच।
जनता बड़ी मुरादों से सरकार चुनती है, तो बदले में सरकार उसे ‘दंडासन’ करवाती है। जो नेता विपक्ष में रह कर जनता के लिए ‘सिंहासन’ करते हुए गला फाड़तेे हैं, वहीं फिर सत्ता मिलते ही ‘भुंजगआसन’ करने लग जाते हैं।
_यहां शासन मिलतेे ही जनता के लिए दिन-रात ‘शीर्षासन’ का दावा करने वाली सरकार ‘सुखआसन’ करने लगती है।_
सरकार पर जरा-सा जोखिम आया नहीं कि सरकार विभिन्न राजननीतिक दलों के साथ ‘सेतबंधुआसन’ करने में देर नहीं करती जैसे कश्मीर में चार साल तक करते हुए देखा या बिहार में हम देख रहे हैं।
यहां ऐसे ही होता है हमारे जनप्रतिनिधियों के हितों पर जरा सी भी खरोंच आती है तो सारे के सारे ‘सर्वांगासन’ करने लग जाते हैं। जबकि पेट्रोल-डीजल से लेकर सब्जियों के बढ़ते भाव जब-तब जनता से ‘क्रोंचासन’ या ‘वज्रासन’ कराती रहती है।
_नेताओं के भाषण सुनते-सुनते जनता कब ‘कर्णपीड़ासन’ करने लगी उसे पता ही नहीं चला। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले मोती’ वाली धरा पर ‘हलासन’ करने वाला किसान ‘प्राणमुक्तासान’ करने को विवश होता है, क्योंकि यहां आसन नहीं शासन महत्वपूर्ण है और इसके लिए हमारे नेता कोई भी ‘सिद्धासन’ करने को तैयार रहते हैं।_
समझ में नहीं आता है कि ऐसे सत्ताधारियों को प्रणाम कहे या ‘प्रााणायाम’।
(चेतना विकास मिशन)





