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प्रसंग वश : निरहुआ बनने की मंशा का सांस्कृतिक मुद्दा

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~ पवन कुमार 

      _बनारस की चंदुआ सट्टी में नागपंचमी का बिरहा दंगल था। विजय लाल यादव और अनीता राज का। जितना याद पड़ता है, सन सत्तानबे की बात है। तब विजयी के चचेरे भाई दिनेश कहीं कलकत्ता में पढ़ते रहे होंगे, हम लोग की तरह।_

        उस समय तो विजयी को भी लोग उतना नहीं जानते थे। बस गाजीपुर का होने के नाते हुलस रही उन्हें सुनने की, सो शाम को हम चौबेपुर से बहाना बना के पहुँच गए चनुआ। तब विजयी की लंबी साँस हुआ करती थी और आवाज़ में टनक थी। नौ बजते-बजते माहौल टाइट हो चुका था।

       बैंजो खनक रहा था। आरंभिक ‘ए हो, का हो’ के बाद विजयी ने जैसे ही मुखड़ा उठाया- ए भउजी, ए भउजी, ए भउजी… अनुआ चनुआ सिगरा साजन सब बमक उठा! पलट के अनीता राज ने जवाबी बोल अपनी खारी आवाज़ में दे मारा- ए देवर, ए देवर, ए देवर… और जनता मस्त हो गयी।

      _’रंग देबे चोलिया तोहार’ वाले इस सुपरहिट गीत के बाद विजय लाल यादव ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कालांतर में वे समाजवादी पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के सदर बने। अब तो उनका मंच पर आना ही सम्मान की बात होती है। लोग उन्हें बिरहा सम्राट कहते हैं।_

      पुराने हो गए धंधे में, लेकिन कभी विधायक या संसद नहीं बन पाए, अपने छोटे भाई की तरह!

उस समय तक कम से कम केवाड़ी बंद कर के जो कुछ करना था किया जाता था। थोड़ा शर्म लिहाज बचा था। सात साल बाद कलकत्ता से दिनेश ने जब टेरी मारी, तो लोक संस्कृति की देह पूरी तरह उघड़ गयी। दिनेश लाल यादव का पहला सार्वजनिक परिचय था खुशबू राज के साथ उनका गाना ‘निरहुआ सटल रहे’।

      _इसके बाद वे निरहुआ कहलाए! इस समय तक मंचीय बिरहा या दंगल का कल्चर धीमा पड़ चुका था। पुराने बिरहा धुरंधर जा चुके थे। दादा पंधारी, उस्ताद हैदर अली जुगनू, बुल्लू दादा, ये सब के रहते जो आँख का पानी बचा था, 2000 के बाद धीरे-धीरे मर गया। भोजपुरी वालों को मनोज तिवारी की राह पर चलना अब आसान लग रहा था। उधर पैसा था।ग्लैमर था।_

         इसके लिए जितनी नंगई चाहिए थी उतनी सामाजिक रूप से स्वीकार्य और अर्जित हो चुकी थी। इस नयी परिस्थिति में निरहुआ को ऊपर चढ़ने में बहुत समय नहीं लगा। पहले सुपरहिट गीत के तीन साल बाद उसकी बंबई से फिल्म आ गयी।

      _वो भी हिट। इसके दस साल बाद राजनीति में प्रवेश! अपनी पहली सार्वजनिक उपस्थिति से लेकर मात्र 18 साल लगे हैं दिनेश लाल यादव को सांसद बनने में! इसी अंतराल, मौसम और माहौल ने पवन सिंह, रितेश पांडे और खेसारी जैसे लोगों की फसल को उपजाया।_

      इसी बीच भोजपुरी लोक पूरी तरह मुंबइया हो गया। अब लोक के तत्व केवल कामोद्दीपन के लायक बचे रह गए हैं। बेशक वे तत्व आकर्षक हो सकते हैं लेकिन उनका कोई सामाजिक मूल्य नहीं है। 

भोजपुरी लोक के इस सांस्कृतिक पतन के बीच कुछ लोग बेशक अपनी जमीन नहीं छोड़े, लेकिन वे उतने लोकप्रिय भी नहीं हुए। डिजिटल के दौर में ओमप्रकाश दीवाना, महेंदर बच्चन, सहित कई कलाकार आज भी मंच पकड़े हुए हैं और सामाजिक विषयों पर बिरहा रच रहे हैं।

      _अपने गुरुओं की लाज उनकी आँखों में दिखती है। एक तरह से ये गायक सत्ता का काउन्टर-कल्चर रचते हैं जबकि उसी जमीन और विरासत से आने वाले निरहू यानि दिनेश यादव सांसद बन जाते हैं- उस पार्टी से जिसका उनकी सांस्कृतिक विरासत से कोई लेना-देना नहीं।_

       आज देखता हूँ तो निरहू के मुकाबले विजयी ही बेहतर दिखायी देते हैं जिन्होंने कम से कम अपनी जमीन तो नहीं छोड़ी, भले ही वे भोजपुरी लोक संगीत में अश्लीलता के शुरुआती वाहकों में रहे। 

दिक्कत निरहू के सांसद चुने जाने से नहीं है। वे नहीं होते तो ‘हाउ कैन यू रोक’ बोलने वाले वाले धरमेंदर सांसद होते। या गुड्डू जमाली होते। तीनों ही सांसद बन के ज्यादा से ज्यादा रेलवे का टिकट कन्फर्म करवाने के काम ही आते, बल्कि इस पर भी शक है।

      _दिक्कत इस बात से ज्यादा है कि लोक संस्कृति को विकृत करने वाले सारे तत्व एक ही दिशा में जा रहे हैं- उस दिशा में जो आसान है और जहां लोक का बहुरंग खतम करने की साजिशें पनपती हैं। कल को भोजपुरी लोक की चर्चा होगी तो गोरखपुर के रवि किशन से लेकर आजमगढ़ से निरहू वाया मनोज तिवारी ही सारे संदर्भ आएंगे और इनका रचा ही ऑथेनटिक माना जाएगा।_

       तब तक दिल्ली-मुंबई के हाइवे पर भीड़ भी बढ़ जाएगी। अपनी जमीन से बचे-खुचे लोग भी उखड़ जाएंगे। हो सकता है तब तक निरहू संस्कृति मंत्री बन जाएं! 

दिक्कत निरहू के प्रधानमंत्री बनने से भी नहीं है। दिक्कत ये है कि जो कलाकार बचे हैं अपनी कमिटमेंट से अपनी धरती पर अपनी विरासत को सँजोये हुए; जिनकी सांस अब उखड़ रही है ऐसी खबरें सुनकर कि निरहुआ सांसद बन गया; जो कभी भी भूख या ग्लैमर या किसी भी वजह के चलते रिश्ता तोड़ सकते हैं अपने पुरखों से और ओपन मार्केट में जाकर खुद को बेच सकते हैं; उन्हें कौन सँजोएगा? कौन बचाएगा? कैसे?

      _संक्षेप में, सांसद दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ बनने के आसान सपने को समाज में संक्रमित होने से कैसे रोका जा सकता है? ‘मैं भी निरहुआ बनना चाहता हूँ’- इस वाक्य का क्या जवाब हो सकता है? क्या आपको भी लगता है कि इस बीमारी को थामा जाना चाहिए? या जाने दिया जाय?_

    [चेतना विकास मिशन]

Ramswaroop Mantri

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